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विकास का पतन

राजेंद्र तिवारी
अपने देश में आजकल विकास का जोर है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक आज की युवा पीढ़ी ‘विकास’ चाहती है और ‘विकास’ का प्रतीक एक ही व्यक्ति है इस देश में। और वह व्यक्ति मानता है कि विकास का मतलब नये-नये उद्योग, उद्यमियों-कारोबारियों को सहूलियत, उनके लिए अच्छी सड़कें, अच्छे एयरपोर्ट, बड़े-बड़े होटल-रेस्टोरेंट जहां बड़ी-बड़ी बैठकें हो सकें। प्राइवेट कालेज-यूनिवर्सिटीज व अस्पताल जहां से पैसा कमाया जा सके। क्या वाकई बस यही विकास है? हमें जब 1992-93 में विकास का सपना दिखाया गया था, हम सोचते थे कि हमारे गांव बदलेंगे, हमारे शहर में सबको इज्जत की रोटी और छत मिलेगी, हमारे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलेगी, हमारी बीमारी को ठीक करने के लिए सरकारी अस्पतालों में दवाओं और डाक्टरों की भरमार होगी, हमारे किसानों को अमेरिका या आस्ट्रेलिया जैसी सहूलियतें और इज्जत मिलेगी, हमारे विश्वविद्यालय और शोध संस्थान ज्ञान के केंद्र बनने लगेंगे। लेकिन आज 20 साल बाद हम देखते हैं तो पाते हैं कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। न गुजरात में और न उत्तर या पूर्वी भारत में। हुआ सिर्फ इतना कि पैसे वाले लोगों को पहले इलाज के लिये दिल्ली व मुंबई के महंगे अस्पतालों में जाना पड़ता था, अब वे महंगे अस्पताल उनके करीब आ गये। पहले पैसे वाले लोगों को अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिये दूर जगहों पर बोर्डिंग स्कूलों में भेजना पड़ता था या जिनके पास थोड़ा कम पैसा था, वे मन मसोस कर रह जाते थे, अब वे महंगे स्कूल पास के शहरों में आ गये। अच्छी कार रखने वालों के लिए अच्छी सड़कें, बड़ी-बड़ी बीमारियों के लिए बड़े-बड़े निजी अस्पताल। और भी बहुत सारी चीजें।
आज से 30-35 साल पहले के समय पर नजर दौड़ाइये। यदि आपकी उम्र कम है तो अपने पिताजी, चाचाजी या दादाजी से पूछिये। आपको पता चलेगा कि हर ब्लाक या तहसील में एक प्राइमरी स्कूल ऐसा जरूर होता था जहां की पढ़ाई की ख्याति जिले भर में होती थी कि अगर बच्चा अमुक स्कूल में अमुक मास्टर साहब से पढ़ लिया तो उसकी गणित कमजोर नहीं हो सकती। इसी तरह हर तहसील में एक जूनियर हाईस्कूल या हाईस्कूल ऐसा जरूर होता था जहां की पढाई और अनुशासन की धमक होती थी। और तीन-चार इंटर कालेज ऐसे जरूर होते थे पूरे प्रदेश में अपनी पढ़ाई और अनुशासन के लिए जाने जाते थे। ये सब स्कूल-कालेज सरकारी या अर्धसरकारी ही होते थे। मेरी स्कूली और यूनिवर्सिटी की शिक्षा उत्तर प्रदेश में हुई। हम लोग जब गांव में 10वीं कर रहे थे, तब शिक्षक कहते थे मेरिट में आओगे तो लखनऊ के काल्विन तालुकेदार्स में दाखिला मिल सकेगा। काल्विन सरकारी इंटर कालेज था। 70 फीसदी से ऊपर होंगे तभी गवर्नमेंट इंटर कालेज में 11वीं मैथ्स में दाखिला ले सकोगे। गवर्नमेंट कालेज के मैथ्स टीचर रामबृक्ष सिंह और फिजिक्स टीचर लल्लन प्रसाद की धाक लखनऊ तक में थी कि उनसे पढ़े हो तो मैथ्स-फिजिक्स तो अच्छी ही होगी। आज याद करिये अपने जिले के किसी सरकारी प्राइमरी स्कूल, सरकारी सेकेंडरी स्कूल और सरकारी इंटर कालेज को, किस तरह की तस्वीर उभरती है सरकारी स्कूलों के बारे में? आपको बता दें कि आज भी देश के 70 फीसदी से ज्यादा बच्चे इन्हीं स्कूलों में पढ़ते हैं।
हमारे यहां करीब 10 गांवों के बीच एक अस्पताल (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) था। यहां पर एक डाक्टर, एक कंपाउंडर और एक-दो नर्सें हुआ करती थीं। डाक्टर आरबी सिंह जो एएमबीएस हुआ करते थे (अब यह डिग्री खत्म हो गयी है) को उसी अस्पताल परिसर में एक दो कमरे का घर मिला हुआ था। डाक्टर साहब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे यानी अपने घर से करीब 400 किमी दूर उनकी पोस्टिंग थी। वह बहुत गोरे थे, उनको देखकर नहीं लगता था कि वे हम बच्चों को छूना चाहेंगे क्योंकि हमें लगता था कि हमें छूकर तो उनके हाथ गंदे हो जाएंगे। लेकिन मुझे अच्छी तरह याद है कि किसी गांव में यदि कोई बीमार गंभीर हो गया तो आधी रात को भी वह मरीज देखते थे। यही नहीं, यदि किसी मरीज की हालत इतनी खराब है कि उसे अस्पताल नहीं ले जाया जा सकता तो सूचना मिलने पर वे रात में ही अपना मेडिकल बैग लिये साइकिल से पहुंच जाते थे। (आप सब लोग पीछे मुड़कर देखेंगे तो कोई न कोई सरकारी डाक्टर याद आ जाएगा) उनका भी बेटा हमारे साथ पास के सेकेंडरी स्कूल में पढ़ता था। यही नहीं तहसील मुख्यालय पर स्थिति उपर जिला अस्पताल के प्रभारी डाक्टर, पीडब्लूडी के एई, तहसीलदार आदि अधिकारियों के बेटा व बेटी भी हमारे स्कूल में ही पढ़ते थे।
आज मैं सोचता हूं कि क्या विकास हुआ है? हमारे उस प्राइमरी स्कूल से दो किमी के दायरे पर दो-तीन स्कूल और खुल गये लेकिन पढ़ाई की खानापूरी मात्र होती है। हमारा सेकेंडरी स्कूल इंटर कालेज हो गया लेकिन अब सिर्फ वही लोग अपने बच्चों को वहां भेजते हैं जिनकी माली स्थिति अपने बच्चों को शहर के पब्लिक स्कूलों में पढ़ाने लायक नहीं है। आसपास दो पीएचसी और खुल गये लेकिन वहां डाक्टर हफ्ते में तीन-चार दिन आते हैं और वह भी कुछ देर के लिए। हमारे जीआईसी में अब वे बच्चे ही जाते हैं जिनका एडमिशन डान बास्को या डीपीएस में नहीं हो पाता है। राजधानी का काल्विन कालेज के विशाल परिसर को छोटा किया जा रहा है क्योंकि वहां की जमीन का व्यवसायिक दाम बहुत ज्यादा है। इस कालेज में भी अब कोई एडमिशन नहीं लेना चाहता।

इसका असर जानना है तो पुराने आईएएस, आईपीएस, विश्वविद्यालय प्रोफेसर, डाक्टरों आदि के नाम पर गौर करिये। कोई प्रो राम निवास थे तो कोई बच्चू लाल, कोई डाक्टर मंगल प्रसाद थे कोई इकबाल अली, कोई दरबारी लाल एसपी होते थे तो कहीं रामनिहोर डीएम। राजनीति में भी ऐसे नाम दिखायी देते थे बड़ी संख्या में। जिनका ना तो कोई खानदानी इतिहास होता था न उनके पास सीढ़ियां होती थी रुतबेदार लोगों की। लेकिन आज इन नामों को ढूढ़िये। मैने कोई रिसर्च तो नहीं की है लेकिन अपने आसपास देखिये, अखबार पढ़िये तो ऐसा ही देखने को मिलता है। ऊपर की दोनों बातों को ध्यान में रखकर सोचिये कि ऐसा क्यों दिख रहा है? क्यों नहीं बड़ी संख्या में नीचे से लोग ऊपर आ पा रहे हैं? ये विकास है या पतन?

और अंत में....
नीलाभ अश्क ने अपनी फेसबुक वाल पर बहुत अच्छी कविता पोस्ट की। मैं लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ इस कविता को अपने पाठकों से शेयर करने का। पढ़िये-
 
गुज़ारिश
 
मैं अँधेरे का दस्तावेज़ हूँ
राख को चिड़िया में बदलने की तासीर हूँ
मीर हूँ अपने उजड़े हुए दयार का
परचम हूँ प्यार का
 
मैं आकाश के पंख हूँ
समन्दर में पलती हुई आग हूँ
राग हूँ जलते हुए देश का
धरती की कोख तक उतरी जड़ें हूँ
अन्तरतारकीय प्रकाश हूँ
 
मैं लड़ाई का अलम हूँ
सम हूँ मैं ज़ुल्म को रोकने वाला 
हर लड़ने वाले का हमदम हूँ
बड़े-बड़े से बहुत बड़ा
छोटे-से-छोटे से बहुत कम हूँ
 

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