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दलितों ने क्या चाहा था

धर्मवीर
एक जमाना था जब उत्तर भारत में कम्युनिस्ट और समाजवादी पार्टियों के नाम जाने जाने लगे थे। चुनावों के दौरान मेरठ में शांति त्यागी और आचार्य दीपांकर साम्यवादी पार्टी के नुमाइंदे होते थे। समाजवादी पार्टी के महाराज सिंह भारती बड़े अच्छे और लच्छेदार भाषण देते थे। दलित जातियों में इन्हें बीपी मौर्य ले गए थे, जिनकी सिंह गर्जना को जनता ने अवतारी मान लिया था। तब तीन पार्टियां एक साथ गठजोड़ कर रही थीं- रिपब्लिकन पार्टी, समाजवादी पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी। बाद में यह संयुक्त मोर्चा बिखर गया और पूरा आंदोलन नेतृत्वविहीन हो गया।
आखिर, दलितों ने कम्युनिस्टों से क्या चाहा था? दलितों ने ‘कम्युनिस्ट’ शब्द का अपनी देशी जबान में तद्भव बना कर ‘कौम नष्ट’ के रूप में अर्थ लिया था। उस जमाने में कम्युनिस्ट पार्टी के शांति त्यागी अपने समर्थकों के साथ मेरे गांव में चमारों की तरफ वोट मांगने आए। हम सब दादा हरिया के ओसारे के नीचे थे। धूप-धूल में शांति त्यागी ने आते ही दादा से पानी मांगा। दादा हरिया ने घड़े से गिलास में ठंडा पानी निकाला और शांति त्यागी ने वहीं वह सबके सामने पिया। उनके जाने के बाद चमारों में वोट के लिए मंत्रणा हुई। सारे चमारों का वोट एकमुश्त एक तरफ जा रहा था, पर दादा हरिया ने कह दिया- ‘मेरा वोट शांति त्यागी को जाएगा, क्योंकि उसने मेरे हाथ का पानी पिया है।’ चमारों में से केवल वही एक वोट शांति त्यागी को मिला था।
अब, राजनीति में एक दौर सन 2012 का है। तब से अब तक उत्तर प्रदेश और दिल्ली की राजनीति ने कई उतार-चढ़ाव और बदलाव देखे हैं। विकल्प दलितों और पिछड़ों के बीच बनता जा रहा है। देखते हैं, राजनीति के चतुर रणनीतिकार अपनी बेबसी की दुनिया में इन विकल्पों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।
लेकिन यहां साहित्य की बात की जा रही है। आज के वरिष्ठ हुए कई दलित साहित्यकारों का तब बचपन बीत रहा था और द्विजों में मौजूदा वरिष्ठ हुए कई प्रगतिशील साहित्यकारों की तब जवानी चल रही थी। यह एक विशेषता है कि हिंदी के दलित साहित्यकारों ने खुद को किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जोड़ा। नए राजनेताओं में बीपी मौर्य, रामविलास पासवान, कांशीराम और मायावती- सभी का बारी-बारी से सम्मान, सभी को वैचारिक सहयोग, पर सभी से अलग। किसी ने किसी की पार्टी का टिकट नहीं मांगा। सुना है, महाराष्ट्र के दलित साहित्यकार राजनीतिक पार्टियों के बंटवारों में फंस कर रह गए हैं। फिर भी, हिंदी जगत के कुछ दलित साहित्यकारों के मन में विचलन जरूर पैदा हुए हैं। मसलन, कंवल भारती ने जाने किस लोभ में ‘कांशीराम के दो चेहरे’ नाम से एक अलोकप्रिय किताब लिख दी तो तुलसी राम जाने किस बहकावे में आज तक प्रगतिशीलता के मरे हुए सांप की जेवड़ी गले में डाल कर व्याख्यान देते हैं?
बात द्विज साहित्यकारों की प्रगतिशीलता की रह जाती है। साहित्यकारों की संस्थाओं के बारे में मेरी जानकारी नहीं के बराबर है। मैं केवल व्यक्ति-साहित्यकार को जानता हूं, वह भी उतना जितना उसका साहित्य पढ़ा या जितनी किसी से मेल-मुलाकात है। पर लखनऊ की पिछली एक घटना ने मुझे कई नई बातों का जानकार एक साथ बना दिया। मैं जानता ही नहीं था कि प्रगतिशील लेखक संघ नाम की कोई साहित्यिक संस्था भी मौजूद है। मुझे यह बिल्कुल पता नहीं था कि नामवर सिंह उसके अध्यक्ष हैं। यह बात भी मेरे कान में कभी नहीं पड़ी थी कि प्रगतिशील लेखक संघ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ा हुआ संगठन है। ये सारे मेरे लिए एक से बढ़ कर एक अचंभे थे। इनमें सबसे बड़ा अचंभा यह था कि नामवर सिंह कम्युनिस्ट हैं। इसके बाद मेरी जानकारी में और इजाफे हुए कि जनवादी लेखक संघ क्या है, जन संस्कृति मंच क्या है और ये किस-किससे जुड़े हैं।
नामवर सिंह ने वहां 8 से 9 अक्तूबर, 2011 तक चले प्रगतिशील लेखक संघ के पचहत्तरवें अधिवेशन में राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उद्घाटन भाषण दिया था। कहना यह है कि इस संघ की पचहत्तरवीं वर्षगांठ पर भी उनकी जबान पर वर्गभाषा नहीं चढ़ी। मार्क्सवाद की वर्गभाषा छोड़ कर वे सीधे भारत की जाति-भाषा बोल गए- ‘धर्मवीर भी चमार और तुलसी राम जी भी चमार।’ निश्चित रूप से, यह मेरे गांव के उन दिवंगत दादा हरिया को धोखा हुआ है कि कम्युनिस्ट का मतलब ‘कौम नष्ट’ होता है। कितनी पैनी वर्गदृष्टि है इनकी- इन्हें दलित जातियों के भीतर वर्ग दिखने लगे हैं। इनकी आंखों में दलितों के काफी संपन्न नौकरी-पेशा लोग खटकने लगे हैं। इन्हें उनकी बेहतर हैसियत से खासी परेशानी हो रही है। और द्विजों में इन्हें वर्ग इस रूप में दिखे हैं कि अगर रिजर्वेशन ऐसे ही चलता रहा तो भीख मांगता हुआ गरीब ब्राह्मण और बाकी ठाकुर जूते फटकारते हुए मिलेंगे।
मैंने मार्क्सवाद पढ़ा और पढ़ाया भी है। इससे बड़ा प्रमाण और क्या दूं कि मैंने एमएन राय के समाज दर्शन पर पी-एचडी की है, जो भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के जन्मदाता हैं? अब सोचता हूं, अगर मैं अपनी आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में जाऊं और वहां दक्षिण एशिया के शोधार्थियों को यह पढ़ाने बैठ जाऊं कि भारत में हिंदी के आलोचक नामवर सिंह एक कम्युनिस्ट हैं, तो कितना बड़ा झूठ बोलूंगा- यह अंदाजा लगाने की चीज है। आखिर, जब हिंदी क्षेत्र और हिंदी समाज में इनका कोई अस्तित्व नहीं है तो ये हिंदी साहित्य में संदर्भहीन और अप्रासंगिक क्यों नहीं हो रहे? इनके पास करने के लिए क्या काम शेष है, जब दलित साहित्य और स्त्री साहित्य अपनी ऐतिहासिक भूमिकाएं अदा   करने आ पहुंचे हैं? इन्हें स्वागत करना चाहिए या नेतृत्व लेना चाहिए? जनसत्ता

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