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केदारनाथ में तांडव

वीके जोशी

हाल में 16 जून से हुई अचानक अति वृष्टि के बाद केदारनाथ धाम में  कुछ ही क्षणों में प्रकृति  की ऐसी मार पड़ी कि जो बच गए उन्होंने बयान दिया कि उन्हें लगा कि मानों ‘शिव तांडव  कर रहे हों.’ केदारनाथ घाटी में हुए हादसे के बाद अनेक उंगलियां उठने लगी हैं सरकार की अनदेखी पर तथा अनेक लोग कह रहे हैं कि यह सब मानव जनित था! प्रश्न इस बात का नहीं है कि ऐसा क्यों हुआ. मुद्दे की बात तो यह है कि ऐसा क्या करें कि भविष्य में ऐसी दुर्घटना की पुनरावृति ना हो.
कहते हैं केदारनाथ मंदिर का निर्माण स्वर्ग जाते हुए स्वयं पांडवों  ने कराया था, यहीं से धर्मराज  युधिष्ठिर ने स्वर्ग के लिए  प्रस्थान किया था. भौगोलिक  दृष्टि से यह मंदिर पांच गगनचुंबी पर्वतों भारत कुंट (6578 मी), केदारनाथ (6940 मी), महाल्या पर्वत (5970 मी), हनुमान टॉप (5320 मी) तथा (5505 मी) से घिरा हुआ है. मन्दाकिनी का उद्गम होता है कंपेनियन तथा चौराबारी हिमनदों से. घाटी में पहुँचने के साथ ही नदी की धारा 50-50 मी की दो धाराओं में विभक्त हों जाते है, जिनके बीच बसी है 3600 मी की ऊंचाई पर केदारनाथ की आबादी.
हिमालय की घाटियों  को यदि गौर से देखें तो दो प्रकार के रूप दीखते  हैं. एक तो अंगरेजी के ‘वी’ आकार की घाटियाँ, जिनको नदियों ने करोड़ों वर्षों में काट-काट कर बनाया. दूसरी प्रकार की घाटियाँ अंगरेजी के अक्षर ‘यू’ के आकार की होती हैं, जो कि हिमनदों के लगातार पीछे हटने से बनती हैं. हिम से परिपूर्ण हिमनद का धरा के ऊपर खासा बोझ होता है. जब यह चलते हैं तो नीचे और किनारे की चट्टाने पिस कर बारीक आटे के समान हो जाती हैं. हिमनदीय क्षेत्रों में दिन में सूर्य के ताप से पिघला जल, चट्टानों की दरारों में प्रवेश कर जाता है. रात्री में जब पला पड़ता है तब यह जल जम जाता है. दूसरे दिन जब तेज धूप पड़ती है तब यही जमा हुआ जल पिघलता है और अचानक उसका आयतन बढ़ जाता है. परिणामस्वरूप चट्टानें तेज आवाज के साथ फट जाती हैं.
 
इस प्रकार जन्मते हैं चटानों के वृहदाकार टुकड़े. आमतौर पर नदियाँ इतने बड़े  टुकड़ों को ढोकर नहीं ले जा पाती. पर हिमनदों में इतनी शक्ति  होती है कि अपने चलने से इनको अपने साथ ले जाती हैं. इनमे से बहुत सी चट्टाने, हिमनद से पिसी चट्टानों का आटा, तथा इस क्रिया में चट्टानों के छोटे बड़े टुकड़े हिमनद के किनारे, बीच में तथा सामने जमा होते जाते हैं. इस प्रकार कालान्तर में यह मलबा ‘ग्लेशियल मोरेन’ कहलाता है. देखने में भले ही ठोस हो पर मलबा तो मलबा ही होता है. केदारनाथ घाटी ऐसे मलबे से परिपूर्ण है.
इस मलबे के बीच  से जब मन्दाकिनी बहती है तो प्रत्यक्ष है कि जब वर्षा  अधिक होती है तब उसमे बाढ़  भी आती है. मन्दाकिनी किसी जमाने में बाएं पार्श्व  से बहा करती थी. इसीलिए नदी  ने वहाँ काट कर अपनी वेदी (टेरेस) बनाई है, जो अब एक दलदल जैसी है. अर्थात उसमे पानी बहुत है. पर इधर कुछ सौ वर्षों से मन्दाकिनी अपने दायें पार्श्व से अधिक बहती है. केदारनाथ में आबादी बसाने वाले अधिकारियों ने भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट की अनदेखी कर दी जिसमे साफ़ लिखा था कि घाटी का दांया पार्श्व तो नितांत असुरक्षित है, तथा बांया दलदल होने के कारण बहुत सुरक्षित नहीं है.
रही बात केदारनाथ मंदिर की तो उसने तो पिछले  तीन हजार वर्ष में ना जाने कितनी बार हिमस्खलन हुए होंगे! गो कि मंदिर का बाल तक बांका नहीं हुआ पर फिर भी उसके आस पास पड़े बड़े बड़े बोल्डर वहाँ पर किसी मानव ने लाकर नहीं रखे. वे तो पूर्व के हिमस्खलनो के साथ आये. एक बात और है, तेरहवी से सत्रहवीं शताब्दी के बीच चार सौ वर्ष तक केदारनाथ मंदिर ‘मिनि आईस एज’ के दौरान बर्फ से दबा रहा, फिर भी अक्षुण रहा. इस बार भी जिस प्रकार की अचानक बाढ़ घाटी में आई उसमे मंदिर का गर्भगृह साबुत रहा. यह एक हमारे पूर्वजों की इंजीनियरिंग का अनोखा उदाहरण है.
उत्तराखंड राज्य  बनने के बाद पिछले तेरह वर्षों में वहाँ ‘विकास’ की होड़ लग गई. विकास का अर्थ लिया गया निर्माण और अधिक निर्माण. साथ ही टूरिज्म  को बढ़ावा देने की नियत से भी निर्माण में काफी छूट  दी गई. केदारनाथ में नदी के बाढ़ पथ में मकान/होटल बना दिए गए. विकास के पूर्व किसी भी क्षेत्र में धरती की क्षमता जानना अतिआवश्यक है. केदारनाथ जैसे क्षेत्र में हिमस्खलन, भूस्खलन व ‘फ्लैश फ्लड’ आदिकाल से होते रहे हैं, जिनके साक्ष्यों को भूवैज्ञानिक पढते रहे हैं और सरकार को रिपोर्ट देते रहे हैं. पर शायद उन रिपोटों की अनदेखी कर अंधाधुंध निर्माण की इजाजत दे दी गयी!केदारनाथ में  कितना निर्माण हो सकता है पहले उसका आंकलन किया जाना चाहिए, तथा उसके बाद ही वहाँ कितने यात्री एक समय में जा सकते हैं यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए. तभी शायद भविष्य में ऐसी दुर्घटना की पुनरावृति से बचा जा सकेगा!   
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