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बागियों को शह देते मुलायम गैर भाजपावाद की नई पहल दम तोड़ रही है नैनी झील अखिलेश पर दबाव बढ़ा रहें है मुलायम
अपनी जमीन तो नही छोडेंगी नदियां

 अंबरीश कुमार 

उतराखंड की तबाही के बाद अब मैदानी इलाकों में नदियों अब कहर बरपा रही है । तराई के इलाकों में घाघरा कई जिलों में गांव के गांव काटते हुए कस्बों और शहर की और भी बढ़ रही है । नदियों का यह रूप सदियों से देखा जाता रहा है पर इतने बड़े पैमाने पर प्रकोप पिछले कुछ दशको से होने लगा है क्योकि नदियों की जो जमीन छीनी गई थी उसे वे वापस लेने लगी है । यह नदी की स्वभाविक प्रवृति है जिसे न समझने की वजह से ज्यादा समस्या बढ़ रही है और जानमाल का नुकसान भी । नदियों पर मुख्यतः दो तरह का संकट दिखाई पड़ रहा है । पहला नदियों की जमीन यानी खादर के इलाके पर अतिक्रमण और दूसरा नदियों का लगातार प्रदूषित होते जाना ।  केदारनाथ में मंदाकिनी हो या उत्तरकाशी में भागीरथी या फिर गढवाल के नीचे के हिस्से में अलकनंदा सभी ने अपनी जमीन लेने की जब कोशिश की तो उयह लोग भूल गए कि अगर हम नदियों की जमीन छीनने की कोशिश करेंगे तो उसका खामियाजा भी हमें ही भुगतना पड़ेगा । नदियों की जमीन यानी खादर का वह इलाका जो नदी के बढ़ने का होता है उसपर लगातार अतिक्रमण हो रहा है खासकर विकास की नई अवधारणा के चलते हर व्यक्ति को अब रीवर व्यू एपार्टमेंट में घर चाहिए तो होटल उद्योगों को नदी तट पर सैलानियों के लिए रिसार्ट । यह भूल जाते है कि नदियों की धारा लगातार बदलती है और वे कई बार सौ साल पुराने रास्ते पर भी लौट आती है । बिहार में कोसी इसका उदाहरण है । उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गोमती में बड़ी बाद १८७१ में आई तो फिर वैसी बाढ़ १९६० और १९७१ में आई । यह उदाहरण नदियों के बहाव की स्वभाविक प्रवृति को दर्शाता है । पूर्वांचल के देवरिया में बरहज के पास सरयू नदी हर सौ साल में एक तरफ पुरानी जमीन छोडती है तो नई जमीन पर बहने लगती है । पर देवारा के किसान नदी की छोडी गई जमीन पर खेती करते है कोई पक्का निर्माण नहीं । नदी की यह जमीन खेती के लिए बहुत उपजाऊ मानी जाती है । किसान खादर की जमीन पर खेती करते है जबकि शहरी इलाको में नदियों के खादर की जमीन पर लगातार अतिक्रमण होता जा रहा है । संकट की मूल वजह भी यही है । उतराखंड में भारी तबाही के बाद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने नदियों के किनारे निर्माण पर रोक लगाने का फैसला किया । जबकि इससे पहले कांग्रेस और भाजपा दोनों सरकारों ने उतराखंड में नदी हो या पहाड अंधाधुंध ढंग से बेतरतीब निर्माण की इजाजत दी थी ।  उतराखंड ही क्यों हिमाचल के शिमला में अब हर नई ईमारत छह मंजिला बन रही है । छोटा शिमला में हर भवन छह मंजिल का है तो दार्जिलिंग और सिक्किम के गंगटोक में भी यही हाल है । 
पहाड के ढलान और नदी व समुंद्र के तटों पर हो रहा निर्माण कभी भी बड़ी तबाही ला सकता है । चेन्नई से लेकर केरल के तिरुअनंतपुरम तक समुंद्र तटों पर अतिक्रमण बढ़ रहा है । तिरुअनंतपुरम के कोवलम तट पर करीब ढाई दशक पहले तक आसपास कोई बसाहट नहीं थी पर अब तट से आठ दस मीटर पर पक्के  होटल और रिसार्ट बन चुके है जो की समुंद्री तट कानून का सीधा सीधा उल्लंघन है । यह तमिलनाडु के महाबलीपुरम से लेकर कन्याकुमारी तक हो रहा है । बिल्डर लाबी के दबाव से समुंद्र तटों पर होने वाले निर्माण बहुत खतरनाक है । भू वैज्ञानिक वीके जोशी के मुताबिक यह सभी निर्माण भूमि की भार सहने की क्षमता यानी लैंड बियरिंग कैपसिटी का बिना आकलन किए हो रहा है जो बड़े समुंद्री तूफ़ान या सुनामी आने पर खतरनाक साबित हो सकता है । ठीक यही स्थिति मैदानी इलाकों में नदियों के किनारे हो रहे निर्माण और पहाड़ी ढलान पर हो रहे निर्माण पर भी लागू होती है । दिल्ली में सौ साल पहले यमुना कनाट  प्लेस के आसपास से बहती थी और अब दूर जा चुकी है । कई और नदिया है जो पहले शहर के किनारे से बहती थी अब शहर के बीच में आ चुकी है और उनके खादर के इलाके में मोहल्ला बस चुका है । वाराणसी जिन दो नदियों वरुण और असी से मिलकर बना था उसमे एक नदी असी विलुप्त हो चुकी है और उसपर मोहल्ला बस चुका है । हाल ही में एक जनहित याचिका के बाद इसे ढूंढा जा रहा है । ये नदिया जो मैदानी इलाकों में निकली वे बहुत ज्यादा पानी लेकर नही चलती है पर हिमालय की तरफ से आने वाली नदियों का पानी कई बार तबाही मचा देता है । खासकर नेपाल से तराई की तरफ उतरने वाली नदियों को बड़ा मैदान न मिलने की वजह से वे तेज कटान भी करती है और वेग से बहती है । बरसात में यह नदियां विकराल रूप ले लेती है । फिर ये अपने खादर के इलाके को वापस लेती है और इस खादर में हुए अतिक्रमण को ध्वस्त भी कर देती है जिससे तबाही होती है । बिहार और उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर इन नदियों से भारी तबाही होती है ।    
केदारनाथ में जो हादसा हुआ वह ग्लेशियर के पीछे हटने की वजह से बनी झील के टूटने से हुआ ।  भू वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लेशियर जब पीछे हटता है तो एक रोड रोलर की तरह बड़ी चट्टानों को पीसता हुआ चलता है । इसमें बड़ी बड़ी चट्टानों के साथ पत्थर आदि भी होते है ।  यही सब पानी के तेज प्रवाह के साथ मंदाकिनी की एक धारा की तरफ गए और बीच के निर्माण से टकरा कर तबाही की ।  यदि नदी की जमीन पर बड़े पैमाने पर निर्माण न हुआ होता तो हादसा भी इतना विकराल न हुआ होता ।  नदी की जमीन छीनने की वजह से ही इतनी बड़ी आपदा आई ।  यह प्रवृति अभी भी जारी है जिसपर गंभीरता से विचार करना होगा ।  यह एक पहलू है ।   
बरसात में हिमालय की ये नदिया शोक बन जाती है पर दूसरी तरफ कुछ ऐसी नदिया भी है जिन्हें इसी बरसात में जीवन मिल जाता है । ये वे छोटी और बरसाती नदियां है जो बरसात के बाद दम तोड़ देती है ।तरह तरह के कचरे से इनका पानी इतना जहरीला हो चुका है कि इसे पीकर जानवर भी दम तोड़ दे रहा है ।बीते अप्रैल महीने में मनकापुर से आगे सादुल्लानगर वन प्रभाग में विसुही नदी और मनोरमा नदी का पानी पीने की वजह से दो हिरन की मौत हो गई। तराई में इस तरह की छोटी नदियां चीनी मीलों और उद्योगों के जहरीले कचरे का नाला बन गई है । गोरखपुर की आमी नदी हो या गोंडा की विसुही और मनोरमा नदी हो सभी उद्योगों के कचरे के चलते जहरीली हो गई है । आमी नदी गोरखपुर मंडल में कभी अमृत जैसा पानी लोगों को देती थी । पर अब आमी नदी पूर्वांचल में अभिशाप बन चुकी है और उसका पानी जहरीला हो चुका है । एक उदाहरण गुजरात में वापी का जो एक बड़ा औद्योगिक शहर है और इसका कचरा ढोने वाली दमन गंगा इतनी जहरीली हो चुकी है कि इस नदी में मछली जिन्दा नहीं रह सकती ।  यह नदी जब समुंद्र में मिलती है तो समुंद्र के जीव जंतु भी दम तोड़ देते है । नदियों की जमीन पर अतिक्रमण के अलावा उन्हें प्रदूषित कर भी हम उन्हें धीरे धीरे खत्म करने की कोशिश ही कर रहे है । नवभारत टाइम्स   
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