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घर की देहरी लांघ स्टार प्रचारक बन गई डिंपल वह बेजान है और हम जानदार हैं ' मुलायम के लोग ' चले गए ! बिगड़े जदयू-राजद के रिश्ते
तीन पीढ़ियां तीन दृष्टिकोण

  केपी सिंह

हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सदियों से चला आता आपसी भरोसा, अवध की अपनी तरह की अनूठी गंगा-जमुनी संस्कृति की देन है। इसमें मंदिर-मस्जिद विवाद के चलते आई दरारों को प्राय: उस शांति के मुलम्मे से ढक दिया जाता है, जो 2010 में आये हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी भंग नहीं हुई। लेकिन, सांप्रदायिकता व कट्टरता के पैरोकार अब इस शांति के तिलिस्म को तोड़ने से भी बाज नहीं आ रहे। गत दशहरे पर अयोध्या के जुड़वां शहर व जिला मुख्यालय फैजाबाद के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में कथित छेड़छाड़ की एक मामूली सी घटना के बहाने भड़काए गए उपद्रव और अभी 21 अपै्रल, 2013 को कचेहरी में अल्पसंख्यक वकीलों पर हमले इसकी मिसाल हैं। वैसे भी शांति तभी लंबी उम्र पाती है, जब उसे लोगों के दिल व दिमाग में स्वत:स्फूर्त ढंग से प्रवाहित होने दिया जाए और उसकी स्थापना भय, अविश्वास अथवा जोर-जबरदस्ती की बिना पर न की जाए!
...जब धुटने टेकेगा अन्याय: लाल मोहम्मद
जाने क्या बात है कि अयोध्या के कोटिया मोहल्ले के निवासी वयोवृद्ध लाल मुहम्मद की बूढ़ी आखों ने अभी भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है। भले ही मूर्तियां रखे जाने के बाद विवादित मस्जिद में बंद तालों को एक फरवरी, 1986 को मुसलमानों का पक्ष सुने बिना खोल दिया गया, ध्वंस के बाद विवादित ढांचे को उसकी जगह पर जस का जस खड़ा करने का प्रधानमंत्री का वादा पूरा नहीं हुआ और हाईकोर्ट का फैसला भी किसी परिणति तक नहीं पहुंच सका!
जन्नतनशीन रहीमुल्ला के एक दिसम्बर, 1936 को पैदा हुए बेटे लाल मोहम्मद 22-23 दिसम्बर, 1949 की उस रात के गिने-चुने प्रत्यक्षदर्शियों में से हैं, जब बाबरी मस्जिद में साजिशन मूर्तियां रखी गईं या रखने वालों की भाषा में कहें तो वहां भगवान राम का ‘प्राकट्य’ हो गया! लाल मोहम्मद बताते हैं कि तब वे होश संभाल रहे थे। 23 दिसंबर, 1949 की सुबह वे आम शुक्रवारों की तरह, अलबत्ता, थोड़े अंदेशे के साथ, खुद से 20-22 साल बड़े अपने मामू  मुन्नू के साथ मस्जिद में नमाज के लिए पहुंचे, तो पाया कि मूर्तियां रखने के लिए मस्जिद के मुअज्जिन मुहम्मद इस्माइल को रात में ही मारपीट कर भगा दिया गया, फिर निषेधाज्ञा लगा दी गई और सुबह होते-होते वहां तैनात पुलिस नमाजियों को अंदर जाने से रोकने लगी।
    इस पर एतराज करने वाले नमाजियों के साथ मुन्नू व लाल मोहम्मद को भी पुलिस ने बेरहमी से पीटा और गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। फैजाबाद जेल में हुई सुनवाई में मजिस्ट्रेट द्वारा उन सबको महीने भर की कैद की सजा सुना दी गई और अलग-अलग जेलों में भेज दिया गया। लाल मोहम्मद की अवयस्कता पर भी रहम नहीं किया गया और उनको गोंडा जेल में यातनाओं के बीच बिना कसूर की सजा काटनी पड़ी। लाल मोहम्मद के लिए उस ‘रात’ की सुबह अभी तक नहीं हुई। 1949 में वे दर्जन भर रिक्शों के मालिक थे, जिनको चलवाने से इतनी आय हो जाती थी कि आराम से गुजारा हो सके, लेकिन अब उनके कुल मिलाकर सात बेटे-बेटियां मजदूरी करते हैं और उनके सिर पर छत के नाम पर बस एक झोपड़ी है। इस सबके लिए वे आम हिंदुओं को दोष नहीं देते। 1986, 1990 और 1992 के लिए भी नहीं। कहते हैं कि यह सब हिंदुओं को भरमाने व भटकाने का ‘अहलेदानिश’ का खेल है, जिसे सत्ताधीश, धर्माधीश व राजनीतिबाज मिलकर खेलते रहते हैं। 1949 में यह खेल इसलिए सफल हुआ कि मुसलमान देश का विभाजन कराने की तोहमत के बोझ से दबे हुए थे। 1986, 1990 व 1992 में इसलिए कि शौर्य दिवस, विजय दिवस मनाने वाले हिंदुओं को मालूम नहीं था कि उनके अपने ही नेता उन्हें ठग रहे हैं। लाल मुहम्मद के अनुसार ‘मुसलमानों को अभी भी दबाकर ही रखा जा रहा है! लेकिन बढ़ती चेतना के बीच बहुत दिनों तक उनकी हकतलफी संभव नहीं होगी। एक दिन ऐसा जरूर आयेगा, जब हक बात होगी और अन्याय हार मानने को मजबूर हो जाएगा।’
और भी गम हैं, जमाने में: अनुराग शर्मा
अयोध्या के जुड़वां शहर फैजाबाद में 6 जनवरी, 1971 को जनमे और वकालत व कंप्यूटर तक की पढ़ाई कर चुके युवा उद्यमी अनुराग वर्मा की उम्र 1986 में ताले खोले जाने के वक्त कमोबेश उतनी ही थी, जितनी 1949 में लाल मुहम्मद की। लेकिन उनका विद्रोही मन मंदिर-मस्जिद आंदोलन से जुड़ी कोई भी तारीख याद नहीं रखना चाहता। ताले खुले तो अनुराग हाईस्कूल में पढ़ते थे और समझ नहीं पा रहे थे कि जिस फैसले से दिलों की दूरियां बढ़ रही हैं और भाई-भाई के बीच दीवार खड़ी हो रही है, उसे लेकर दीपावली मनाने के पागलपन का हासिल क्या है? लेकिन 90-92 की हिंसा व हड़बोंग ने उनको विधिवत समझा दिया कि हमने देश बंटने के समय हुई भयावह हिंसा से भी कोई सबक नहीं सीखा। सीखते तो जान जाते कि मंदिर-मस्जिद के अलावा भी दुनिया में कई गम हैं और हिंसा या जोर-जबरदस्ती से विवाद हल नहीं होते, बल्कि और जटिल हो जाते हैं। अनुराग ने कहा, ‘मैं भूलूंगा नहीं, 92 में ध्वंस के बाद के कारसेवकराज में सूनी सड़क पर अपने बीमार दुधमुंहे भतीजे को अस्पताल से घर लाने के लिए विश्व हिंदू परिषद के स्वयंसेवकों से उनकी वैन में लिफ्ट मांगी तो उन्होंने मना कर दिया था। हिंदू होने का हवाला देने पर भी नहीं पसीजे थे, क्योंकि मैं दूसरी जाति से था! पिछले बीस वर्षों में अयोध्या में वह पीढ़ी भी जवान हो गई है, जिसने बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखी जाने से लेकर 1992 में उसके ध्वंस तक कुछ भी अपनी आंखों से नहीं देखा। इस पीढ़ी का आसमान तो पिछली पीढ़ी से अलग है ही, सपने, मंसूबे, विचार, नैतिकताएं, मान्यताएं और मूल्य आदि भी अलग हैं। अच्छे हैं या बुरे, इस पर अलग से बहस की जा सकती है। दुर्भाग्य से जीवनस्थितियों की जटिलताएं व अनिश्चितताएं इस पीढ़ी को आत्ममुग्धता, स्वार्थपरता, कुटिलता व मूल्यहीनता जैसी तोहमतों के हवाले करती जा रही हंै और वह न अपने पर्यावरण को दूषित होने से बचा पा रही है और न चेतनाओं को। इससे वह उम्मीद भी धुंधला रही है कि यह पीढ़ी उसे विरासत में मिले इस विवाद को सौमनस्य के किसी तार्किक बिंदु तक ले जाएगी। 
पहचानती नहीं अभी राहवर को: भूमिका
 बीते दशहरे पर फैजाबाद में जो दंगे हुए, उनमें यही पीढ़ी ‘यूपी भी गुजरात बनेगा, फैजाबाद शुरुआत करेगा’ जैसे नारे लगाती और आगजनी व लूटपाट में सबसे अग्रणी भूमिका निभाती दिखी। इससे उन्हीं लोगों की बांछें खिलीं, जो उसके रूप में एक और पीढ़ी को सांप्रदायिक कट्टरताआें व जुनूनों के हवाले करना व लाभ उठाना चाहते हैं। संतोष की बात इतनी ही है कि इस पीढ़ी के भीतर से भी इसकी आलोचना के कुछ स्वर मुखर हैं। 
    पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े साकेत पीजी कालेज से ड्राइंग-पेंटिंग से एमए कर रही छात्रा भूमिका शायद इसीलिए सांप्रदायिक हिंदू-मुसलमानों को कबीर के शब्दों में लताड़ती हुई हैं-इन दोउन राह न पाई! तो अपनी पीढ़ी से इसलिए नाराज हैं कि वह इनसे पूछती नहीं है कि रास्ता पाने में अभी ये और कितना समय लेंगे? फिर कहती हैं कि शायद इसलिए नहीं पूछ पाती क्योंकि पुरानी पहचानों से विलग हो गई है, लेकिन अपनी कोई नयी पहचान बना नहीं पाई है। सो पहचान के संकट से जूझती हुई खुद भी रास्ता ही तलाश रही है, संक्रमणकाल में जा फंसी है और-चलती है थोड़ी दूर हर इक तेज रौ के साथ, पहचानती नहीं है अभी राहवर को यह! 
   भूमिका सवाल उठाती हैं कि इस बात का क्या तुक है कि छ:दिसम्बर को ढहा दिए गए पूजास्थल की तो बीसवीं बरसी मनाई जाए, लेकिन यह तथ्य किसी को याद न आए कि उस दिन अयोध्या में सोलह ‘बाबर की संतानों’ को मार डाला गया था और उनके कई सौ घर जला दिए गए थे? उनके अनुसार यह पूजास्थल से बड़ा नुकसान था, पर इसकी न कोई एफआईआर दर्ज हुई और न कोई जांच हुई। किसी ने इसके लिए आवाज भी नहीं उठाई। वे पूछती हैं कि क्या धर्मों-संप्रदायों के विवाद में आदमियों की जानें इतनी फालतू हो जाती हंै कि उनके जाने का कोई नोटिस ही न लिया जाए? उनके प्रश्नों से उम्मीद बंधती है कि नई पीढ़ी किसी न किसी दिन इस विवाद को अवश्य ही उसकी व्यर्थता का अहसास करा देगी।http://www.100flovers.blogspot.in
 
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