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नफ़रत फैलाने की ट्रेनिंग

चंचल
इस मुल्क में एक संगठित गिरोह ऐसा है जो गलत इतिहास गढ़ कर एक अधकचरे दिमागवाले कथित नौजवानों को नफ़रत फैलाने की ट्रेनिंग दे रहा है . क्या इसे आतंक्की नहीं कहा जायगा ? एक उदाहरण सामने है . - मुल्क का बटवारा गांधी ने कराया ' यह प्रचार इतना लंबा चला कि आज भी अनेक मूढ़ लोग इसपर यकीन ही नहीं करते बल्की इस बिनाह पर गांघी को गाली तक देते है . जिस देश के लोग अपने इतिहास से ही वाकिफ नहीं हैं उन्हें किस श्रेणी में रखा जायगा ? आइये इसका मनोविज्ञान देखें - पहले इसकी सच्चाई जान लें .गांधी १९३४ में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया यह कहते हुए कि जब भी कांग्रेस को जरूरत पड़े वह उन्हें ( गांधी जी को ) बुला सकती है राय ले सकती है . यह बात दीगर है कि कांग्रेस को हर पल गांधी की जरूरत पड़ती रही . लेकिन जब आजादी दरवाजे पर आ खड़ी हुई तो गांधी डर किनार कर दिए गए . उस काल खंड को बेबाकी से देखिये तो गांधी के अलावा बाकी सब उघार दिखाई पड़ते हैं . मुस्लिम लीग ने सीधी कार्यवाही की घोषणा की . दंगे शुरू हो गए . पंजाब और बंगाल जलने लगा . ' नोआखाली ' इसका ऐतिहासिक उदाहरण है . गांधी नोआखाली में हैं . खून से लथपथ जमीन एक नंगे पैर घूमनेवाला फ़कीर गांधी अपनी जान हथेली पर रखे अमन की अलाश में भटक रहा है . पूरा देश जल रहा है . कांग्रेस को गृहयुद्ध दिखाई पड़ा . उसने हडबड़ी में बटवारे को मान लिया . कांग्रेस कार्यकारणी को उस पर अपनी सहमति देनी है . यह बैठक बहुत हही दिलचस्प है जिस पर हमारे इतिहास कार और दलीय नेता चुप हैं . नेहरू और पटेल को लार्ड मौन्त्बेतन ने कहा जब तक इस पर गांघी की मुहर नहीं लगती तब तक यह समझौता अधूरा माना जायगा . ( लार्ड मौन्त्बेतन की वह डायरी बहुत ही दिलचस्प है जिसे बी बी सी ने हाल की में उत्घातित की है . आखिरी १५ दिन लार्ड ने किस तरह गुजारे हैं उसे पढ़ना तथ्य परक है . लार्ड का कहना है इस पूरे खेल में एक शख्स हर पल तंग करता है जो दिल्ली से बहुत दूर नोवाखाली में पैदल घूम रहा है . ) गांधी कांग्रेस कार्यकारणी की बैठक में बहैसियत विशेष आमंत्रित बुलाये जाते हैं कांग्रेस की यह पहली बैठक थी जहां सदस्यों को बैठने का इंतजाम कुर्सी पर हुआ था . वरना सारी बैठकें दरी और चादर पर होती रही हैं . गांधी जब पहुचे तो उनके बैठने का कोइ इंतजाम नहीं था . गांधी खड़े रहें गो कि कई लोगों ने अपनी कुर्सी देनी चाही लेकिन गांधी ने मना कर दिया . गांधी ने पूछा ' इतना बड़ा फैसला ( बटवारे का ) कर लिया और हमें बताया तक नहीं ? इस पर नेहरू ने कहा - बापू हमने इशारतन जिक्र कर दिया था . और फिर आप ईतनी दूर थे .... गांधी ने कहा नहीं हमें किसी ने नहीं बताया . इसपर पटेल उत्तेजित हो गए . बापू आप देश को तो देखिये गृह युद्ध की स्थिति हैने लीग सीधी कार्यवाही की घोषणा करके कत्ले आम मचा रखा है हमारे सामने कोइ दूसरा रास्ता बचता ही नहीं . इसपर जय प्रकाश नारायण ने पूछा बापू को अँधेरे में क्यों रखा गया . नेहरु ने जे पी को घुडक दिया . जे पी खामोश हो गए . लेकिन लोहिया भीड़ गए . बहस गरम हो गयी . कांग्रस अध्यक्ष जे बी कृपलानी चद्दर ओढ़ कर बैठे रहें उनका सिर दर्द करा था . मौलाना अबुल कलाम आजाद लगातार सिगरेट पीते रहें कुछ भी नहीं बोले . गांधी ने एक सुझाव दिया . आपने बटवारे का फैसला कर लिया है लेकिन इसमें एक बात जोड़ दो पहले अंग्रेज यहाँ से चले जाय फिर हम दोनों ( कांग्रेस और लीग ) बैठकर बटवारा कर लेंगे . ( डॉ लोहिया कहते हैं यह किसी संत का सुझाव्व नहीं था यह घुटे हुए राजनेता की चतुराई थी जो कि कभी बटवारा होता ही नहीं ) लेकिन यह प्रस्ताव नहीं माना गया . गांधी अकेला हो जाता है उनके साथ रहते हैं मुट्ठी भर कांग्रस समाजवादी .
गांधी नेहरु और पटेल आख़िरी बार जिन्ना से मिलते हैं . गांधी जिन्ना से प्रस्ताव रखते हैं - भाई जिन्ना ! मुल्क को बांटो मत तुम आजाद हिन्दुस्तान के पहले प्रधान मंत्री बकन जाओ . कह कर उन्होंने नेहरु और पटेल की तरफ देखा नेहरू ने कहा बापू हम तो तैयार हैं लेकिन जनता ? जिन्ना ने पहली बार ' बापू ' का संबोधन किया ( इसके पहले जिन्ना गांधी को मिस्टर गांधी ही कह कर बुलाता था . ) बापू आपकी तरह सब महात्मा नहीं हैं . और वर्र्ता भंग हो गयी . उस अकेले को बटवारे का दोषी मानना और इतिहास को प्रचारित करना सबसे बड़ा आतंन्की चक्रव्यूह है जिसे पता नहीं कितने प्रभा शर्मा जैसे लोग उलझे पड़े हैं . पूजा शुक्ला जी ने जिस स्टेनली की पुस्तक का जिक्र किया है उसे इस पीढ़ी को पढ़ना चाहिए .आखीर में गांधी पर जब संघी घराना यह बेतुका आरोप लगाता है तो कोइ सच्चाई का बयान क्यों नहीं करता ?

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