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कौन हूं मैं

राजकुमार सोनी

कौन हूं मैं. फिलहाल तो मेरा कोई नाम नहीं है, और लोगों की तरह आप भी मुझे हरामी कह सकते हैं. हरामी यानी हराम का जना हुआ, लेकिन जरा इस चित्र को गौर से तो देखिए. हूं न, काला टीका लगाकर चुम्मी लेने के लायक. मैं इस चित्र से बाहर निकलकर आपसे बतियाना चाहता हूं. हो सकता है कि यह बात थोड़ी विचित्र सी लगे कि भला फोटो से बाहर निकलकर कोई कैसे बतिया सकता है? वह भी ऐसा बच्चा जो दुनिया की खूबसूरती देखने के लिए ठीक ढंग से आंखें खोलना भी न सीख पाया हो, लेकिन फिर भी न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि आप मेरे गुलाब की पंखुड़ियों के समान कंपकंपाते मासूम होठों को देखकर यह समझ ही सकते हैं कि मैं क्या कहना चाहता हूं? मैं मानता हूं कि अब भी इस दुनिया में ऐसे लोग हैं जो किसी कांटे में फंसी हुई तितली को बचाने के लिए अपना सारा कामकाज छोड़ सकते हैं. मेरी सारी बातें भी उन लोगों के लिए ही हैं जिनका दिल बगैर किसी मशीन के धड़कता है.
जो बातें मैं आपको बताने जा रहा हूं वह है तो छत्तीसगढ़ की, लेकिन मेरे और मेरे जैसे और भाई-बहनों के साथ ऐसी घटनाएं मुंबई, कोलकाता और दिल्ली की झोपड़पट्टियों में लगातार घट रही हैं. मुझे लगता है कि जहां-जहां भी प्रेम का बलात्कार होता है वहां-वहां ऐसी घटनाएं हर रोज घटती हैं. प्रेम को शरीर की भूख मिटाने का माध्यम समझने वाले लोग मुझे कीड़े-मकोड़ों और चूहों से भरी नालियों में फेंक देते हैं या कंटीली झाड़ियों में छोड़कर चले जाते हैं. कई बार मेरे मां-बाप मुझे इसलिए गिरिजाघरों की सीढ़ियों पर छोड़कर भाग खड़े होते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे मेरा पेट नहीं भर पाएंगे, लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूं कि मुझे चांद-तारों की दुनिया में पहुंचकर ‘भगवान’ से बातचीत करने के लिए सिर्फ और सिर्फ मीठे दूध की जरूरत होती है. (कहते हैं कि जब बच्चे नींद में मुस्कुरा रहे होते हैं तो वे भगवान से बातचीत कर रहे होते हैं) हां.. दूध के साथ यदि कथरी सीलने वाले हाथों की थोड़ी थपकियां मिल जाएं तो मुझे गहरी नींद के आगोश में पहुंचने में ज्यादा वक्त भी नहीं लगता है, लेकिन शायद ऐसा नहीं होता. ‘गरीबी’ एक मां की छाती में इतनी ताकत पैदा नहीं कर पाती है कि वहां से दूध की नदी फूट पड़े और मेरी आंतों में बहने लगे. 
 
कुछ समय पहले मुझे अंबिकापुर में चार अलग-अलग जगहों पर फेंका गया था. अंबिकापुर शहर के पंचानन होटल के पास अलसुबह जब कुछ लोग टहलते हुए निकले तो उन्होंने देखा कि एक लाल रंग के गंदे से गमछे में कुछ लिपटा हुआ पड़ा है. नक्सलियों की हरकतों से डरे-सहमे लोगों ने पहले तो यह सोचकर ही लाल कपड़े को हाथ नहीं लगाया कि शायद बम होगा. जैसे-तैसे एक मजदूर ने हिम्मत तो दिखाई लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. इस बीच चीटिंयों ने मेरे पूरे शरीर पर अपना घर बना लिया था. दर्रीपारा के एक खेत में भी कुछ लोग मेरे एक भाई को दफना कर चले गए थे. चूंकि मिट्टी ठीक ढंग से नहीं ढांपी गई थी इसलिए मेरे भाई की सांसें चलती रहीं. इस बीच कुछ मजदूर आए और उन्होंने मेरे भाई के सिर पर फावड़ा चला दिया. मेरा भाई भी बड़ा होकर आप लोगों की खूबसूरत दुनिया देख सकता था, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका. थोड़े दिनों के बाद जब मेरे एक और भाई ने किसी झोपड़ी में जन्म लिया तो पैदा करने वालों ने सिर और हाथ को काटकर उसे प्रतापपुर नाले के पास फेंक दिया था. मैं क्यों मरा, कैसे मरा यह जानने-समझने के लिए पुलिस आई थी. पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में यह भी लिखा था कि मेरे शरीर को कुत्तों ने बुरी तरह नोंचा था.
अंबिकापुर तो एक मिसाल है. ऐसे न जाने कितने ही शहरों में मैं कभी लोगों को नर्सिंगहोम के कचरे में पड़ा मिला हूं तो कभी रेल की पटरियों पर. एक बार जब मुझे रेल की पटरियों पर फेंका गया तो एक पत्रकार को बहुत गुस्सा आया था. उसने मुझे मदर टेरेसा आश्रम में दाखिल किया और अपने अखबार में खबर छापी कि ‘जाको राखे साइया मार सकै न कोय’ उसकी खबर छपने के बाद कई लोग मेरे निर्मोही मां-बाप को अपने-अपने ढंग से गरियाते रहे. अखबार में मिलने वाली मामूली सी तनख्वाह के बावजूद पत्रकार मेरे लिए फल वगैरह लेकर आता था, लेकिन उसे क्या मालूम था कि मैं फल नहीं खा सकता था. यहां मुझे एक ‘नन’ दूध पिलाया करती थी. आप सोच रहे होंगे कि भला नन दूध कैसे पिला सकती है. लेकिन चौंकिए मत... वह पूरी तरह से नन ही थी। वह रोज हर सुबह गाय का ताजा दूध लेने के लिए आश्रम से दूर निकल जाती थी. फिर रूई के फाहों को दूध में भिगोकर मेरा पेट भरा जाता था. दूध पिलाने के बाद जब वह मुझे अपने सीने से लगा लेती थी तो पता नहीं क्यों अचानक मुझे लगने लगता था मेरी दुनिया में अब किसी राक्षस का प्रवेश नहीं हो सकता है.
आपको क्या लग रहा है कि मैं कोई कहानी सुना रहा हूं? शायद मैं कहानी भी बताता लेकिन क्या करूं प्रेम को बलात्कार की संज्ञा देने वाले लोगों ने मुझे कभी इस लायक ही नहीं समझा कि मैं कोई कहानी सुना सकूं. सच तो यह है कि कहानी भी वहीं सुना सकता है जो कहानियों का हिस्सा होता है. मुंह से निकलने वाली चाशनी जैसी लार से एक मां के आंचल को वहीं गीला कर सकता है जिसका पाला मीठी लोरियों से पड़ता है, लेकिन आप में से कुछ मशीनी दिल वाले लोगों ने तो मुझे लोरी सुनने का अवसर ही नहीं दिया. इससे पहले कि मैं अपने नन्हें हाथों से मां का स्तन टटोलते हुए अपनी दुनिया को पहचानने की कोशिश करता लोग मुझे दूसरी दुनिया में पहुंचा देते हैं. क्या आपने कभी सोचा है कि मुझ जैसे और न जाने कितने लोग हैं जो लोग अपनी मां को ‘मां’ कहे बगैर ही इस दुनिया से कूच कर जाते हैं? मैं पूछता हूं कि मेरा क्या कसूर है? क्या मैं अपनी मर्जी से आपकी दुनिया में आना चाहता हूं. मैंने कब कहा है कि प्रेम मत करो. लोग प्रेम तो करते हैं लेकिन जब मैं एक बीज के तौर पर किसी पेट में पलने लगता हूं तो फिर मेरा स्वागत चांटों और थप्पड़ों से किया जाता है. 
जो लोग वासना के भूखे भेड़िए होते हैं वे यह जरूर जानते हैं कि दुनिया की किसी भी भोली लड़की को बहला-फुसलाकर कुआंरी मां कैसे बनाया जाता है. समाज के उलाहनों से परेशान लड़कियां मां बनने के अहसास से खुश तो होती हैं लेकिन जैसे ही उन्हें यह पता चलता है कि वह अपने होने वाले बच्चे को पिता का नाम नहीं दे पाएगी तो फिर पेट में चांटा मार-मारकर चिल्लाने लगती है- कमीने तेरा बाप तो छोड़कर चला गया. तू कहां से आ गया? क्या इस राज्य और देश में कोई ऐसा कानून है जो मुझे आप लोगों की दुनिया में सुरक्षित ढंग से प्रवेश करने का हक दिलवा सकता है? जो मां-बाप मुझे गंदी नालियों में भाग खड़े होते हैं क्या उन्हें इस काबिल बनाया जा सकता है कि वे मेरे पैदा होते ही मुझे छोड़कर न भागे? मुझे बजबजाती नालियों के हवाले करने वाले भारतीय दंड संहिता की धारा 315 के तहत जेल तो चले जाते हैं लेकिन मैं कितने जेलों से गुजरकर किस घर का भविष्य बनता हूं यह कोई नहीं बता सकता. कई बार तो मुझे ठीक-ठाक परवरिश मिल जाती है और कई बार मैं बगैर परवरिश के इस दुनिया से आंखें मूंद लेता हूं. आंख मूंदने से पहले कोई कानून का रखवाला मुझे यह नहीं बताता कि मेरे पिता का नाम क्या है? 
क्या मुझे यही गाना सुना-सुनाकर भरमाया जाता रहेगा कि ‘जिसका कोई नहीं... उसका तो खुदा है यारो.’ यदि ईश्वर-परमेश्वर, अल्लाह-खुदा ही हमारे पिता हैं तो फिर हमें ईश्वर का बच्चा क्यों नहीं कहा जाता है. कौन हैं वे लोग जो हमें कहीं भी पड़ा हुआ देखकर चिल्लाने लगते हैं- देखो नाजायज औलाद पड़ी हुई है. क्या मैं हरामी हूं? बताइए... कुछ तो बताइए... बोलिए कुछ तो बोलिए. आप चुप क्यों हैं? आप सबके चुप रहने की वजह से ही कुछ लोग मुझे गंदी नाली का कीड़ा बोलकर अपनी महानता का परिचय देते रहते हैं. क्या मैं गंदी नाली का कीड़ा हूं... आप चुप ही रहेंगे क्या.... चलिए मैं अब वापस चित्र में लौट रहा हूं.
( लेखक पत्रकार है. उनका यह लेख फेसबुक से लिया गया है. )
 
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