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हरसिंगार फूलने लगे

हेमंत शर्मा
 हरसिंगार फूलने लगे हैं। उसके झड़े फूल शरद ऋतु के आने की खबर दे रहे हैं। कहते हैं हरसिंगार बड़ा शर्मीला होता है। रात में चुपके से खिलता है और खिलते ही झरने लगता है। सड़क पर हरसिंगार के लाल डंठल वाले झड़े फूलों की चादर सुबह टहलने के मेरे आनंद को दुगना करती है। बसंत से जो रिश्ता बेला का है, हरसिंगार से वही रिश्ता शरद का है। शरद मानसून की उत्तर कथा है। बारिश प्रकृति का स्नान पर्व है। कुदरत के कैनवस पर नीला, साफ, ताजा आकाश। खिलती रात। शरद यानी जागृति, वैभव, उल्लास और आनंद का मौसम। तुलसीदास भी शरद ऋतु पर मगन हैं- ‘वर्षा विगत शरद रितु आई, देखहूं लक्ष्मण परम सुहाई।’
हरसिंगार के शर्मीले फूल मुनादी करते हैं कि पितृपक्ष के बाद त्योहारों का सिलसिला शुरू हो जाएगा, क्योंकि शरद उत्सव प्रिय है। इस एक ऋतु में जितने उत्सव होते हैं, पूरे साल नहीं होते। उत्सव किसी समाज की जीवित परंपरा होते हैं। इनके जरिए हम अतीत से ताकत लेते हैं। जीवन में नए रस का संचार होता है। मुझे लगता है कि शरद हमारी सामूहिकता, जिजीविषा और हमारे संघर्ष का प्रतीक है। तुलसीदास द्वारा शुरू की गई रामलीलाएं हों या तिलक महाराज द्वारा स्थापित गणेश उत्सव या फिर दुर्गापूजा, तीनों की सामूहिकता शरद की सामाजिक एकजुटता में दिखती है। ये सभी त्योहार सामूहिकता और नई फसल के उगने से कटने तक के त्योहार हैं। शरद पुराने को विसर्जित करने और नए को पूजने का उपक्रम है। मौसम का राजा बसंत है, लेकिन लंबे जीवन की कामना करते हमारे पूर्वजों ने सौ बसंत नहीं, सौ शरद मांगे। पूरा वैदिक वांग्मय सौ शरद की बात करता है- ‘जीवेत शरद: शतम्।’ कर्म करते हुए सौ शरद जीवित रहें। जीवन में राग, रस-रंग का प्रतीक तो बसंत है, पर उसके संघर्ष का प्रतीक शरद ही है। पूरे साल में सिर्फ एक रोज शरद पूर्णिमा का चांद सोलह कलाओं वाला होता है। कहते हैं चंद्रमा से उस रोज अमृत बरसता है। इसलिए शरद अमरत्व का प्रतीक भी है। इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं। शरद पूर्णिमा से अपना तीन पीढ़ी का रिश्ता है। मेरे पिता और पुत्र दोनों का जन्मदिन इसी रोज है।
बसंत और शरद दोनों संधि ऋतुएं हैं। एक में सर्दियां आ रही होती हैं, दूसरे में जा रही होती हैं। इसलिए दोनों का चरित्र एक-सा है। बसंत शिशिर की शर्वरी से मुक्ति का अहसास है तो शरद वर्षा के गदलेपन से मुक्ति का उल्लास। शरद में चौमासे की समाप्ति होती है। चौमासे के चार महीने में साधु-संतों की जो गतिविधियां ठहरी होती हैं, शरद में फिर सक्रिय हो जाती हैं। शास्त्रीय संगीत में भी शरद को सबसे कोमल ऋतु माना गया है। हमारे यहां हर ऋतु के अलग राग हैं। शरद में मालकोश गाते हैं। पांच सुरों में गाया जाने वाला यह शास्त्रीय संगीत का सबसे कोमल राग है। महाकवि निराला ने अपनी बेटी सरोज के कैशोर्य की तुलना मालकोश से की है- ‘कांपा कोमलता पर सस्वर, ज्यों मालकोश नववीणा पर।’
बसंत में बहार है, मस्ती है, उन्माद है। शरद में गांभीर्य है, गति है। बसंत के मूल में वासना है। शरद के मूल में उपासना। बसंत जुड़ता है रति से, काम से। शरद संबंधित है शक्ति से। राम से। बसंत में काम भस्म हुआ था। शरद में रावण। शरद में भगवान कृष्ण ने वृंदावन में सोलह हजार गोपिकाओं के साथ महारास रचाया था। इस रास की खासियत थी कि हर गोपी को अहसास था कि कृष्ण उसके साथ नृत्य कर रहे हैं। इस रास में ग्वाल-बाल, देवी-देवता सब एकरस थे और प्रकृति, मनुष्य, जड़, चेतन सब एक प्राण। संस्कृत के कवि भी शरद से अभिभूत हैं। उनकी अधिकतर कविताएं वर्षा और शरद पर केंद्रित हैं।
‘मृच्छकटिकम्’, ‘ऋतुसंहार’ और ‘गीत-गोविंद’ से लेकर तुलसीदास तक शरद के लालित्य का वर्णन हर कहीं है। किसी समय शरद के अंत से वर्ष पूरा होता था। इसीलिए वर्ष को शरद से नापा जाता था। बाद में कृषि प्रधान देश में वर्षा से वर्ष शुरू होने लगा। विक्रम संवत की शुरुआत कालांतर में चैत्र से हुई। ऋतुओं में शरद समाजवादी ऋतु है। न उसे गर्मी के ताप से बचने के लिए वातानुकूलित यंत्र चाहिए न ही ठंड से बचने के उपकरण। मानसूनी हवाएं जब लौटती हैं तो उत्तर-पश्चिम हिस्से के तापमान में तेजी से गिरावट आती है। मौसम सुहावना होता है। तुलसीदास लिखते हैं- शरद के सुहावने मौसम में राजा, तपस्वी, व्यापारी, भिखारी सब हर्षित होकर नगर में विचरते हैं। किसी एक ऋतु में सभी देवताओं के मगन होने की स्थिति कहीं और नहीं बनती। शरद की शुरुआत सावन में शिव की आराधना। भादो में कृष्ण जन्म और गणपति उत्सव फिर आश्विन में पितरों की याद। शक्ति पूजा के साथ राम की रावण पर विजय।शरद आ गया है। पर इसके परिवेश का सौंदर्य दिल्ली में उतना नहीं दिखता, जितना छोटे शहरों में। यहां न पपीहे की पीहू-पीहू सुनाई देती है, न मालती की चटकी कलियां दिखती हैं। न कमल खिलता है न कुमुदनी दिखती है। कमल वाले जरूर सक्रिय दिखते हैं!जनसत्ता

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