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झेलम के हाउसबोट पर

अंबरीश  कुमार
बात पुरानी है । किसी काम से दूसरी बार पठानकोट तक गया था तो वहां से घूमते हुए जम्मू पहुँच गया । जम्मू और श्रीनगर दोनों जगह अपने  बचपन के मित्र थे । पता चला जम्मू से रात भर में श्रीनगर पहुंचा जा सकता है । अकेले था इसलिए जाने का फैसला आनन् फानन में कर लिया । देर शाम एक खटारा सी बस मिल गई जिसपर बैठते ही काफी थके होने की वजह से नींद भी आ गई । अचानक ठंढ और तेज हवा चलने जैसी आवाज से नींद खुली तो चारो और सफेदी नजर आई । बगल के मुसाफिर ने बताया पटनीटाप आ गया है और भारी बर्फबारी की वजह से बर्फ रुक गई है । अपने पास कुल एक हाफ स्वेटर था जिसे निकाल लिया । जीवन में पहली बार बर्फ गिरते देख रहा था । बहार निकला तो महसूस हुआ कोई रुई के फाहे ऊपर फेंक रहा है । पास ही चाय की दुकान पर लोग इकठ्ठा रहे । चाय पी गई और कुछ देर बाद बस चल पड़ी । आँखों में नीद भारी थी और बगल वाले ने तरस खाकर कम्बल दे दिया जिससे गरमी मिली और फिर उठे तो बताया गया जवाहर टनल के आगे बर्फ के चलते रास्ता बंद है । वही पास के ढाबे में चाय और अंडा पराठा का नाश्ता हुआ और तबतक बर्फ साफ़ करने वाले कर्मचारियों ने रास्ता साफ़ कर डाला था । चारो और बर्फ और खाई में गिरे ट्रक भी नजर आ रहे थे जिनसे गिरा सेव बिखरा हुआ था । सफ़र फिर शुरू हुआ और दोपहर तक श्रीनगर पहुंचे तो अभिभूत थे । यह वाही जगह थी जिसे देख मुगल बादशाह जहांगीर ने कहा था  ‘गर फ़िरदौसे बर रुए ज़मीन अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त.’ मतलब ‘यदि जमीन पर कहीं स्वर्ग है तो यही है, यही है। अब हम स्वर्ग में थे और एक ही दिन रुक कर वापस लौटना चाहते थे इसलिए हाउसबोट तलाशने लगे तो किसी ने झेलम का रास्ता बता दिया और मोलभाव कर एक हाउसबोट में रुक गए । जिसके बारे में लिखा हुआ मिला 'आज हाउसबोट एक तरह की लग्जरी में तब्दील हो चुके हैं और कुछ लोग दूर-दूर से केवल हाउसबोट में रहने का लुत्फउठाने के लिए ही कश्मीर आते हैं। हाउसबोट में ठहरना सचमुच अपने आपमें एक अनोखा अनुभव है भी। पर इसकी शुरुआत वास्तव में लग्जरी नहीं, बल्कि मजबूरी में हुई थी। कश्मीर में हाउसबोट का प्रचलन डोगरा राजाओं के काल में तब शुरू हुआ था, जब उन्होंने किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कश्मीर में स्थायी संपत्ति खरीदने और घर बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय कई अंग्रेजों और अन्य लोगों ने बडी नाव पर लकडी के केबिन बना कर यहां रहना शुरू कर दिया। फिर तो डल झील, नागिन झील और झेलम पर हाउसबोट में रहने का चलन हो गया। बाद में स्थानीय लोग भी हाउसबोट में रहने लगे। आज भी झेलम नदी पर स्थानीय लोगों के हाउसबोट तैरते देखे जा सकते हैं। '
बर्फ इस कदर फैली हुई थी कि झेलम पर बने लकड़ी का पुल पर करने के बाद कई बार फिसले और गिरे भी । रहने की जगह जब मिल गई तो अपने मित्र राजेंद्र कौल को तलाशने निकला जो श्रीनगर दूरदर्शन में कैमरामैन थे । दूरदर्शन परिश्र परिसर में पहुँचने पर पता चला वे घर  जा चुके है जो हब्बाकदल में है । इस बीच फिर बर्फ गिरने लगी थी और भूख भी लग रही थी । लाल चौक में  काफी हाउस दिखा तो कुछ देर वहा बैठे भी क्योकि बहार कड़ाके की ठंढ भी थी । शाम अँधेरे इ बदल चुकी थी और बर्फ के बीच बरसात भी । हब्बाकदल की गलियों में राजा का घर तलाशते तलाशते रात के आठ बज गए । खैर तीन मंजिल का लकड़ी का वह घर मिल ही गया ।  भीगने  और अँधेरे की वजह से राजा एकदम से  पहचान नहीं पाया और फिर जैसे समझ आई गले से लिपट चुके थे । वह हैरान इस आंधी पानी में मै कैसे यहाँ पहुँच गया । फिर अपने कपडे दिए और बोला -पहले बोट से सामान लाते है  । बहुत मना किया पर माना नहीं । एक ऑटो लिया और बरसात में झेलम के हाउस बोट पर पहुँच गए । उसका भुगतान किया और सामान लेकर राजा के घर में । थोड़ी देर बाद खाने का बुलावा आया ।  सबसे ऊपर की मंजिल में नीचे ही समूचा परिवार बैठा था और बड़ी गोल थाली में तरह तरह के व्यंजन । इन दोनों कश्मीरी परिवारों से बचपन से सम्बन्ध रहा है इसलिए कहवा ,रोगन होश से लेकर 'हाक ' जैसे साग से पहले से वाकिफ था ।   कश्मीरी लोग तेल घी का ज्यादा इस्तेमाल करते है और मांस उनके भोजन का अनिवार्य अंग भी होता है । गुस्तावा के बारे में तो तब पता चला जब छत्तीसगढ़ में पूर्व  मुख्यमंत्री  अजित जोगी ने दावत पर बुलाया और हिन्दू की आरती धर से कश्मीरी व्यंजनों पर लम्बी चर्चा की । जोगी भी खाने के बहुत शौकीन है और एक ज़माने में शिकार भी करते थे तब कोई प्रतिबन्ध नहीं था । खैर खाने पर राजा के परिवार की आवभगत हमेशा  याद आती है । जारी

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