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पंडित जी ! प्रणाम ......

चंचल  

३ सितम्बर को पंडित जी का जन्म दिन है .मै नहीं जानता औरंगाबाद क्या कर रहा है ,लेकिन इतना दावे के साथ कह सकता हूँ कि आज भी बहुत सारे लोग हैं जिनके जेहन में पंडित जी ज़िंदा है और लोग उन्हें प्रणाम कर रहें हैं .( औरंगाबाद बनारस का एक सकसा हुआ मोहल्ला है जिसका जिक्र होते ही पंडित जी उठ खड़े होते हैं ,औरंगाबाद प्तातीक बनचुका है पंडित जी का ,उनकी अगली पीढ़ियों का -पंडित कमला पति त्रिपाठी , लोकपति त्रिपाठी ,राजेश पति त्रिपाठी ,और अब ललितेश त्रिपाठी .गरज यह कि इस घर में एक से एक विद्वान हैं जिनका जिक्र नहीं कर रहा हूँ .) ....हमने पंडित जी को पहली दफा जौनपुर में देखा .पंडित जी चंदौली से चुनाव हार गए थे .जौनपुर के उप चुनाव में वे जौनपुर आ गए थे .पंडित जी सर्किट हाउस में कांग्रेसियों से घिरे बैठे थे .पता नहीं कैसे अचानक मै चला गया उन्हें देखने .पंडित जी  लान में बैठे थे .उनके बैठने का अंदाज भी कमाल का रहा एक पाँव जमीन पर दूसरा घुटने पर .लोग आ रहें थे और उस पैर को छू कर प्रणाम कर रहें थे जो दूसरे पैर पर टिका पड़ा था .मै गया और हाथ जोड़ कर प्रणाम किया .और वही खड़ा हो गया .पंडित जी ने गौर से देखा .तब तक किसी ने मेरा परिचय मेरे दादा के हवाले से दिया .( आजादी की लड़ाई में हमारा परिवार क्रांतिकारी माना जाता रहा है ) पंडित जी मुस्कुराए .. तुम उनके नाती हो ...किसी ने आगे बताया -ये समाजवादी है .पंडित जी मुस्कुराए ... बोले कुछ नहीं .अब लगता है पंडित जी को समाजवाद से मोह था शायद आजीवन .( बाद के दिनों में धर्मयुग में  डॉ शिव प्रसाद सिंह के एक लेख में इसका जिक्र है कि कांग्रेस समाजवादी की एक बैठक में डॉ लोहिया ने पंडित जी के माथे पर लागे तिलक को लेकर पंडित जी को झिडकी दी थी ) पंडित जी से  वह पहली मुलाक़ात और फलाने के नाती आजीवन बना रहा .
     जौनपुर छोड़ कर जब बनारस पहुचा और विश्वविद्यालय की राजनीति में सक्रीय हुआ तो पंडित जी के पूरे परिवार से जुड गया ,गो कि हम समाजवादी रहें और पग-पग पर कांग्रेस के विरोध में रहे.चूंकी विश्वविद्यालय में छात्रों के बीच कांग्रेस न के बराबर रही और समाजवादियों की टक्कर संघी घराने से होती रही इसमें कांग्रेस गाहे ब गाहे समाजवादियों के साथ आ खड़ी होती .पंडित जी के नाती आबू (पूरा नाम राजेश पति त्रिपाठी है आज कांग्रेस के अगली कतार के नेता हैं हम लोग इन्हें आबू के नाम से संबोधित करते रहे.) से हमारी दोस्ती हो गयी जो अब तक चल रही है. ७३ छात्र संघ के चुनाव में भाई मोहन प्रकाश समाजवादी खेमे से चुनाव मैदान में थे .मुकाबला संघ से था .कांग्रेस और कम्युनिस्ट ने भी अपने अपने उम्मीदवार लड़ाए थे .एक दिन हमारे नेता देबूदा ( देवब्रत मजुमदार ) ने मुझे अकेले बुला कर कहा - पंडित आये हुए हैं तुम उनसे मिल आवो ,कुछ मदद कर दे तो अच्छा रहेगा .सांझ को बचते बचाते मै औरंगा बाद पहुचा .आबू को पहले से ही मालुम था सो उन्होंने अकेले में मिलवाने की व्यवथा कर रखी थी .पंडित जी से यह आत्मीय मुलाक़ात थी .संकोच्वास मै उनसे चंदे की बात नहीं कर सका .और सोच लिया कि देबूदा से झूठ बोल दूंगा कि उन्होंने कुछ भी नहीं दिया .उठकर चलने लगा तो पंडित जी ने रोका - जाने के पहले बहू जी से मिल लेना ( आबू की मा चंद्रा त्रिपाठी जी ) और जब बहूजी से मिला तो उन्होंने जीत की अग्रिम बधाई दी और हाथ में धीरे से एक लिफाफा पकड़ा दिया और बोली -और जरूरत पड़े तो हमें बता देना .
       एक और घटना का जिक्र करना चाहूँगा .७१ में कांग्रेस के सहयोग से उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह की सरकार थी .चौधरी चरण ने छात्र संघों को भंग कर दिया था .पूरे सूबे में छात्र उबाल पर थे .तमाम छात्र नेतावों पर अपराधिक मुक़दमे दर्ज हो चुके थे .लोग पकडे जा रहें थे .हम पर भी वारंट था और पुलिस बड़े मुस्तैदी से हमारी तलाश में थी .काफी सोच विचार के बाद तय हुआ कि अब क्या किया जाय . इसी बीच चौधरी चरण की सरकार गिर गयी और पंडित जी मुख्य मंत्री बन गए लेकिन पुलिस हमारीतालाश में लगी रही .और हमलोग पंडित जी के घर में डेरा डाले पड़े रहे. यह आबू की दोस्ती थी .एक दिन अचानक पंडित जी औरंगाबाद आ पहुचे .ठीक उसी समय हम लोंगो के लिए खाना लगाया जा रहा था .पंडित जी ने बहूजी पूछा कोइ आया है क्या ? बहूजी मुस्कुराई और बोलीं आबू के दोस्त लोग हैं .पंडित जी को अजीब लगा होगा कि आबू के दोस्त ..... न कोइ दुआ न बंदगी ...पंडित जी उठे और सीधे उसी कमरे के सामने आगये जहां हम लोग पसरे पड़े थे .हम लोंगो ने प्रणाम किया .पंडित जी मुस्कुराए ..अच्छा तो तुम लोग मेरे ही घर में ....अपने सचिव को कहा -डी यम और यस.पी को यहीं बुला लो .और पंडित जी वहीं दरवाजे पर कुर्सी लगा कर बैठ गए .थोड़ी देर में डी यम और यस पी सामने .पंडित जी ने पहला सवाल पूछा -उन  नेताओं की गिरफ्तारी क्यों नहीं हो रही ? एस पी ने कहा -दबिस डी जा रही है मिल नहीं रहें हैं .. पंडित जी मुस्कुराए कहाँ दे रहें हो दबिस .. मुख्यमंत्री के घर दबिस दिया ? ... हमने समझा अब गए काम से ..पंडित ने कहा तुम लोग नहीं पकड़ पाओगे .. ये सब यहीं है ...अब इन्हें पकडना भी नहीं ... कल लखनऊ पहुच कर इन पर लगे मुकदमे वापस ले लुऊंगा .. परेशान मत हो .. कम से कम मेरा खर्चा तो कुछ कम हो ... और हम मुस्कुराते हुए बाहर आगये ...
   कांग्रेस के अंदरूनी खांचे में समाजवाद बनाम जड़वाद / नेहरू बनाम पटेल / उत्तर परदेस में गुप्ता बनाम गौतम / की एक कड़ी चरण बनाम पंडित जी हमने आखन देखी का जिक्र किया .पंडित जी के पास तिलक भी था और समाजवाद भी .इन्ही पंडित जी का ऐलान था -बाबरी  मस्जिद पर एक भी फावड़ा गिरेगा तो वह मेरी पीठ पर गिरेगा . प्रणाम पंडित जी .
 
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