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नार्टन होटल में कुछ दिन

अंबरीश कुमार
अंग्रेजो के समय में रानीखेत में जो कई होटल बनाए गए थे इनमे वेस्ट  व्यू ,रोज माउंट और होटल नार्टन प्रमुख था जिसपर कुछ समय पहले एक पोस्ट भी लिखी थी आज एक लेख देख कर फिर सब याद आ गया । नार्टन होटल हाल में ही सैलानियों के लिए बंद कर दिया गया है हालाँकि यह इतिहास का एक खुबसूरत पन्ना है । जहाँ कभी दिलीप कुमार और  वैजंतीमाला पर मधुमती का एक गाना भी फिल्माया गया था । नब्बे के दशक  में जब रानीखेत में जंगलात विभाग के डाक बंगले में रुका था तब से इस होटल को देखता आ  रहा हूँ जो माल रोड के अंतिम छोर पर है । सामने ही पर्यटन विभाग का अतिथि गृह है जहाँ  पहली बार सविता के साथ रुका तो कारीडोर के अंत का कमरा मिला था और बैरे ने हिदायत दे दी थी कि रात में  बाहर न निकलूं क्योकि  बाघ आते रहते है । पीछे जो जंगल था वह पहाड़ पर दूर  तक चढ़ता नजर आता था । खैर बाद में अपने सहयोगी मसूद ने इस नार्टन होटल के बारे में बताया । इस होटल में गया तो वह किसी फ़िल्मी सेट जैसा ही लगा । होटल में घुसते ही रिशेप्शन पर करनी के बाद एक बड़ा हाल जिसमे प्राचीन सोफा और खुबसूरत फर्नीचर रखा नजर्र आया और दीवार पर हुसैन से लेकर कई बड़े चित्रकारों के हाथ से बनाए चित्र भी । बगल का एक कमरा मिला और फ़ौरन दार्जलिंग की चाय भी । कुछ देर आराम करने के बाद आसपास घुमने  निकल गए । लौटे तो शाम ढल चुकी थी । पुराने किस्म के झाडफानूश रौशनी देने लगे थे । होटल के मालिक  मोहम्मद भाई साथ बैठे और इसके इतिहास पर प्रकाश डालने लगे । कैसे वे ताशकंद से यहाँ आए और ब्रिटिश सैनिको के परिवार वालों के लिए यह होटल खोला । बाद में यह फिल्म वालों का ठिकाना तो बना ही साथ ही साहित्य और कला क्षेत्र के महारथी भी जुटने लगे । बिमल मित्र  से लेकर शंकर तक । हुसैन से लेकर मुंबई के कई मशहूर कलाकार यहाँ रुके ।
बाद में कई फिल्म अभिनेता और अभिनेत्री यही रुकते । एक तो होटल की जगह यानी लोकेशन एक तरह जंगल के बीच थी जहाँ कोई आता जाता नहीं दूसरेप्राकृतिक दृश्य देखने वाला होता था । पिछली बार जब रुके तो रात में बालकनी में काफी देर बैठे रहे । तेज बरसात और हवा से देवदार के दरख़्त लहरा रहे थे । आवाज थी तो सिर्फ हवा की जो रह रह कर डरा भी देती थी । जब छींटे अपने ऊपर आने लगे तो उठकर डाइनिंग हाल में आ गए जहाँ मुगलाई व्यंजन की गंध भरी हुई थी । यह इस होटल की  सबसे बड़ी खूबी थी । रोगन जोश ,बिरयानी से लेकर मुर्ग मुसल्लम तक सब हाजिर था । मोहम्मद भाई ने बताया कि  उनकी माँ खुद मसाले तैयार करती थी । यहाँ तक की  बेसन भी खुद घर में बनाया जाता । पंडित नेहरु तक रानीखेत में रुकते सर्किट हाउस में पर खाना यही से जाता । बहुत ही स्वादिष्ट खाना था । सुबह उठे भी तब जब पक्षियों की आवाज तेज होने लगी । बाहर लगे फुल पौधे बरसात के पानी से भीगे हुए थे और धुंध  में सामने का जंगल खोता जा रहा  था ।

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