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कोच्चि के बंदरगाह पर

अंबरीश कुमार
कोच्चि के समुंद्री बंदरगाह पर खड़ा एमवी टीपू सुलतान का  जैसे लंगर उठा तो हमें छोड़ने आए राकेश सहाय हाथ हिला कर विदा हुए . जहाज की मंजिल थी कावरेत्ती .लोकेशन १०-३३ * उत्तरी अक्षांश ,७२,-३८* पूर्वी अक्षांश ,कोच्चि से दूरी ४०४ किलोमीटर .जहाज के छूटने में घंटे भर की देरी हो चुकी थी .कोच्चि की उमस भरी गर्मी से डेक पर आते ही हवा के झोके से कुछ राहत मिली . एक दिन पहले ही राकेश के साथ एक माल में जाकर पंद्रह दिन का खाने पीने का सामान खरीदा था क्योकि कावरेत्ती में दस पंद्रह दिन बाद ही जहाज जाता था जिसके जरिए दल चावल से लेकर शाक सब्जी पहुंचाई जाती थी .कावरेत्ती केंद्र शासित लक्षद्वीप का मुख्यालय है जहाँ दस दिन रुकने के लिए वहा पर डेपुटेसन पर गए हमारे मित्र डाक्टर नीरज सक्सेना ने परमिट बनवाया था क्योकि आप पर्यटकों को लक्षद्वीप के बंगरम द्वीप को छोड़कर किसी और जगह रुकने की इजाजत नहीं थी .पर्यटकों को ले जाने वाले जहाज द्वीप द्वीप घूमते और सैलानियों को घूम फिर कर लैगून से बाहर खड़े जहाज पर शाम ढलते लौटना पड़ता था .

उत्तर भारतीय लोगो के खान पान का इंतजाम दक्षिण में गड़बड़ा जाता है .दाल भात और सब्जी के बिना ज्यादा दिन रहा नहीं जाता .इसी वजह से कोच्ची के माल से नाश्ते में पोहा ,उपमा ,दलिया आदि बनाने का सारा सामान तो ख़रीदा ही साथ ही दाल और बासमती चावल भी .नीरज वहां अकेले थे क्योकि परिवार दिल्ली आ गया था .इसी वजह से सब सामान ले लिया था . लक्षद्वीप में हमें तीन द्वीप कावरेत्ती,अगाती और बंगरम में रुकना था .राकेश सहाय से दोस्ती लखनऊ विश्विद्यालय के दिनों से है .वे गोंडा के रहने वाले है और कोच्चि में मछुवारों के जाल का सिंथेटिक धागा बनाने की एक निर्यात इकाई के साथ कई अन्य व्यवसाय से जुड़े है और साल में कई महीने विदेश रहते है .मेरा कार्यक्रम बना तो उन्होंने ही सारा इंतजाम किया .रहने का इंतजाम एक रिसार्ट में किया पर मै उनके घर पर ही रुका था .एक दिन पहले वे कोच्चि के किसी आलिशान क्लब में रात के खाने पर ले गए और कई उत्तर भारतीय लोगों से मुलाकात भी करवाई .देर रात लौटने के बाद भी जल्दी जग गए थे और कावरेत्ती का जहाज पकड़ने के लिए नाश्ते के बाद निकल गए थे .कोच्चि काफी खूबसूरत शहर है और समुंद्र के किनारे मछुवारों के बल्लियों में बंधे जाल के फोटो काफी लोकप्रिय है .

पानी के जहाज की यात्रा की शुरुवाती कवायद भी हवाई जहाज से मिलती जुलती है .सब निपटाकर केबिन में पहुंचे जो चार बर्थ का था .यह केबिन रेलगाड़ी के पुराने फर्ष्ट क्लास की याद दिला रहा था .सामने गोल सी खिड़की से शहर दूर जाता दिख रहा था .नीरज साथ थे और आकाश के बुखार की वजह से सविता डेक पर जाने की इच्छुक नहीं थी .बैरे ने चाय और खाने का समय पहले ही बता दिया था .शाम साढ़े तीन से चार बजे तक चाय का समय था और रात आठ बजे से पौने नौ बजे तक डिनर का.फिर सुबह की चाय छह से साढ़े छह के बीच मिलने वाली थी और नाश्ता सात से साढ़े सात के बीच .पर रेस्तरां में जाने पर समय के बाद भी चाय काफी और खाने का सामान मिल जाता .शाम होते ही हम केबिन से बाहर आ डेक पर जम गए .जहाज समुंद्र को चीरता हुआ आगे बढ़ रहा था और सभी तरफ पानी ही पानी .तेज लहरें दौडती हुई आती और जहाज के निचले हिस्से से टकरा कर ढेर हो जाती . दहकते सूरज को को देखने में लीन थे तभी हनीमून पर जा रहे एक जोड़े ने सूरज ,समुंद्र और जहाज के साथ फोटो खीचने का आग्रह किया तो ध्यान टूटा ..समुंद्र में पानी के जहाज पर सूर्यास्त और सूर्योदय का दृश्य बांध कर रख देता है .समुंद्र और सूरज का मिलन नए नए लैंडस्केप बनाता है .सूरज के डूबने के बाद भी उसकी लालिमा समुंद्र पर दिखाई पड़ती है .

रात के साढ़े आठ बजे खाने पर गए तो पता चला शाकाहारी भोजन में आलू टमाटर की सब्जी और बाकी के लिए मछली चावल है . मछली चावल खाने वाला मै ही था .पता चला टूना मछली बनाई गई है जो स्वाद में खट्टी और चिकन की तरह खींचने वाली होती है .टूना जापान में बहुत लोकप्रिय है और कोच्चि में लक्षद्वीप से आती है .खाने के बाद फिर तारों की रोशनी में समुंद्र को देखने लगे जो अब कुछ हद तक डरावना हो चूका था .लहरों की आवाज डरा रही थी .नीला पानी अब काला नजर आ रहा था .हवा भी तेज और ठंढी होती जा रही थी .ज्यादातर मुसाफिर अपने अपने केबिन का रुख कर चुके थे .खारे पानी की नमकीन हवाओं के थपेड़े के आगे खड़ा हो पाना जब मुश्किल हो गया तो केबिन में आ गए .ऊपर की बर्थ पर लेटा तो कुछ ही देर में असहज होने लगा .लग रहा था पालने में झूल रहा हूँ .कब नींद आ गई पता ही नहीं चल पाया .सुबह तडके नींद खुल गई तो शीशे की गोल खिडकी से बाहर काफी उजाला नजर आया .चाय से पहले ही सूरज को देखने बाहर आ गए .पूरब की तरफ अँधेरा छट रहा था .कुछ देर में ही समुंद्र लाल होता नज़र आने लगा इस बीच सूरज और समुंद्र के अनोखे दृश्य दिखाई पड़े .सूरज समुंद्र से बाहर निकला तो पूरे डेक पर सैलानी आ चुके थे .

एक बार फिर हम केबिन में लौटे .इस बार उतरने की तैयारी करनी थी .यह जहाज लैगून में नहीं जा सकता था इसलिए गहरे समुंद्र में ही मोटर बोट से जेटी तक जाना था .करीब ग्यारह बजे खिड़की से समुंद्र में हरियाली नज़र आई .नारियल के पेड़ों का जंगल एक गुलदस्ते की तरह उभर रहा था .जो कुछ ही देर में हरे भरे बगीचे के रूप में दिखाई देने लगा .तभी गहरे समुंद्र में ही जहाज ने लंगर डाल दिया .अब हमें सबसे निचली मंजिल पर जाकर मोटर बोट पर बैठना था .जहाज से मोटर बोट पर उतरना भी काफी मुश्किल कवायद है .एक रस्से के सहारे जहाज से मोटर बोट पर जाते है .गहरे समुंद्र की वजह से मोटरबोट लहरों पर उछलती रहती है .फिर गहरे समुंद्र में लगता है मोटर बोट पलट जाएगी .पर लैगून आते ही जान में जान आ जाती है .कावरेत्ती की जेटी करीब आधा किलोमीटर लम्बी है जिसके एक छोर पर हम उतरे तो डाक्टर नीरज के सहयोगी स्वागत में खड़े थे.

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