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माओवादी भी बंटे हुए हैं

बनवारी 

 संविधान सभा भंग होने के बाद से नेपाल में जो गतिरोध पैदा हो गया है वह कैसे दूर होगा, इसका उत्तर अभी किसी के पास नहीं है। नेपाल में बाबूराम भट््टराई की कार्यकारी सरकार है, पर उनकी वैधानिक स्थिति के बारे में अनेक लोगों को संदेह है। बाबूराम भट््टराई राष्ट्रपति के अध्यादेश से एक बजट घोषित करवाना चाहते हैं। लेकिन विपक्षी दलों का मानना है कि उन्हें पूरे वर्ष का बजट बनाने का अधिकार ही नहीं है। विपक्षी दल राष्ट्रपति पर दबाव डाल रहे हैं कि वे केवल चुनाव तक का एक अंतरिम बजट घोषित करें। लेकिन नवंबर में चुनाव हो पाएंगे या नहीं, यह अभी किसी को स्पष्ट नहीं है। इस गतिरोध के लिए किसी एक पक्ष को दोष देना संभव नहीं है। एक तरह से यह नेपाल की लोकतांत्रिक राजनीति की विफलता है और बहुत संभव है कि अंतत: माओवादी इसका लाभ उठाने में सफल हो जाएं।
दूसरे दलों की तरह माओवादी भी अनेक धड़ों में बंटे हुए हैं। हाल ही मोहन वैद्य ने माओवादी पार्टी को विभाजित करके एक अलग दल बनाने की घोषणा की है। उन्होंने अपने दल को फिर से सशस्त्र संघर्ष के रास्ते पर ले जाने के संकेत दिए हैं। आज की अनिश्चित स्थिति में उन्हें अपने इस उद््देश्य में सफलता मिल जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। मार्क्सवादी अपने आंतरिक विभाजन से कमजोर पड़ें यह आवश्यक नहीं है। 
अब तक का अनुभव तो यही है कि उनकी वैचारिक प्रतिद्वंद्विता उन्हें एक राजनीतिक उद््देश्य दिए रहती है। और इससे उनकी शक्ति और उनके संगठन का विस्तार ही होता है। लेकिन नेपाल में रूस या चीन जैसी किसी साम्यवादी क्रांति की संभावना कम ही है। साम्यवाद के अंतर्गत खड़ा किया जाने वाला सर्वसत्तावादी ढांचा नेपाल के लोगों के स्वभाव के अनुरूप नहीं है। इसी तथ्य ने कमल दहल प्रचंड को सशस्त्र क्रांति का रास्ता छोड़ कर लोकतांत्रिक राजनीति के माध्यम से सत्ता पाने के लिए प्रेरित किया था।
नेपाल की राजनीति आगे क्या स्वरूप ग्रहण करती है इसमें न केवल वहां के राजनीतिक दलों बल्कि नेपाल के राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय और नेपाल की सेना की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी। पश्चिमी नेपाल के अपने हाल के दौरे के समय पूर्व नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र ने भी यह संकेत छोड़ दिया है कि वे संवैधानिक राजतंत्र के माध्यम से राजवंश की पुनर्स्थापना के लिए प्रयत्नशील हैं। लेकिन ऐसी किसी संभावना की कल्पना करना अभी शीघ्रता होगी। नेपाल के लोगों में नेपाल की राजशाही को लेकर आज भी सकारात्मक भावना ही है। लेकिन ज्ञानेंद्र को लेकर भी वे उतने ही सकारात्मक होंगे यह कहना कठिन है। पर नेपाल में अगले कुछ वर्षों में इसी तरह के राजनीतिक गतिरोध पनपते रहे और लोगों का भौतिक जीवन कठिन होता रहा तो ज्ञानेंद्र के बारे में भी आम नेपाली अपना संकोच छोड़ सकते हैं।
यह एक गुत्थी ही लगती है कि सदाशय राजाओं और निष्ठावान, तपस्वी और लोकप्रिय राजनीतिक नेताओं की उपस्थिति के बावजूद नेपाल की राजनीति की यह दशा क्यों हुई। भारत सरकार के हस्तक्षेप से 1951 में महाराजा त्रिभुवन की नेपाल में वापसी हुई थी। भारत सरकार ने राणा प्रधानमंत्री, नेपाली कांग्रेस और महाराज के बीच एक संतुलनकारी स्थिति बनाने का प्रयत्न किया था। लेकिन राणाशाही के कटु अनुभव के बाद महाराजा राणा सत्तातंत्र को बने नहीं रहने दे सकते थे। धीरे-धीरे सत्ता उन्होंने अपने हाथ में केंद्रित की। फिर भी महाराजा त्रिभुवन और फिर उनके उत्तराधिकारी महाराज महेंद्र और महाराजा वीरेंद्र ने राजनीतिक शालीनता और सदाशयता बनाए रखी और उनके व्यवहार की प्रशंसा वीरेश्वर प्रसाद कोइराला से लगाकर बाबूराम भट््टराई तक ने की है।
इसी तरह नेपाल की राजनीति में वीरेश्वर प्रसाद कोइराला की राष्ट्रभक्ति और दूरदृष्टि से कोई इनकार नहीं कर सकता। उनका ही नहीं, उनके दोनों सहयोगियों गणेशमान सिंह और कृष्णप्रसाद भट््टराई का कद भी बहुत ऊंचा था। उनकी निष्ठा, त्याग और लोकप्रियता के बारे में संदेह नहीं किया जा सकता था। ऐसे लोकतांत्रिक नेताओं के रहते हुए नेपाल की राजनीति स्थिर क्यों नहीं हो सकी? यह कहना सरलीकरण होगा कि राजशाही सदा लोकतांत्रिक राजनीति के प्रति संदेहशील रही थी। इसलिए उसने कभी लोकतांत्रिक सरकार को स्थिर नहीं होने दिया। यह बात आंशिक तौर पर सही अवश्य है, पर लोकतांत्रिक राजनीति की विफलता का दोष केवल राजशाही पर नहीं डाला जा सकता। उसकी अपनी आंतरिक कमजोरियां भी इसका उतना ही बड़ा कारण थीं।नेपाल की राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि लोकतंत्र के लिए जिस राष्ट्रवादी दृष्टि की आवश्यकता होती है, वह पनप नहीं सकी। लोकतांत्रिक राजनीति एक छोटे समूह में सीमित रही और उसका स्वरूप कुल मिलाकर दरबारी राजनीति जैसा ही रहा। इसका कारण राज दरबार पर उसकी निर्भरता उतना नहीं था जितना एक राष्ट्र के रूप में नेपाली समाज का रूपांतरण न हो पाना। 
नेपाली राष्ट्रीयता का आधार भारत-विरोध को बनाने की कोशिश की गई, जो आज भी जारी है। हो सकता है उसमें जाने-अनजाने भारत के राजनयिकों की विवादास्पद भूमिका का भी कुछ योगदान रहा हो। पर उसे भी एक सीमा से अधिक दोष नहीं दिया जा सकता।भारत को लेकर वैमनस्य पैदा करने का काम राज दरबारियों से लगाकर साम्यवादी नेताओं तक अनेक वर्गों ने किया और   नेपाल के समाचार माध्यमों ने इसे लगातार हवा दी। इसका एक परिणाम यह हुआ कि भारत से सटे मधेश में बसी देश की आधी जनसंख्या को सामान्य नागरिक अधिकार भी नहीं दिए गए। किसी देश की आधी जनसंख्या को राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर रख कर कोई राष्ट्रीय राजनीति खड़ी की जा सकती हो यह संभव नहीं हो सकता। 
यही कारण है कि नेपाल की लोकतांत्रिक राजनीति का आधार छोटा रहा और इसमें से कोई बड़ा संकल्प पैदा नहीं हो पाया। अंतत: उनके नागरिक अधिकारों को स्वीकृति मिली भी तो मार्क्सवादियों के दबाव से। सब जानते हैं कि मधेश में रहने वाली किसान जातियां नेपाली समाज के साम्यवादीकरण की सबसे बड़ी बाधा सिद्ध होंगी।
लोकतांत्रिक चेतना के विस्तार से राष्ट्रीय राजनीति के उदय की जो संभावना बनती उसकी जड़ों में मट्ठा डालने का काम नेपाल में सक्रिय यूरोपीय-अमेरिकी प्रभाव ने किया। गैर-यूरोपीय समाजों को विखंडित रखने की एक शास्त्रीय दृष्टि यूरोपीय समाज ने पैदा कर ली है। वह विभिन्न समाजों को जनजातीय समूहों में बांट कर उनके अधिकारों की दुहाई देती रहती है। इससे राजनीतिक शक्तियों के विभाजन का दुश्चक्र आरंभ हो जाता है। यही नेपाल में हुआ। जनजाति आधारित प्रांतों के आधार पर एक संघीय ढांचा खड़ा करने की मांग इतनी प्रबल हो गई कि नेपाल का तय समय सीमा में संविधान बनाना असंभव हो गया।
सभी समाजों में जातीय और क्षेत्रीय विभाजन होते हैं और समाज को थामे रहने में उनकी बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। कोई भी समाज छोटे-छोटे और आत्मीय समूहों में बंट कर ही अपनी सामाजिक और राजनीतिक गतिविधि को संचालित और मर्यादित कर सकता है। लेकिन ये समूह आपसी सहकार और जहां आवश्यक हो स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता के सहारे अपनी गतिविधियां चलाएं तो इससे समाज शक्तिशाली ही होता है।
लेकिन अगर इस बहुजातीयता को राजनीतिक होड़ और परस्पर वैमनस्य का आधार बना दिया जाए तो वही समाज को शक्तिहीनता की ओर ले जाने लगता है। नेपाल में यही हुआ है और इसका दोष सबसे ज्यादा नेपाल में सक्रिय विदेशी शक्तियों का है। अब उन्हें भी यह दिखाई देने लगा है और पिछले दिनों उन्होंने काफी सफाई देने का प्रयत्न किया। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
दुनिया के बाकी सब गैर-यूरोपीय समाजों की तरह नेपाल भी अपने भौतिक जीवन के रूपांतरण की समस्याओं से जूझ रहा है। उस पर परंपरागत कृषि-प्रधान जीवन शैली से आधुनिक औद्योगिक जीवन शैली की तरफ बढ़ने का दबाव है। इसके लिए न केवल आर्थिक क्षेत्र में बल्कि राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में भी परिवर्तन मूलमंत्र बन गया है। अन्य समाजों की तरह नेपाली राजनेता और बुद्धिजीवी भी यूरोपीय विचारों और संस्थाओं का अंधानुकरण करने के लिए विवश हैं। लोकतंत्रवादी या मार्क्सवादी सभी इसी दिशा में प्रयत्नशील हैं। सभी इतनी शीघ्रता में हैं कि थोड़ा ठहर कर परिवर्तन की प्रक्रिया के गुण-दोष के बारे में सोचने की फुरसत किसी के पास नहीं है।
महाराज महेंद्र के शासनकाल में बहुदलीय व्यवस्था का विकल्प पंचायत व्यवस्था में देखने की कोशिश की गई थी। मगर तुलसी गिरि के सुझाव पर जो पंचायतें बनीं वे पंचायतें कम, राज्य की स्थानीय इकाइयां अधिक थीं। नेपाल में ही क्या, भारत में भी पंचायतों के ठीक स्वरूप का भान किसी को नहीं रह गया है। यही कारण है कि वह पंचायती व्यवस्था नेपाल में अधिक नहीं चल पाई।
ग्यारह वर्ष पहले राजपरिवार में हुए नरसंहार ने स्थिति को और विकट बना दिया। उसने नेपाल के राजवंश पर लोगों की आस्था ही हिला कर रख दी। इससे मार्क्सवादियों के लिए राजशाही समाप्त करने का दबाव बनाना आसान हो गया। यह समझने का अवसर ही नहीं मिला कि राजवंश के हट जाने के बाद नेपाल की राजनीतिक स्थिरता का आधार क्या रहेगा। राजनीतिक दलों में शुरू से ही विग्रह की प्रवृत्ति रही है और कोई राजनीतिक दल इससे बचा नहीं है। फिर भी नेपाली कांग्रेस और साम्यवादियों का देश में व्यापक आधार रहा है। पर उनके नेता नेपाल को वैसा नेतृत्व नहीं दे सके जिसकी इस संक्रमण काल में आवश्यकता थी। आज का संकट उनकी इस विफलता से ही पैदा हुआ है। इसका समाधान क्या होगा अभी कोई नहीं जानता।
एक अच्छी बात यह है कि नेपाल के राष्ट्रपति रामबरन यादव, वहां के सर्वोच्च न्यायालय और सेना ने अब तक काफी धैर्य और परिपक्वता का परिचय दिया है। पूर्व महाराजा ज्ञानेंद्र सक्रिय हुए हैं, पर उन्होंने भी अपनी सक्रियता मर्यादा में ही रखी है। इसलिए यह आशा की जा सकती है कि देर-सवेर इस गतिरोध को दूर करने का कोई रास्ता निकल आएगा। सबसे आवश्यक यह है कि अपने तात्कालिक हितों के साथ-साथ सब नेपाल के दीर्घावधि हितों के बारे में भी सोचें।
 
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