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अर्जुन सिंह का कसूर हैं अर्जुन सिंह होना

आलोक तोमर
मनमोहन सिंह अर्जुन सिंह को निपटाने पर इतने उतारू हैं कि खुद मानव संसाधन मंत्री हो जाना चाहते हैं। मजाक की बात तो यह है कि एक तर्क यह दिया जा रहा है कि राज्यसभा में बैठे लोग लोकसभा में जीत कर आए लोगों के लिए जगह खाली करें। दूसरी तरफ लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने का गौरव प्राप्त करने वाले मनमोहन ंसिंह खुद लगातार राज्यसभा में रहे हैं और आज भी हैं। मानव संसाधन मंत्रालय के कार्यालय शास्त्री भवन में परम अनिश्चय का माहौल है। अगर प्रधानमंत्री ने ये मंत्रालय संभाला तो निश्चित तौर पर वे मंत्रालय का दैनिक काम काज देखने के लिए एक ताकतवर राज्यमंत्री नियुक्त करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि यह राज्यमंत्री ऐसा हो जो अर्जुन सिंह के सारे फैसलों को उलट कर रख दे।
शायद इसी को ध्यान में रखते हुए नई सरकार बनने के पहले ही अर्जुन सिंह ने अपनी सारी परियोजनाएं पूरी करने के लिए पूरी गति से काम शुरू कर दिया है। अधिकारियों ने दिन रात एक कर के फाइले तैयार की हैं और उनके लिए मंत्रिमंडल भंग होने से पहले की तारीखों में आदेश ही पारित कर दिए हैं। मंत्रालय के सचिव पी के श्रीवास्तव ने कहा कि उन्हें आभास है कि मंत्रालय अब रेस्कोर्स रोड से चलेगा।
मनमोहन सिंह ने हमेशा कहा है कि शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लेकिन अपने कार्यकाल के पहले ढाई साल में प्रधानमंत्री ने शिक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। हालत यह है कि संविधान में शिक्षा को अनिवार्य मौलिक अधिकार बनाने का विधेयक अर्जुन सिंह ने आते ही संसद के पटल पर रख दिया था लेकिन पूरे पांच साल में संसद के 18 सत्र हुए और इनमें से किसी में इस विधेयक को कानून बनाने पर विचार तक नहीं किया गया।
और भी कमाल की बात यह है कि मानव संसाधन मंत्रालय ने अर्जुन सिंह के अधिकारियों की टीम को बदलने की पूरी तैयारी कर ली है और इनमें कई वे अधिकारी भी हैं जो अर्जुन सिंह ने इस आधार पर बदले थे कि वे मुरली मनोहर जोशी द्वारा नियुक्त किए गए थे और भाजपा की नीतियों का अब भी पालन कर रहे थे। इनमें एक गौर साहब भी हैं जो संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी थे और बाबरी मस्जिद ध्वंस के दौरान फैजाबाद के कलेक्टर हुआ करते थे।
अर्जुन सिंह ने ग्यारहवी पंचवर्षीय योजना में अलग अलग मदों में अपार पैसा मंजूर करवाया और आईआईटी और आईआईएम जैसी संस्थाओं की स्वायतता बरकरार रखते हुए भी उन पर अंकुश लगाए। उच्च शिक्षा का इतना अधिक विकास और विस्तार जवाहर लाल नेहरू के बाद कभी नहीं हुआ था। अर्जुन सिंह ने 543 तो नई संस्थाएं खोली।
अधिकारियों के अनुसार शिक्षा के अधिकार के विधेयक पर मंत्रिमंडल और योजना भवन में चर्चा हो चुकी है। राज्यसभा के अंतिम सत्र में इसे सदन के पटल पर रख कर एक संसदीय बोर्ड से पारित कर लिया गया था। इसके अलावा सर्वशिक्षा अभियान में 2020 तक देश के हर बच्चे को उच्चतर माध्यमिक शिक्षा देने की गारंटी कर ली गई है। मगर यह काम तब तक नहीं हो सकता जब तक शिक्षा के अधिकार को कानून नहीं बना दिया जाता।
अर्जुन सिंह ने माध्यमिक शिक्षा अभियान के अलावा छह नए प्रबंधन संस्थान, 20 आईआईटी और 9 एनआईटी के अलावा कई विश्व स्तरीय विश्वविद्यालयों के गठन की मंजूरी दी थी लेकिन योजना आयोग ने अभी तक इन्हें हरी झंडी नहीं दिखाई है। अब हो सकता है कि इनमें से कई योजनाओं को हमेशा के लिए खंडित कर दिया जाए।
एक विचित्र मजाक यह चल रहा है कि मानव संसाधन मंत्री के तौर पर अर्जुन सिंह ने बहुत उपलब्धियां अर्जित नहीं की। जब मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे तो उसी नरसिंह राव सरकार में अर्जुन सिंह मानव संसाधन विकास मंत्री थे। फिर मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने तो अर्जुन सिंह की पुरानी कार्यशैली को ध्यान में रख कर ही फिर से उन्हें यही विभाग दिया। जाहिर है कि मनमोहन सिंह या उनके चमचे अगर कह रहे हैं कि अर्जुन सिंह ने कोई खास काम नहीं किया तो उन्हें खुद जवाब देना चाहिए कि अर्जुन सिंह को दोबारा यही विभाग क्यों दिया गया?
जहां तक धर्मनिरपेक्षता की बात है तो बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद घड़ियाली आंसू तो पीबी नरसिंह राव सहित बहुत लोगों ने बहाए थे लेकिन सामूहिक जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए मंत्रिमंडल से त्याग पत्र सिर्फ अर्जुन सिंह ने दिया था। इसके अलावा लोकसभा चुनाव में मुस्लिमों और दलितों का जो वोट मिला है उसका श्रेय भी बड़ी सीमा तक अर्जुन सिंह को जाता है। 2005 में अर्जुन सिंह ने एक सौ चार वें संविधान संसोधन विधेयक के जरिए तिरानवेवां संविधान संसोधन करवाया जिसमें अतिरिक्त पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान था। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस फैसले को मान्यता दी और फैसला आईआईटी और आईआईएम तक लागू हुआ। मनमोहन ंसिह के राष्ट्रीय सूचना आयोग के अध्यक्ष पद पर बैठे सैम पित्रोदा ने इसका विरोध किया था।
अर्जुन सिंह ने योजना बनाई कि न सिर्फ 32 केंद्रीय विश्वविद्यालयों बल्कि सौ से अधिक डीम्ड यानी परिकल्पित विश्वविद्यालयों में भी आरक्षण का यह कोटा लागू हो। मनमोहन ंसिह हर कदम पर उनका समर्थन करते रहे। दलित मुस्लिमों के लिए अलग से आरक्षण किया गया। इन सबको अगर उपलब्धि नहीं माना जाएगा तो क्या पंचायत का चुनाव भी नहीं लड़ सकने वाले मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने को उपलब्धि कहा जाएगा?
अर्जुन सिंह के बारे में उनकी सेहत की बात भी कही जाती है। ठीक है कि उनके घुटनों का ऑपरेशन हुआ है, वे ठीक से चल नहीं पाते और उनकी बाई पास सर्जरी हो चुकी है। मगर बाई पास सर्जरी तो दो बार मनमोहन सिंह की भी हो चुकी है। मनमोहन सिंह भूल जाते हैं कि उनके पंजाब में लोकतंत्र की दोबारा स्थापना और आतंकवाद के नाश की नींव राज्यपाल के नाते अर्जुन सिंह ने ही रखी थी और राजीव गांधी ने उन्हें पार्टी का सर्वशक्तिमान उपाध्यक्ष बनाया था।
आखिरी विवाद बेटी और बेटे के लिए टिकट मांगने को ले कर है। जब मुरली देवड़ा और मिलिंद्र देवड़ा और सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी एक साथ एक ही सदन में आ सकते हैं तो अर्जुन सिंह ने अपने बेटे और बेटी के लिए टिकट मांग कर कौन सा गुनाह कर दिया? जब टिकट नहीं मिला तो भी अर्जुन सिंह कांग्रेस उम्मीदवार के प्रचार के लिए गए और फिर कहानियां इस बात पर बनाई गई कि उन्होंने चुनाव सभा में अपनी बेटी के खिलाफ कुछ नहीं बोला। मतलब ये कि राजनीति के लिए आप अगर अपनी बेटी को निकम्मा साबित नहीं कर सकते तो आपका अस्तित्व ही बेकार है। अर्जुन सिंह को ले कर जितनी पाखंडी मुद्राएं बनाई जा रही है उनसे न कांग्रेस मजबूत हो रही है और न हमारा लोकतंत्र।
 

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