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पंजाब में सरकार निकली खलनायक

जनादेश ब्यूरो

नई दिल्ली , 26  मई -आग लगती है तो लगने दो, बसें जलती हैं तो जलने दो, पहले ये लोग थोड़ी तोड़फोड़ करेंगे फिर थक हार कर अपने अपने घरों को चले जाएंगे, नो फायरिंग! ये डायलाग हाल ही में आई फिल्म नायक के हैं जिन्हें अमरीश पुरी के रूप में एक प्रदेश का मुख्यमंत्री पुलिस प्रमुख को वायरलैस पर हिदायत देते हुए बोलता है व पत्रकार के रूप में फिल्म का नायक इन्हें रिकार्ड कर लेता है। पंजाब के मुख्यमंत्री के आदेशों की कोई रिकार्डिंग हमारे पास नहीं है पर जिस प्रकार इस वक्त पंजाब एक तरफा दंगाईयों के दलित आतंकवाद के सामने बेबस है, उससे लगता है कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल भी अमरीश पुरी की ही भूमिका में हैं।
इस वक्त इस जंगल राज की स्थापना को अठारह घंटे हो चुके हैं। पुलिस तक के वाहन जलाए जा चुके हैं भरी पूरी ट्रेन को आग लगा दी गई है, सड़क पर दिखने वाली हर गाड़ी को पहले जलाने की कोशिश की गई है। जो जल्दबाजी के कारण जलाई नहीं जा सकी उनके टूटे हुए शीशे प्रदर्शनकारियों की उग्र मानसिकता का परिचय देने के लिए काफी है। सड़कों पर खड़े रिक्शे-रेहड़ी का और कुछ नहीं बिगड़ सका तो उसकी हवा ही निकाल दी गई है। करीब तीन दर्जन बसें जलाई जा चुकी हैं दो दर्जन कारें व असंख्य मोटर साईकिल स्कूटर। पुलिस की मुस्तैदी का ये आलम है कि जिला जालंधर के पास के कस्बे फिल्लौर में जब दो हजार दलित दंगाईयों की फौज को नियंत्रित करने के लिए पुलिस दल बल सहित पहुंची तो एसएचओ की कार को आग लगा दी गई, पुलिस वैन को पूरी तरह से तोड़ डाला गया। पुलिस वालों ने भाग कर अपनी जान बचाई। फिल्लौर के साथ सटे एक गांव में हुए किसी झगड़े के बाद एक व्यक्ति थाने अर्जी देने गया तो उसने पाया कि थाने वालों ने अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भीतर से कुंडी लगाई हुई है। दरवाजे के छोटे से छेद में डाल कर वो शिकायतकर्ता अपनी अर्जी का थाने में प्रवेश करवा सका।
 मामला जालंधर के निकट गांव बल्लां में स्थित रविदासी परंपरा के डेरा सच्चखंड के गद्दी नशीन संत निरंजन दास व संत रामानंद (भविष्य के गद्दीनशीन) जो कि आजकल आस्ट्रिया के शहर वियना के दौर पर हैं, गुरुद्वारे में कुछ लोगों ने घुस कर अंधाधुंध फायरिंग कर दी। गोलीबारी के चलते संत रामानंद की मृत्यु हो गई। संत निरंजन दास घायल हैं। यह दुखद व निंदनीय घटना सात समंदर पार घटी है। डेरा सच्चखंड रविदासी परंपरा को मानने वालों के लिए एक तीर्थ का दर्जा रखता है, इस बात पर भी कोई संदेह नहीं है। पर जालंधर के एक रेस्तरां पृथ्वी प्लैनेट में खाना खा रहे उन दो दर्जन लोगों को वियाना में घटी घटना के जिम्मेदार कैसे माना जा सकता है जिनकी रेस्तरां के बाहर खड़ी दो दर्जन महंगी गाड़ियों को तोड़फोड़ कर आग के हवाले कर दिया गया? किसी समुदाय विशेष की धार्मिक भावना आहत होने पर हमेशा समाज मरहम लगाया करता है पर बिना किसी तर्क के ही आप किसी अच्छे भले आदमी की कार को जला कर राख कर देंगे तो आपको कोई आहत नहीं घातक ही मानेंगा।

वियाना में हुए धार्मिक नेता के हमले के जवाब में यदि रविदासी समाज का हजूम जालंधर के साथ सटे कस्बे खांबड़ा से दो शराब के ठेकों के ताले तोड़ कर उसे लूट लेता है तो ये सवाल मन में उठना स्वाभाविक ही है कि धार्मिक नेता पर हमला व शराब के ठेके की लूट का भला आपस में क्या संबंध है और किस तर्क के लिहाज से इसे जस्टीफाई किया जा सकता है? क्या शराब का ठेका लूटने के लिए इस मौके का इस्तेमाल किया जा रहा है? यदि ऐसा है तो ये उस समाज के लिए ही बड़े शर्म की बात कही जा सकती है। पूरे पंजाब में रविदासी समाज के लोग तलवारें व लाठियां उठाए ललकारे मारते गुस्से से भरे हुए दनदना रहे हैं पर क्या वे बताएंगे कि किसका गुस्सा है और किस पर निकाला जा रहा है? क्या जिस शहर में वे रहते हैं वहां उपद्रव करना, सरकारी संपत्ति को नुक्सान पहुंचाना, लोगों के घरों के दरवाजों को तोड़ देना, गलियों में लगे बल्ब व टयूबों को अपने गुस्से का निशाना बनाना, बैंक को तोड़ कर कम्प्यूटर उठा ले जाना, पेट्रोल पंप-एटीएम को तोड़ देना भला कहां की धार्मिकता है?

जालंधर के उत्तरी दिशा में स्थित कस्बा आदमपुर में तो हालात और भी ज्यादा खराब हैं। वहां पर उग्र रविदासियों व दूसरे वर्गों मर्ें र्आमने सामने सीधा टकराव हो गया है। ऐसे टकराव को दंगा कहा जाता है। अपनी धार्मिकता का परिचय देने आए रविदासियों के हजूम ने जैसे ही तोड़फोड़ शुरु की वैसे ही दूसरे वर्गों र्के लोग भी लाठिया लिए मैदान में उतर आए। यहां दोनों तरफों के लोग घायल हुए, दोनों पक्षों के वाहन जले। हमलावर भाग चुके हैं। वे नए हमले की व्योंतबंदी बना रहे हैं। सामना करने वाले भी इक्ट्ठे हो रहे हैं। ये संचार माध्यमों की तेजी का युग है। ये संदेश दूसरे शहरों में पहुंच रहा है। इस तरह आमने सामने वाले हालात बन गए तो पंजाब बुरी तरह से दंगों का शिकार हो जाएगा। मैने तो विभाजन का दौर नहीं देखा पर उस दौर के हालात को दर्जन भर किताबों में पढ़ा जरूर है जिसे पढ़ने के बाद लगता था कि क्या इस हद तक अतार्किक आधार पर भी फसाद हो सकते हैं?
पर अपनी आंखों के सामने घटित हो रहे हालात देख कर समझ में आ जाता है कि फसाद का समाज शास्त्र कैसा होता है? सबसे बड़ी बात तो ये है कि दोपहर साढ़े बारह बजे से जालंधर के केबल नेटवर्क पर बाकी के सभी चैनल काम कर रहे हैं पर खबरों के चैनलों का ये हाल है जैसे उन्हें पीछे से बंद कर दिया गया हो। मैं आज खुद को दो दशक पीछे वाले दौर में पहुंचा महसूस कर रहा हूं जहां एकाध चैनल ही चलता था? सुना है कि सारे पंजाब की केबल का रिमोट कंट्रोल लुधियाना में है जिसकी मालिकी में पंजाब के सबसे शक्तिशाली सत्ताधारी परिवार का अच्छा भला हिस्सा है। शायद सरकार की इस मुद्दे पर हो रही खिंचाई जनता न देख सके इसलिए सूचना रूपी हमारे मौलिक अधिकार पर भी सरकारी जंगलराज स्थापित हो चुका है। मुझे उम्मीद कम ही है कि इस बदमाशी की तरफ इशारा करती कोई खबर शायद ही कल के किसी अखबार में देखने को मिले।
 

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