ताजा खबर
तो नोटबंदी से संगठित लूट हुई फिर गाली और गोली के निशाने पर कश्मीर विधायक पर फिर बरसी लाठी एमपी में बनेगा गाय मंत्रालय !
राम , कृष्ण और शिव

राममनोहर लोहिया 

राम, कृष्ण और शिव हिन्दुस्तान की उन तीन चीजों में हैं – मैं उनको आदमी कहूँ या देवता , इसके तो ख़ास मतलब नहीं होंगे – जिनका असर हिन्दुस्तान के दिमाग पर ऐतिहासिक लोगों से भी ज्यादा है । गौतम बुद्ध या अशोक ऐतिहासिक लोग थे । लेकिन उनके काम के किस्से इतने ज्यादा और इतने विस्तार में आपको नहीं मालूम हैं , जितने कि राम और कृष्ण और शिव के क़िस्से । कोई आदमी वास्तव में हुआ या नहीं , यह इतना बड़ा सवाल नहीं है , जितना यह कि उस आदमी के काम किस हद तक , कितने लोगों को मालूम हैं , और उनका असर है दिमाग़ पर । राम और कृष्ण तो इतिहास के लोग माने जाते हैं , हों या न हों , यह दूसरे दर्जे का सवाल है । मान लें थोडी देर के लिये कि वे उपन्यास के लोग हैं । शिव तो केवल एक किंवदंती के रूप में प्रचलित हैं । यह सही है कि कुछ लोगों ने कोशिश की है कि शिव को भी कोई समय और शरीर और जगह दी जाय । कुछ लोगों ने कोशिश की है यह साबित करने की कि वे उत्तराखंड के एक इंजीनियर थे जो गंगा को ले आये थे हिन्दुस्तान के मैदानों में ।
यह छोटे-छोटे सवाल हैं कि राम और कृष्ण और शिव सचमुच इस दुनिया में कभी हुए या नहीं । असली सवाल तो यह है कि इनकी जिन्दगी के किस्सों के छोटे-छोटे पहलू को भी ५ , १०,२०,५० हज़ार आदमी नहीं बल्कि हिन्दुस्तान के करोड़ों लोग जानते हैं।वह हिन्दुस्तान के इतिहास के किसी और आदमी के बारे में नहीं कहा जा सकता । मैं तो समझता हूँ , गौतम बुद्ध का नाम भी हिन्दुस्तान में शायद ज्यादा लोगों को मालूम नहीं होगा ।उनके किस्से जानने वाले मुशकिल से हजार में १-२ मिल जाएँ तो मिल जाएँ। लेकिन राम और कृष्ण और शिव के किस्से तो सबको मालूम हैं । दिमाग पर असर – असर सिर्फ इसलिए नहीं है कि उनके साथ धर्म जुड़ा हुआ है । असर इसलिये है कि वे लोग लोगों के दिमाग में एक मिसाल की तरह आ जाते हैं, और जिन्दगी के हरेक पहलू और हरेक काम – काज के सिलसिले में वे मिसालें आँखों के सामने या दिमाग की आँखों के सामने खड़ी हो जाती हैं ।तब,चाहे जानबूझकर , और चाहे अनजान में , आदमी उन मिसालों के मुताबिक खुद भी अपने कदम उठाने लग जाता है। अगर मिसाल सोच-समझ कर दिमाग के सामने आये तो उसका इतना असर नहीं पड़ता जितना बिना सोचे दिमाग में आ जाये । बिना सोचे कोई मिसाल दिमाग में आ जाये, सिर्फ यही नहीं कि वह मिसाल हो , बल्कि छोटे-छोटे किस्से भी याद हैं जैसे कि राम ने परशुराम को क्या कहा और किस वक्त कितना कहा- यह एक-एक किस्सा मालूम है। या जब शूर्पणखा आयी थी तो राम और लक्ष्मण और शूर्पनखा में क्या-क्या बातचीत हुई , या जब भरत आये राम को वापस ले जाने के लिए तब उनकी आपस में क्या-क्या बातें हुईं- इन सबकी एक-एक तफ़सील , इसने यह कहा ,और उसने वह कहा,मालूम है। इसी तरह से कृष्ण और अर्जुन की बातचीत और इसी तरह से शिव के किस्से हिन्दुस्तानी के दिमाग की सतह पर खुदे हुए रहते हैं। एक तो हुआ किस्सों का मालूम होना , दूसरे, किस्सों का दिमाग की सतह पर खुद जाना , तो फिर , वह हमेशा मिसाल की तरह दिमाग की आँखों के सामने रहते हैं , और किसी भी काम पर उनका असर पड़ा करता है ।
राम, कृष्ण और शिव ये कोई एक दिन के बनाये हुए नहीं हैं ।इनको आपने बनाया । इन्होंने आपको नहीं बनाया । आमतौर से तो आप यही सुना करते हो कि राम और कृष्ण और शिव ने हिन्दुस्तान या हिन्दुस्तानियों को बनाया ।किसी हद तक शायद यह बात सही भी हो,लेकिन ज्यादा सही यह बात है कि करोड़ों हिन्दुस्तानियों ने , युग-युगान्तर के अन्तर में , हजारों बरस में , राम , कृष्ण और शिव को बनाया । उनमें अपनी हँसी और सपने के रंग भरे और तब राम और कृष्ण और शिव जैसी चीजें सामने हैं ।
राम और कृष्ण तो विष्णु के रूप हैं और शिव महेश के । मोटी तौर से लोग यह समझ लिया करते हैं कि राम और कृष्ण तो रक्षा या अच्छी चीजों की हिफाज़त के प्रतीक हैं और शिव विनाश या बुरी चीजों के नाश के प्रतीक हैं । मुझे ऐसे अर्थ में नहीं पड़ना है । कुछ और हैं जिन्हें मजा आता है हरेक किस्से में अर्थ ढूँढ़ने में । मैं अर्थ नहीं ढूँढ़ूँगा । मुमकिन है सारा भाषण बेमतलब हो , और जितना बेमतलब होगा उतना ही मैं उसे अच्छा समझूँगा , क्योंकि हँसी और सपने तो बेमतलब हुआ करते हैं ।फिर भी , असर उनका कितना पड़ता है ? छाती चौड़ी होती है । अगर कोई कौम मौके-मौके पर ऐसी किंवदंतियों को याद करके चौड़ी कर लेती हो तो फिर उससे बढ़ कर क्या हो सकता है ? कोई यह न सोचे कि इस विषय से मैं कोई अर्थ निकालना चाहता हूँ – राजनीतिक अर्थ या दार्शनिक अर्थ या और कोई समाज के गठन का अर्थ । जहाँ तक बन पड़े , पिछले हज़ारों बरसों में जो हमारे देश के पुरखों और हमारी क़ौम ने इन तीनों किंवदंतियों में अपनी बात डाली है , उसको सामने लाने की कोशिश करूँगा ।
राम की सबसे बड़ी महिमा उनके उस नाम से मालूम होती है , जिसमें उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कह कर पुकारा जाता है । जो मन में आया सो नहीं कर सकते । राम की ताकत बँधी हुई है , उसका दायरा खिंचा हुआ है । राम की ताकत पर कुछ नीति की या शास्त्र की या धर्म की या व्यवहार की या , अगर आप आज की दुनिया का एक शब्द ढूँढ़ें तो , विधान की मर्यादा है ।जिस तरह किसी भी कानून की जगह , जैसे विधान सभा या लोकसभा पर विधान रोक लगा दिया करता है , उसी तरह से राम के कामों पर रोक लगी हुई है ।वह रोक क्यों लगी हुई है और किस तरह की है , इस सवाल में अभी आप मत पडिए ।लेकिन इतना कह देना काफ़ी होगा कि पुराने दक़ियानूसी लोग भी , जो राम और कृष्ण को विष्णु का अवतार मानते हैं , राम को सिर्फ़ ८ कलाओं का अवतार मानते हैं और कृष्ण को १६ कलाओं का अवतार । कृष्ण सम्पूर्ण और राम अपूर्ण । अपूर्ण शब्द सही नहीं होगा ,लेकिन अपना मतलब बताने के लिए मैं इस शब्द का इस्तेमाल किये लेता हूँ । ऐसे मामलों में , कोई अपूर्ण और सम्पूर्ण नहीं हुआ करता ,लेकिन ज़ाहिर है, जब एक में ८ कलाएँ होंगी और दूसरे में १६ कलाएँ होंगी , तो उसमें कुछ नतीजे तो निकल ही आया करेंगे ।
राम विष्णु के अवतार तो थे ही , चाहे ८ ही कला वाले । विष्णु को बात याद थी । न जाने कितने बरसों के बाद कुछ लोग कहते हैं , लाखों बरसों के बाद , हजारों बरसों के बाद , लेकिन मेरी समझ में , शायद , हजार दो हजार बरस के बाद – जब कृष्ण के रूप में वे आये , तो फिर एक दिन ,हजारों गोपियों के बीच कृष्ण ने भी अपनी लीला रचायी । वे १६,००० थीं या १२,००० थीं, इसका मुझे ठीक अन्दाज नहीं है । एक – एक गोपी के अलग-अलग से , कृष्ण सामने आये और बार-बार चन्द्रमा की तरफ देख कर ताना मारा , बोलो, अब हँसो । जो चन्द्रमा राम को देख कर हँसा था जब राम रोये थे , उसी चन्द्रमा को उँगली दिखा कर कृष्ण ने ताना मारा कि अब जरा हँसो , देखो तो सही । १६ कला और ८ कला का यह फर्क रहा ।
राम ने मनुष्य की तरह प्रेम किया । मैं इस समय बहस में बिलकुल नहीं पड़ना चाहता कि सचमुच कृष्ण ने ऐसा प्रेम किया या नहीं किया । यह बिलकुल फिजूल बात है । मैं शुरु में ही कह चुका हूँ कि ऐसी कहानियों का असर ढ़ूँड़ा जाता है , यह देख कर नहीं कि वे सच्ची हैं या झूठी , लेकिन यह देखकर कि उसमें कितना सच भरा हुआ है ,और दिमाग पर उसका कितना असर पड़ता है ।यह सही है कि कृष्ण ने प्रेम किया, और ऐसा प्रेम किया कि बिलकुल बेरोये रह गये ,और तब चन्द्रमा को ताना मारा । राम रोये तो चन्द्रमा ने विष्णु को ताना मारा,कृष्ण १६,००० गोपियों के बीच में बाँसुरी बजाते रहे ,तो चन्द्रमा को विष्णु ने ताना मारा । ये किस्से मशहूर हैं। इसी से आप और नतीजे निकालिये।
 
कृष्ण झूठ बोलते हैं , चोरी करते हैं, धोखा देते हैं, और जितने भी अन्याय के अधर्म के काम हो सकते हैं , वे सब करते हैं। जो कृष्ण के सच्चे भक्त होंगे , मेरी बात का बिलकुल भी बुरा न मानेंगे । मुमकिन है कि एकाध नकली भक्त गुस्सा कर कर जाए। एक बार जेल में मेरा साथ पड़ा था मथुरा के एक बहुत बड़े चौबे जी के साथ और मथुरा तो फिर मथुरा ही है। जितना ही हम उसको चिढ़ाना चाहें, वे खुद अपने आप कह दें कि हाँ वह तो माखनचोर था । हम कहें कृष्ण धोखेबाज था, तो वे जरूर कृष्ण का कोई न कोई किस्सा धोखे का सुना दें । जो कृष्ण के सच्चे उपासक हैं , उनको तो मजा मिलता है कृष्ण की झूठ , दगा और धोखेबाजी और लम्पटपन को याद करके । सो क्यों ? १६ कला हैं । मर्यादा नहीं ,सीमा नहीं , विधान नहीं है , यह ऐसी लोकसभा है जिसके ऊपर विधान की कोई रुकावट नहीं है , मन में आये सो करे ।
 
धर्म की विजय के लिये अधर्म से अधर्म करने को तैयार रहने का प्रतीक कृष्ण है । मैं यही तो किस्से नहीं बतलाऊँगा , पर आप खुद याद कर सकते हो कि कब सूरज को छुपा दिया जब कि वह सचमुच नहीं छुपा था , कब एक जुमले के आधे हिस्से को जरा जोर से बोलकर और दूसरे हिस्से को धीमे बोल कर कृष्ण झूठ बोल गये । इस तरह की चालबाजियाँ तो कृष्ण हमेशा ही किया करते थे । कृष्ण १६ कलाओं के अवतार किसी चीज की मर्यादा नहीं ।राम मर्यादित अवतार , ताकत के ऊपर सीमा जिसे वे उलाँघ नहीं सकते थे। कृष्ण बिना मर्यादा का अवतार ।लेकिन इसके यह मानी नहीं कि जो कोई झूठ बोले और धोखा करे वही कृष्ण हो सकता है । अपने किसी लाभ के लिए नहीं,अपने किसी राग के लिए नहीं ।राग शब्द बहुत अच्छा शब्द है हिन्दुस्तान का ।मन के अन्दर राग हुआ करते है, राग चाहे लोभ के हों,चाहे क्रोध के हों ,चाहे ईर्ष्या के हों, राग होते हैं ।यह सब , वीतराग भय ,क्रोध जिसकी चर्चा हमारे कई ग्रन्थों में मिलती हैं, भय, क्रोध , राग से परे ।धोखा,झूठ,बदमाशी और लम्पटपन कृष्ण का , एक ऐसे आदमी का था ,जिसे अपना कोई फायदा नहीं ढ़ूँढ़ना था,जिसे कोई लोभ नहीं था,जिसे ईर्ष्या नहीं थी,जिसे किसी के साथ जलन नहीं थी, जिसे अपना कोई बढावा नहीं करना था । यह चीज मुमकिन है या नहीं, इस सवाल को आप छोड़ दीजिये। असल चीज है,दिमाग पर असर कि यह सम्भव है या नहीं । हम लोग इसे सम्भव मानते भी हैं , और मैं खुद समझता हूँ कि अगर पूरा नही तो अधूरा , किसी,न किसी रूप में यह चीज़ सम्भव है ।
(ये लेख १९५५ का है.जन्माष्टमी पर मचे धार्मिक और बाजारू हल्ले के बीच यहाँ उसका संक्षिप्त प्रारूप प्रस्तुत है )
email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • मै संघी बनते बनते रह गया !
  • संकट में है गांगेय डॉल्फिन
  • चंचल का चैनल
  • जहां पत्रकारिता एक आदर्श है
  • जहां आये कामयाब आये
  • नामवर की नियति
  • चिड़िया ते बाज तुड़वाऊं?
  • प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार
  • एक ऋषि की यात्रा का अंत
  • असली मैदान तो यूपी बनेगा
  • राजकाज
  • भगतों की चांदी है
  • मेरठ के बांके!
  • बाबरी विध्वंस की आयी याद
  • इतिहास में उपेक्षित तिलका मांझी
  • आखिरी पड़ाव गोमोह जंक्शन
  • संगम के अखाड़े में लेफ्ट-राइट
  • एक थे लोकबंधु राजनारायण
  • अपनी जमीन ही नसीब हुई
  • रवीश के सामाजिक सरोकार
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.