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जेपी की जेल डायरी

 सुरेंद्र किशोर

आपातकाल के दौरान जय प्रकाश नारायण नजरबंद थे। वे नजरबंदी के दौरान अपनी डायरी लिखते थे। आज से ठीक 33 साल पहले यानी 26 सितंबर 1975 को जेपी ने अपनी डायरी में लिखा, आज मेरी नजरबंदी के तीन महीने पूरे हो गए। अब लगता है, दिन काफी तेजी से बीत रहे हैं। फिर भी साथी के अभाव में समय पहाड़ बन गया है। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि तानाशाही के गत्र्त की ओर पतन की प्रक्रिया रुक गई है। वह स्थायी या अस्थायी रूप से रुकी है, यह बताना अभी संभव नहीं। सुगत दासगुप्तकल कह रहे थे कि जिन क्षेत्रों में जाते-आते हैं,वहां सामान्य रूप से यह आशा बनी है कि संसदीय चुनाव अगले साल होने वाले हैं।अगर ऐसा होता है तो लोकतंत्र की ओर वापसी निश्चित है। 
यद्यपि आपातकाल की समाप्ति तो नहीं होगी और समाचार पत्र भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होंगे, परंतु जेलों से आम रिहाई निश्चित रूप से होगी और भाषण तथा संगठन करने की स्वतंत्रता पहले की अपेक्षा अधिक रहेगी। याद रहे कि 25 और 26 जून 1975 के बीच की रात में तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल लगा कर जेपी सहित देश के करीब एक लाख नेताओं व राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं को जेलों में डाल दिया था।जेपी को दिल्ली में गिरफ्तार करके पहले तो हरियाणा के सोहना में रखा गया,बाद में वहां से उन्हें 29 जून 1975 को चंडीगढ़ पहुंचा दिया गया।उन्हें सशस्त्र पुलिस की पहरेदारी में वहां के बड़े अस्पताल में रखा गया। जेपी जब आजादी की लड़ाई के दौरान जेल में थे तो उनकी यह मांग अंगे्रजां ने मान ली थी कि उनके साथ सह कैदी के रूप में डा.राम मनोहर लोहिया को रखा जाए। पर इंदिरा गांधी की सरकार ने किसी सह कैदी के उनके साथ रहने की जेपी की मांग ठुकरा दी थी। जेपी की जेल डायरी भारतीय इतिहास की त्रासदी का एक जीवंत दस्तावेज है।
उनकी जेल डायरी में उनके अकेलापन की पीड़ा भी झलकती है। 28 सितंबर को अपनी डायरी में 73 वर्षीय जेपी ने लिखा,कल शनिवार को मेरे लिए बुरा दिन था।सुबह ज्यों ही मैं शौचालय में बैठा,मेरे पेट में भयानक दर्द महसूस हुआ।पहले तो मैंने सोचा कि दर्द खत्म हो जाएगा।परंतु वह जारी रहा,बल्कि और भी गंभीर हो गया।मैं पसीने से तर-बतर होने लगा।बेहोशी और बहुत कमजोरी महसूस हुई।यहां तक कि उठन,े हाथ धोने और बिछावन तक जाने में कठिनाई हो रही थी।मैंने डा.कालरा को बुलाने और डा.चुट्टानी को भी खबर करने को कहा।दर्द घंटों तक जारी रहा। डाक्टरों ने दवाएं दीं।घंटों तक बिछावन पर पड़ा रहा। 29 सितंबर को जेपी ने लिखा, आज के ट्रिब्यून में तीन कालम के शीर्षक के साथ श्री जग जीवन राम का भाषण प्रकाशित हुआ है।भाषण में उन्होंने बड़े जोर देकर कहा है कि प्रधान मंत्री का नेतृत्व बीस सूत्री योजना की क्रियान्विति के लिए महत्वपूण्र् ा है।
आश्चर्य है कि वफादारी की यह घोषणा ऐसे उंचे स्वर में क्यों की जा रही है।क्या इसके पीछे कोई छिपा हुआ कारण है या समय- समय पर की जाने वाली वफादारी की अभिव्यक्ति मात्र है घ् विश्वास नहीं होता कि ऐसी चापलूसी का जोरदार प्रदर्शन जगजीवन बाबू जैसे लोग भी कर रहे हैं।कैसा पतन है ! अफसोस यह कि किसी ने श्री राम से यह नहीं पूछा कि क्यों उनकी प्रिय प्रधान मंत्री का नेतृत्व दस सूत्री योजना की क्रियान्विति के मामले में विफल हुआ।शायद विरोधी पक्ष का विश्वासघात इसके लिए भी दोषी होगा। आज सुबह का ट्रिब्यून घोषणा करता है कि संपूर्ण नशाबंदी संभव है।क्या खूब ! इसमें जो राजनीतिक चालबाजी निहित है,उसके बावजूद यह एक अत्यंत अभिनंदनीय निष्पति है।अवश्यमेव,इसमें राजनीतिक चाल यह है कि बिनोवा जी तथा सर्वोदय आंदोलन को अपने पक्ष में कर लें और यह दिखा दें कि श्रीमती गांधी जैसी सच्ची गांधीवादिनी के प्रति जय प्रकाश तथा उनके मित्रों का विरोध कितना गलत एवं दुष्टतापूर्ण है।इससे आने वाले चुनाव में भी मदद मिलेगी।अस्तु मुझे तो इसकी चिंता बिल्कुल नहीं है।श्रीमती गांधी की प्रशंसा और जय प्रकाश की निंदा होती है तो हो।जहां तक मेरा संबंध है,लोकतंत्र के पक्ष में तथा भ्रष्टाचार के विरूध्द संघर्ष जारी रहेगा।
संपूर्ण क्रांति अब भी मेरा लक्ष्य है। 2 अक्तूबर को अपनी जेल डायरी में जय प्रकाश नारायण लिखते हैं,बापू,आपके चरणों में श्रध्दापूर्वक नमन।बापू का नाम तो बहुत लिया गया,लेकिन उनका काम बहुत थोड़ा हुआ।पिछले कुछ वर्षों र्से देश के विद्वान यह अनुभव करने लगे हैं कि बापू का बताया हुआ मार्ग छोड़ कर भारत ने बहुत बड़ी गलती की।जवाहर लाल के जमाने में इन्हीं विद्वानाें ने या इनके ही जैसे विद्वानों ने गांधी के मार्ग को दकियानूस माना और जवाहरलाल जी की माडर्न दृष्टि के वे प्रशंसक बने रहे। 
 
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