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व्यवस्था नैतिक नहीं, राजनीतिक है

बनवारी
 पंद्रह अगस्त 1947 सभी भारतीयों के लिए बहुत महत्त्व का दिन था। यह स्वाभाविक ही था कि अंग्रेजी राज की विदाई का यह अवसर आम भारतीयों में भावोद्रेक का अवसर रहा हो। लेकिन गांधीजी स्वतंत्रता के इस उत्साह से अपने आपको अलग रखे हुए थे। वे कलकत्ता में थे और उनकी तात्कालिक समस्या हिंदू-मुसलिम संघर्ष को शांत करने की थी। भारत के बंटवारे ने उन्हें आहत किया था। लेकिन अन्यमनस्कता का कारण देश का बंटवारा और हिंदू-मुसलिम संघर्ष ही नहीं था। यह वह स्वतंत्रता नहीं थी जिसका सपना देखते हुए उन्होंने अपने आपको भारत के स्वतंत्रता संग्राम में झोंका था। वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के घोषित सेनापति थे।
कांग्रेस की कमान अपने हाथ में लेते हुए उन्होंने उसका कायाकल्प करने का प्रयत्न किया था। उसे यूरोपीय विचारों में निष्णात नेताओं के प्रभाव से बाहर निकाल कर समाज-व्यापी बनाने का प्रयत्न किया था। लेकिन इस उद््देश्य में कांग्रेस के पुराने नेताओं से अधिक 1930 के आसपास कांग्रेस में सम्मिलित हुई पढ़े-लिखे युवकों की नई पीढ़ी बाधा बनी। नेहरू उस पीढ़ी के नेता थे और स्वाधीनता संग्राम में बिना किसी महत्त्वपूर्ण योगदान के वे कांग्रेस की कमान संभालने के लिए उतावले थे। 1929 के जवाहरलाल नेहरू का कांग्रेस अध्यक्ष बनाना और पूर्ण स्वराज्य का नारा लगाना इसी की झलक था।
सबको साथ लेकर चलने की अपनी नीति के कारण गांधीजी इन नेताओं की महत्त्वाकांक्षा में बाधक नहीं बने। नेहरू भी उनकी इच्छा और प्रोत्साहन से कांग्रेस अध्यक्ष हुए थे। गांधीजी को उनके हृदय परिवर्तन और विचार परिवर्तन की क्षीण-सी आशा थी, पर वह पूरी नहीं हुई। गांधीजी देख रहे थे कि नई पीढ़ी सत्ता परिवर्तन के लिए उतावली है, भारत के स्वराज के लिए नहीं। उन्होंने नमक सत्याग्रह के द्वारा कांग्रेस का ध्यान मात्र सत्ता परिवर्तन से उठा कर भारतीय समाज के नवजागरण में लगाने की कोशिश की, पर सफल नहीं हुए। परिणामस्वरूप 1934 में वे कांग्रेस से अलग होकर अकेले भारत की परिक्रमा करते हुए उसे समर्थ और क्रियाशील बनाने में लग गए। इस अवसर का उपयोग अंग्रेजों ने नेहरू और उनके सहयोगियों से अपना संपर्क बढ़ाने के लिए किया।
गांधीजी ने इसके परिणामों से आशंकित होकर 1942 में ‘भारत छोड़ो’ नारा दिया, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध में विजय ने अंग्रेजी शासन को बचा लिया। पर अंग्रेजों को यह दिख गया था कि वे भारत में अधिक दिन तक नहीं रह पाएंगे। उसके बाद उनकी चिंता अपनी राजतंत्रीय विरासत बचाने की थी और वे जानते थे कि अपनी वयशीलता के बावजूद गांधी उनकी इस विरासत को कभी भी छिन्न-भिन्न कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने 1946 आते-आते भारत छोड़ने का निर्णय कर लिया। अपने निर्देश में उन्होंने पहले संविधान सभा बनवाई, फिर भारत की स्वतंत्र सरकार बनवाई जिसकेमुखिया माउंटबेटन थे। संविधान सभा ने अंग्रेजपरस्त बीएन राव का लिखा जो संविधान 1950 में देश को दिया उसके घोर प्रशंसक भी यह मानते थे कि उसमें भारतीय सभ्यता, उसके विचारों और संस्थाओं की कोई झलक नहीं है। वह भारतीय समाज पर यूरोपीय विचारों और संस्थाओं का प्रतिरोपण मात्र था। संपूर्णानंद तक ने उसे लज्जाजनक कहा था।
पिछले छह दशकों में हमने इस व्यवस्था को चरमराते हुए देखा है। हमारे अनेक निष्ठावान और विचारशील नेताओं ने इस व्यवस्था को बदलने का नारा लगाया है। उनके आंदोलन के परिणामस्वरूप सत्ता परिवर्तन हुए हैं। लेकिन व्यवस्था परिवर्तन एक मरीचिका ही बना हुआ है। महात्मा गांधी के समय में देश में अंग्रेजी पढ़े-लिखे और यूरोपीय सभ्यता में दीक्षित लोगों की जितनी संख्या थी, अंग्रेजी शिक्षा के व्यापक प्रसार की बदौलत अब उसका बहुत अधिक विस्तार हो गया है। देश के राजनीतिक और सांस्थानिक जीवन में उनका प्रभुत्व है। वे यूरोपीय विचारों और व्यवस्था से बाहर आकर सोच ही नहीं सकते।
इसलिए व्यवस्था परिवर्तन का नारा लगाने वाले लोग भी घूम-फिर कर उसी व्यवस्था में विकल्प तलाशते रहते हैं। यह एक ऐसी विवशता बन गई है जिससे मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। क्योंकि यूरोपीय विचारों और व्यवस्था का तंत्र इतना विस्तृत है कि जब तक उसके मूल आधारों पर ही आघात न किया जाए तब तक उसके जादू को तोड़ा नहीं जा सकता। वह प्रेतबाधा की तरह हमारे चिंतन और पुरुषार्थ को आविष्ट किए हुए है।
महात्मा गांधी जिस स्वराज के लिए अपना तपस्यापूर्ण संघर्ष कर रहे थे, वह एक नैतिक व्यवस्था थी। उसमें समाज प्रधान था और अपने कई हजार वर्षों के अनुभव से उसने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक तंत्र खड़ा किया था। यह तंत्र देश और काल के अनुरूप निरंतर परिष्कृत और परिवर्धित होता रहा था। उसी ने भारत को सभ्यता की उस ऊंचाई पर पहुंचाया था जिस पर महात्मा गांधी के ‘हिंद स्वराज’ की भाषा में, कोई और नहीं पहुंचा था। यह तंत्र समाज के सत्य, शौर्य और मांगल्य की रक्षा में समर्थ था। वह समाज के पुरुषार्थ को सभी दिशाओं में क्रियाशील रखता था।मगर कोई भी तंत्र काल के आरोह-अवरोह से बच नहीं पाता। हम भी नहीं बच पाए और पश्चिम से आई आंधियों ने हमें अस्त-व्यस्त कर दिया। पहले इस्लाम का झंडा लहराते हुए अरब, तुर्क, मुगल और अफगानी कबीले आए। फिर पुर्तगाली, फ्रांसीसी, डच और अंग्रेज। हम उनसे बहुत-सी लड़ाइयां जीते, पर और बहुत-सी   हार गए और हमें पराधीनता का थोड़ा लंबा समय झेलना पड़ा।
लेकिन इन आंधियों ने हमें ही नहीं, अरब और यूरोपीय राजसत्ताओं को भी तहस-नहस किया। लेकिन उनमें से कोई यह नहीं सोचता कि उनकी पराजय का कारण उनकी सभ्यता या व्यवस्था की कोई बड़ी कमजोरी थी। बल्कि उनके इतिहास में यही शिक्षा दी जाती रही है कि वे असंस्कृत लड़ाकू कबीलों के हाथों पराजित हुए। ऐसी आंधियां आती रहती हैं। चीन को तो उनसे बचने के लिए अपनी सीमाओं पर चारों तरफ एक विशाल दीवार बनवानी पड़ी। फिर भी उन्हें पहले मंगोलों और फिर मांचू विजेताओं की अधीनता में रहना पड़ा। अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव में आने से पहले भारतीय भी अपने आक्रांताओं को बर्बर ही मानते थे। अंग्रेजों की शिक्षा ने ही उन्हें आक्रांताओं को श्रेष्ठ सभ्यता के वाहक के रूप में देखना सिखाया।
भारत में सदा सत्य की रक्षा के लिए आचार्यों की, शौर्य की रक्षा के लिए राजवंशों की ओर मांगल्य की रक्षा और अभिवृद्धि के लिए पंचायतों की सर्वमान्य भूमिका रही है। इस पूरी व्यवस्था में राजतंत्र की भूमिका सीमित थी। बल्कि यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि सभी संप्रदाय, राजवंश और नगर तथा ग्राम पंचायती व्यवस्था के नियमों से ही परिचालित होते थे। राजसत्ता का काम व्यवस्था बनाना नहीं उसकी रक्षा करना था। शास्त्रीय रूप से शासन का अधिकार आचार्य, राजशक्ति और पंचायतों सभी को था। लेकिन व्यवहार में आचार्य और राजशक्ति दोनों की भूमिका और क्षेत्र सीमित थे। दैनंदिन शासन तो औपचारिक और अनौपचारिक पंचायतों द्वारा ही होता था। इस शासन प्रणाली का उद््देश्य लोगों का नियंत्रण नहीं था, जैसा कि यूरोप में सदा रहा है और डेमोक्रेसी के तमाशे के बावजूद आज भी है। उसका उद््देश्य सामाजिक-भौतिक जीवन का नियमन करते हुए धर्म की, नैतिक जीवन की रक्षा करना और उसकी अभिवृद्धि करना था।
पंचायती शासन का अर्थ है स्वशासन, स्वराज्य। वह जिन दार्शनिक मान्यताओं पर खड़ा है उनके अनुसार यह संसार सनातन धर्म पर ही टिका है। उसे समझने की बुद्धि सब मनुष्यों में है। उचित-अनुचित की यह समझ ही न्याय है और इस न्यायबुद्धि की रक्षा और उसका उपयोग करते हुए सामाजिक-भौतिक जीवन का संचालन करना ही स्वशासन का उद्देश्य है। इस स्वशासन की मूल इकाई पंचायत है। यह याद रखना चाहिए कि पंचायत का मूल लक्ष्य एक नैतिक व्यवस्था बनाना और उसकी रक्षा करना है, उसकी राजनीतिक भूमिका इसकी अंतरंग ही हो सकती है। यूरोप में शासन का अर्थ सदा नियंत्रण रहा है, क्योंकि वहां न यूनानी दर्शन में सब लोगों को विवेक से युक्त माना गया, न ईसाई धर्म में।
यूनानी दर्शन ने केवल तर्कशील गिने-चुने लोगों को बाकी सबका जीवन नियंत्रित करने का अधिकार दिया। ईसाई धर्म में तो मनुष्य मात्र एक पतित प्राणी ही माना गया है, केवल उसके पारलौकिक उद्धार की कल्पना की गई है, अगर वह ईसा के वचन पर श्रद्धा रख कर यहोवा अर्थात ईसाई ईश्वर में निष्ठा रखता है। इसलिए यूरोपीय तंत्र में स्वतंत्रता को सदा आशंका की दृष्टि से ही देखा गया।
औद्योगिक क्रांति से पहले तक यूरोपीय समाज में स्वतंत्रता का उपयोग राजा और वह कुलीन तंत्र ही करता था जो कुल आबादी के एक प्रतिशत से अधिक नहीं था। ब्रिटेन में राजा, चर्च और कुलीन परिवारों का देश की पचहत्तर प्रतिशत भूमि पर अधिकार का। सोलह-सत्रह प्रतिशत किसानों की भूमि पर स्वामित्व की सीमित मान्यता थी और उनके पास  कोई बीस प्रतिशत भूमि थी। अस्सी प्रतिशत बाकी किसान भू-दास या दास की श्रेणी में आते थे और उनके भरण-पोषण के लिए केवल पांच प्रतिशत खेतिहर भूमि थी। औद्योगिक क्रांति ने उन्हें कुलीन तंत्र के नियंत्रण से मुक्त करके राज्य के नियंत्रण में पहुंचा दिया। वह व्यवस्था नैतिक नहीं, राजनीतिक है। यह भी एकतंत्रीय व्यवस्था ही है जिसमें नियमन का अधिकार केवल राजसत्ता को है जो केवल औपचारिक रूप से जनप्रतिनिधि है।
जवाहरलाल नेहरू ने 1929 में जब  पूर्ण स्वराज्य की मांग की थी, उनके सामने अंग्रेजों की बनाई व्यवस्था में भारतीयों के शासन से अधिक कुछ नहीं था। उन्हें यह समझ में नहीं आ सकता था कि अंग्रेजों ने भारतीयों को केवल सत्ता से बाहर नहीं किया, उनके शासन करने के तरीके को ही उलट दिया है। अंग्रेजों ने भारत के पंचायती जीवन को नष्ट करके एक ऐसी राजसत्ता की नींव रख दी है जो सब भारतीयों के जीवन को नियंत्रित करने का एकछत्र अधिकार लिए हुए है। जिस ‘रूल आॅफ लॉ’ की हम बात करते हैं वह कुछ लोगों द्वारा पूरे देश के लिए बनाया गया एक ऐसा कानूनी ढांचा है जो देश-काल की चिंता किए बिना एक डंडे से सबको हांकने की तरह है।
यूरोप में ‘रूल आॅफ लॉ’ एक प्रगतिशील अवधारणा हो सकती है जहां पंचानबे प्रतिशत आबादी पांच प्रतिशत कुलीन तंत्र की अधीनता में थी, भारत में नहीं, जहां सभी लोग अपने तंत्र में स्वतंत्र थे। यूरोपीय विचारों के प्रभाव में हमने अपनी नैतिक व्यवस्था को छोड़ कर एक राजनीतिक व्यवस्था को अपना लिया है। हमें आज अपने सामाजिक जीवन में और सामूहिक संस्थाओं में अनैतिकता, लूट-खसोट और भ्रष्टाचार दिखाई देता है, पर यह दिखाई नहीं देता कि सामाजिक जीवन के राजनीतिकरण का यह अवश्यंभावी परिणाम है।
राजनीति की संचालक शक्ति प्रभुता है और उसकी होड़ नैतिक जीवन की संभावना को निर्मूल कर देती है। अगर आपको भारतीय सभ्यतागत विचारों की   स्मृति हो तो यह स्थिति बड़ी भयकारी दिखेगी कि हमारे सार्वजनिक जीवन का हर क्षेत्र राजनीति द्वारा नियंत्रित-संचालित है। हमने अपने देशवासियों की स्वतंत्रता एक ऐसे सत्ताकामी वर्ग को सौंप दी है जो यूरोपीय विचारों की दासता में पड़ा है और पूरे भारतीय समाज के पुरुषार्थ को बाधित किए हुए है।जनसत्ता

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