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जे युद्धे भाई के मारे भाई

अरुण कुमार त्रिपाठी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, सहारनपुर के शहरी इलाकों और उसके बाद गाँवों को जिस तरह की सामुदायिक हिंसा की आग की लपटों ने घेर लिया है वह बहुत कुछ जलाने जा रही है। इस आग से न सिर्फ लम्बे समय से कायम शांति स्वाहा हो रही है बल्कि वह साझी विरासत और साझी शहादत भी खाक हो रही है जिस पर हमारा समाज नाज करता रहा है, जिसके सहारे हजारों सालों से टिका है और आगे टिका रहने का दम भरता है।
 
यह वही विरासत है जिसके बूते पर हम और हमारे शायर इकबाल कहते रहे हैं कि– कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमाँ हमारा। दुखद बात यह है कि इस हिंसा में वे जातियाँ और वे समुदाय लगे हुयें हैं जो मूलत: एक हैं और जिन्हें वक्त के संक्रमण ने अलग अस्मिता प्रदान कर दी थी। गाठवाला खाप और बालियान खाप की चर्चा गाँव के प्रेमियों को कठोर दण्ड देने के लिये भले होती रही हो लेकिन सांप्रदायिक दंगों के लिये उनका नाम कम ही लिया जाता रहा है। उधर इसी बिरादरी से निकल कर अल्पसंख्यक समाज में शामिल हो चुके मूले जाट कभी भी दंगों में शामिल होने के लिये विवादित नहीं रहे, लेकिन आज खाप पंचायतों के मुकाबले मूले जाटों ने मोर्चा संभाल रखा है। वजह साफ है कि वे सब आये तो उन्हीं समुदायों से जिन्हें आज बहुसंख्यक और उन्हें अल्पसंख्यक कहा जाता है लेकिन आज वे सामाजिक शक्तियाँ निष्क्रिय हैं जो इन्हें जोड़ती थीं और वे राजनीतिक ताकतें सक्रिय हैं जो इन्हें तोड़ती हैं। दूसरी तरफ प्रशासन वैसा काम कर रहा है जो इस रिश्ते को समझता नहीं। प्रशासन की लापरवाही और नासमझी की चर्चा तो प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने भी अपनी रिपोर्ट में की है और उन्होंने नौसिखिए प्रशासन की एकतरफा कार्रवाई को इसके लिये जिम्मेदार ठहराया है।
 
अभी नगला गाँव में हुयी जिस खाप पंचायत में गरमा गरम भाषण हुये और जिसके जुलूस को प्रशानिक सुरक्षा न किये जाने से हिंसा भड़की वह घटना पंचायतों के इतिहास का अपवाद है। यहाँ की सर्वखाप पंचायतों का इतिहास समुदायों के अन्दर भले अनुदारता का रहा हो लेकिन समुदायों के बाहर उदारता, समन्वय और स्वतंत्रता का रहा है। सन 2010 में पास के सौरम गाँव में सर्वखाप पंचायत हुयी थी जिसमें देश भर की विभिन्न जातियों के प्रधान और चौधरी मौजूद थे। उस पंचायत में बिहार, पंजाब, हरियाणा ,महाराष्ट्र और अन्य प्रदेशों के लोग थे, जिसमें महज हिन्दू जातियों के चौधरी ही नहीं, मुस्लिम और ईसाई जाति के भी चौधरी थे। उन लोगों ने सभी जातियों की खेती सामाजिकता और गौरवशाली परम्परा को बचाने के लिये एकजुटता का आह्वान भी किया था। बताते हैं कि उस पंचायत में 85 खापों के मुखिया मौजूद थे।
 
सौरम की इसी तरह सर्वखाप पंचायत ने 1857 में एक मंच से आजादी की लड़ाई लड़ने का फैसला किया था। आश्चर्य की बात है कि उस पंचायत में एक तरफ- अल्लाह हो अकबर का नारा लगा था और दूसरी तरफ हर-हर महादेव का। यह नारे अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ भारतीय समाज की एकजुटता के नारे थे। इन्हीं नारों को लगाते हुये भारतीय किसान और सैनिक मेरठ और मुजफ्फरनगर से निकलकर 10 मई को दिल्ली की ओर चल दिये थे। बाद में उन किसानों के पुरुषों के चले जाने के बाद मुजफ्फरनगर की महिलाओं ने मोर्चा संभाला था और अपने घरेलू हथियारों से अंग्रेजी सैनिकों के छक्के छुड़ाये थे और फाँसी का फँदा चूमा था।
 
उसी साझी विरासत के दम पर हाल तक भारतीय किसान यूनियन के करिश्माई नेता महेंद्र सिंह टिकैत किसानों का मुद्दा लेकर अस्सी के दशक के अन्त और नब्बे के दशक के आरम्भ में दिल्ली घेर लिया करते थे। उन्हीं टिकैत ने अपने आन्दोलन के माध्यम से सांप्रदायिक सद्भाव की अदभुत मिसाल कायम की थी। नईमा नाम की एक मुस्लिम लड़की से बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गयी थी और उसके शव को नहर में फेंक दिया गया था। यह घटना 3 अगस्त 1989 की है। भारतीय किसान यूनियन ने नईमा के परिवार को इंसाफ दिलाने के लिये प्रशासन को झकझोर दिया। उसके लिए महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हिन्दू और मुस्लिम किसानों ने एक जुट होकर भोपा में धरना दिया और 39 दिनों तक आन्दोलन किया। आज भी मुजफ्फरनगर से शुक्रताल जाते समय रास्ते में नईमा की कब्र है और वह अगर स्त्री दमन की याद दिलाती है तो दूसरी तरफ साप्रदायिक सदभाव की भी मिसाल है। यहाँ यह बात भी उल्लेखनीय है उस समय टिकैत के मंच से- हर हर महादेव और अल्लाह हो अकबर के नारे- एक साथ लगते थे। वह समय अयोध्या आंदोलन के नाम पर हो रहे ध्रुवीकरण का था इसलिये अगर कोई–जय श्रीराम का नारा लगाता था- तो उसे टिकैत खुद मंच से उतार देते थे।
 
दिक्कत यह हुयी है कि प्रशासन और राजनीति ने खाप पंचायतों को अपने फायदे और सुविधा के लिये बाँटने के उद्देश्य से उन सारी परम्पराओं को धो डाला है जिन पर किसी समाज का सौहार्दपूर्ण सन्तुलन बना होता है। न वे इस जटिल रिश्ते को समझते हैं न ही इसके आधार पर सौहार्द बनाना चाहते हैं। इस ध्रुवीकरण से वे खुश हैं जिनका वोट प्रतिशत घटकर आधा रह गया था और अब दुगुना होने की उम्मीद है। अभी प्रशासन को थोड़ी सद्बुद्धि आती हुयी लग रही है और वह भारतीय किसान यूनियन और दूसरे खाप नेताओं की उन पुराने अफसरों से बात करा रहा है जो गाँवों से पलायन कर रहे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को भरोसा देकर रोक सकते हैं।
 
सवाल उठता है कि जब- जब देश पर आर्थिक संकट आता है तो ऐसा क्यों होता है कि सांप्रदायिक ताकतें सक्रिय हो जाती हैं और साम्राज्यवाद उनसे मिलकर अपने नए दाँव खेलता है? यह बात पूँजीवादी विचारों की पत्रिका- इकॉनामिस्ट- ने भी माना था कि भारत में 1991 जैसै हालात हैं और यह भविष्यवाणी भी की थी कि यहाँ सामाजिक तनाव और हिंसा भी हो सकती है। यहाँ यह बात ध्यान देने की है नवउदारवाद का आगमन और देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का समय लगभग आसपास है। सन् 1992 में एक तरफ बाबरी मस्जिद तोड़ी जाती है और दूसरी तरफ डंकल प्रस्ताव लागू होता है। इन घटनाओं की समीपता यह संकेत देती है कि हर संकट को पूँजीवाद, साम्राज्यवाद और साम्प्रदायिकता के माध्यम से अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश करता है। आज भी 1991 जैसा संकट बताकर वैसा ही हो रहा है। इस संकट का मुकाबला और इससे नया रास्ता हम तभी निकाल सकते हैं जब हम अपनी सामाजिक एकता को टूटने न दें। इसी एकता को बनाने के लिये रवींद्र नाथ टैगोर ने अपनी कविता में सबोधन किया था कि–जे युद्धे भाई के मारे भाई, से लड़ाई ईश्वरेर विरुद्धे लड़ाई। जे करे धर्मेर नामे विद्वेष संचित, ईश्वर के अर्घ्य हते से करे वंचित। इस कविता का महात्मा गांधी ने स्वयं अनुवाद किया था—जिस युद्ध में भाई भाई को मारता है, वह युद्ध ईश्वर के विरुद्ध लड़ाई है। जो धर्म के नाम पर विद्वेष पालता है वह ईश्वर को अर्घ्य से वंचित करता है।
 
इसलिये आज फिर वही सवाल है कि क्या हम भाई को भाई से मारने से रोककर उसे उस साझी विरासत की याद दिला पायेंगे?
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