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यह मिजाज लोकतंत्र के खिलाफ

कुमार प्रशांत
प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू तीखा बोलते हैं और अक्सर मुद्दे का वह छोर पकड़ते हैं जो लोकप्रिय नहीं होता। ऐसा करते हुए वे कई बार बेढब भी होते रहे हैं और उनके तीर व्यर्थ भी जाते रहे हैं। लेकिन जिसके हर तीर निशाने पर लगें, ऐसा धनुर्धर आप कहां पा सकते हैं! इसलिए काटजू साहब ने आज के गुजरात और गुजरात के आज के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में जो लेख लिखा है और जिसे लेकर अरुण जेटली ने युद्ध की घोषणा कर दी है, उसे बार-बार पढ़ने की जरूरत है।
वर्षों से ऐसा माहौल बनाया गया है कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ किसी ने कोई बात की तो सारा संघ परिवार उसका मुंह नोच लेने को उठ खड़ा होता है। इसके सबसे दयनीय उदाहरण हैं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी। सभी जानते हैं कि गुजरात के दंगों के कारण ही नहीं, उस दंगे में मोदी सरकार की भूमिका के कारण प्रधानमंत्री वाजपेयी गहरे संताप में रहे थे, अपनी सरकार और पार्टी को अपने साथ लेने के लिए हाथ-पांव मारते रहे थे, लेकिन संघ परिवार की एकजुटता के आगे निरुपाय पड़ते रहे थे। तब उनमें इतना नैतिक साहस होता कि वे प्रधानमंत्री की अपनी कुर्सी दांव पर लगाने को खड़े हो जाते तो वह भूमिका बन सकती थी जिसकी तब भी और आज भी देश को जरूरत है। लेकिन ऐसा बल उनमें नहीं था।
वैसा ही नैतिक बल अगर जॉर्ज फर्नांडीज, नीतीश कुमार, पिता-पुत्र अब्दुल्ला, ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू आदि में होता तो गुजरात भी और नरेंद्र मोदी भी आज कहां होते, देश देखता। लेकिन सत्ता भवानी बिरलों को मिलती है और उनमें बिरले ही होते हैं जो उसे साध्य नहीं, साधन मानते हैं। लेकिन साधन को ही साध्य मान कर संघ परिवार जो गद््दी से चिपका सो ऐसा चिपका कि आज गद््दी भी नहीं रही और परिवार भी छिन्न-भिन्न हुआ जा रहा है, लेकिन उसी खुमारी के भरोसे इनकी जिंदगी चल रही है।
हम उस अभागे देश की संतानें हैं जिसकी आजादी का जन्म ही भयंकरतम सांप्रदायिक उन्माद में से हुआ और जिस आग में उसका भूगोल जल गया, इतिहास रक्तरंजित हुआ। इसके बाद भी हमारे देश में यहां-वहां दंगे होते रहे हैं और बार-बार सामाजिक-राजनीतिक विफलता और कलुषता की कहानी सामने आती रही है। लेकिन गुजरात में सबसे शर्मसार करने वाली बात यह हुई कि वहां दंगे हुए नहीं, करवाए गए; सांप्रदायिक उन्माद पैदा नहीं हुआ, उसे उत्तेजित किया गया। वह काबू के बाहर नहीं गया, बल्कि उसे काबू न करने की सरकारी हिदायत दी गई। नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने पूरा गुजरात भीड़ के हाथों में सौंप कर, अपनी आंख बंद कर ली- यह जरूर हिदायत देते रहे कि कोई भीड़ को रोके नहीं! गुजरात में बमुश्किल नौ फीसद मुसलमान रहते हैं जो इस वहशी दौर में मारे-काटे गए। उस दौर की कहानी दोहराने लायक भी नहीं है। इसलिए उसे हम यहीं छोड़ते हैं और उस गुजरात की बात करते हैं, जो आज है।
बकौल नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी, गुजरात आज विकास के जिस रास्ते पर चल रहा है और शिखर तक पहुंच रहा है, उसका देश में कोई सानी नहीं है। जब कोई सरकार अपना ढोल आप बजाने पर आ जाती है तब उसका मुकाबला करना आसान नहीं होता, या कि उतना ही आसान होता है जितना शाइनिंग इंडिया वाले दौर में हुआ! गुजरात के मामले में वह जब होगा तब होगा, लेकिन न्यायमूर्ति काटजू ने अपने लेख में जो सवाल उठाए हैं, उन्हें मैं वैसे के वैसे आपके सामने रखता हूं। वे कहते हैं: ‘‘मेरे लिए विकास का एक ही मतलब होता है और वह यह कि उससे आमतौर पर जनता का जीवन-स्तर ऊंचा उठना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तब बड़े औद्योगिक घरानों को छूट देना, उन्हें सस्ते में जमीन और बिजली देना आदि को हम कैसे विकास कह सकते हैं?’’
इतना कह कर काटजू कई आंकड़े पेश करते हैं: ‘‘आज गुजरात में अड़तालीस फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं जो देश के औसत से कहीं ज्यादा है। गुजरात में बाल-मृत्यु की और प्रसव के दौरान माताओं की मृत्यु-दर ज्यादा है। आदिवासियों और पिछड़ी जातियों में गरीबी का औसत सत्तावन फीसद है। रामचंद्र गुहा अपने एक ताजा लेख में बताते हैं कि गुजरात में पर्यावरण का विनाश तेजी से हो रहा है। शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है और बच्चों में कुपोषण अस्वाभाविक दर से ऊंचा है। 2010 में संयुक्त राष्ट्र के विकास-अध्ययन में स्वास्थ्य, शिक्षा, आय आदि को ध्यान में रख कर बताया गया था कि गुजरात हमारे देश में आठवें स्थान पर आता है।’’ फिर काटजू सवाल उठाते हैं कि क्या व्यापारिक घरानों के यह कहने से कि गुजरात व्यापारियों के लिए बहुत अनुकूल है, हम यह मान लें कि बस, भारत में ये ही लोग तो हैं जिनका कोई मतलब है!
काटजू अपने लेख के शुरू में और अंत में दो बातें ऐसी कहते हैं जो अरुण जेटली मार्का भाजपाइयों को नागवार गुजरी हैं। वे गोधरा कांड की चर्चा करते हुए हमें 1938 के जर्मनी की याद दिलाते हैं जब फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक जर्मन राजनयिक को ऐसे यहूदी युवक ने मार डाला था जिसके पूरे परिवार की नाजियों ने बलि चढ़ा दी थी। उस एक हत्या का बदला लेने के लिए, हिटलर के हुक्म, सहमति और प्रेरणा से यहूदियों का ऐसा कत्लेआम हुआ जैसा इतिहास में कभी हुआ नहीं!
अगर हम गोधरा को फ्रांस की इस घटना के बगल में रखते हैं तो मोदी की जगह कहां बनती है, समझ सकते हैं! काटजू लेख के अंत में आकर लिखते हैं: ‘‘मैं भारत की जनता से अपील करता हूं कि अगर देश के भविष्य को लेकर वे चिंतित हैं तो इन सारी बातों पर ध्यान दें, अन्यथा 1933 में जर्मनी के लोगों ने जो भूल की थी, हम भी वैसी ही भूल करेंगे।
यहां लेख खत्म होता है जिसके आधार पर अरुण जेटली न्यायमूर्ति काटजू का इस्तीफा मांग रहे हैं। काटजू सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त जज हैं जो सेवानिवृत्ति के बाद भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष बनाए गए हैं। अरुण जेटली का आरोप है कि अवकाश-प्राप्ति के बाद, लाभ का बड़ा पद मिलने की अनुकंपा से दबे काटजू खुद को कांग्रेसियों से भी ज्यादा कांग्रेसी साबित करने में लगे हैं। जेटली का राज्यसभा में होना बरास्ता गुजरात है। कोई उनके लिए भी कह सकता है कि वे भी मोदी का ऋण उतार रहे हैं। वह किसी ने कहा है न: हो जाइए जलील खुद अपनी निगाह में, इतना कभी दिमाग को ऊंचा न कीजिए!
यशवंत सिन्हा कह रहे हैं कि काटजू को प्रेस परिषद से हटा देना चाहिए, क्योंकि उन्होंने बार-बार वह लाल लकीर पार की है जो सार्वजनिक जीवन की लक्ष्मण-रेखा है। अभी पिछले दिनों की ही बात है कि जब भाजपा के लोग नितिन गडकरी को बचाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे और यशवंत सिन्हा के आसपास इसी लाल लकीर की खोज कर रहे थे। तब लगा ही नहीं था कि सिन्हा ऐसी किसी लकीर के होने से वाकिफ भी हैं। काटजू को प्रेस परिषद से हटाने का सवाल हमें प्रेस पर ही छोड़ देना चाहिए।
सरकार उन्हें हटाए या प्रेस इतना दबाव बनाए कि उन्हें हटना पड़े। इनसे अलग कोई भी उपाय गलत होगा।
हम जानते हैं कि गुजरात भाजपाइयों की अंतिम पनाहगाह है। वहां संघ परिवार की प्रयोगशाला बनाई गई थी। अब वह नरेंद्र मोदी का चरागाह है। भाजपा के पास दूसरे राज्य भी हैं, लेकिन गुजरात को उसने अपनी नाक का सवाल बना लिया है। दंगों के बाद का चुनाव जब नरेंद्र मोदी ने जीता था तब अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था: हम गुजरात जीत गए हैं, हिंदुस्तान हार गए हैं!
आज भाजपाई अटल जी के कथन का आधा ही हिस्सा याद करते हैं और गुजरात को हर महिमा से मंडित दिखाना चाहते हैं। सारे व्यापारिक घराने गुजरात के मुख्यमंत्री की कदमपोशी में लगे हैं यह देख कर क्या अरुण जेटली को आपातकाल की याद नहीं आती, जब लोग ये ही थे? फर्क सिर्फ इतना था कि तब कदम इंदिरा गांधी के थे।
इतिहास गवाह है कि संपत्ति हमेशा सत्ता का साथ खोजती है और अगर दोनों का रंग काला हो तब तो यारी गहरी छनती है। इसलिए हम इस संबंध की छानबीन अभी न करें और यह देखें कि क्या गुजरात के अवाम तक विकास की वह सुगंध पहुंची है, जिससे भाजपाई मदमस्त हुए जा रहे हैं? काटजू ने जिन आंकड़ों का जिक्र किया है वे उनके दिमाग की उपज नहीं हैं, बल्कि कई अध्ययनों से निकले हैं। क्या गुजरात सरकार इसे खारिज करने या इसकी जांच कराने को तैयार है? सारा सौराष्ट्र पानी के भयंकर संकट से गुजर रहा है। सारे गुजरात में जिस विकास की बाढ़ आई हुई है, उसके कुछ छींटे यहां क्यों नहीं पड़े?
नर्मदा परियोजना से पूरा राजनीतिक लाभ निचोड़ लेने के बाद, अब कोई नहीं बोलता कि उसका पानी कहां पहुंचा और कहां ठहरा हुआ है! लेकिन उस परियोजना में, ठेकेदारों ने कितनी लूट की है, इसकी बात वहां हर कहीं सुनाई देती है। और यह राष्ट्रव्यापी सच्चाई तो अरुण जेटली भी जानते होंगे कि आज कोई भी ठेकेदारी राजनीतिकों के संरक्षण के बिना नहीं की जाती।
गुजरात के मुसलमान अब मोदी के साथ हैं, ऐसा कहा जा रहा है और कई मुसलमान इस तरह के बयान भी दे रहे हैं। अगर ऐसा है या हो रहा है तो बहुत अच्छी बात है। भाजपा देश के हर समुदाय का विश्वास हासिल करे और सत्ता में आए, तो किसी को परेशानी नहीं है। लेकिन तथ्यों को झुठला कर आप ऐसा नहीं कर सकते हैं। गुजरात में मुसलमानों के कई वर्ग हैं। जो सबसे पैसे वाला वर्ग है उसे सभी पैसे वालों की तरह फिक्र अपने पैसों की है। दंगों में उसका ज्यादा कोई नुकसान भी नहीं हुआ था। वह सरकार का कृपापात्र बने रहना चाहता है। मुसलमानों के बड़े राष्ट्रीय संगठन हैं जिन सबकी अपनी राजनीति है। वे भी किसी सरकार से पंगा नहीं रखना चाहते हैं। आम असंगठित, गरीब, बेरोजगार मुसलमान है जो असहाय है। बहुत पिटा है, बहुत डरा है और बहुत घिरा हुआ भी है। वह मोदी के साथ है, ऐसा कहते हुए मोदी की भी और भाजपाइयों की जुबान भी अटकनी चाहिए।
अगर भाजपा नरेंद्र मोदी को अपना प्रधान बनाती है तो उसकी मर्जी, लेकिन अगर वह उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहती है तो इसमें केवल उसकी मर्जी नहीं चलेगी। देश की मर्जी चलेगी। जेटली को हक नहीं है कि वे अपने से अलग राय रखने वाले को इस्तीफा देने को कहें या दुनिया से उसकी विदाई का इंतजाम करें! यह मिजाज लोकतंत्र के खिलाफ है।जनसत्ता

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