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सबुज रंग छीट मगाय द....
 चंचल 
            आज भावना मिलने आयी थी . हम लोग जब भी मिलते हैं खाने बनाने पर उलझे रहते हैं . आज विषय बदल गया . छीट पर चला गया . भावना को नहीं मालुम की छीट क्या है . सहज और सरल तरीके से हमने बताया कि यह अक्टूबर महीना है बापू का जन्मदिन चल रहा है .खादी पर छूट होगी . वहाँ खादी की छीट खरीदो और खुद सिलो . 'मै सिलूं ? पूरी जोकर लगूंगी ' तो क्या हुआ कुछ तो लगोगी . देखिये क्या होता है . 
        बहुत सारी महिलायें हमारी दोस्त हैं .वो किसी भी उम्र की हों इससे कोइ मतलब नहीं . इनमे से कईयों के पास कमाल का जज्बा है . उनसे कहता हूँ चलिए इस महीने खादी की छीट पर आइये . साड़ी ,कुर्ती .ब्लाउज .दुपट्टा आदि आदि . खरीदिए और पहन कर ब कायदे सड़क पर उतारिये . बिंदास . दीजिए चुनौती उन घरानों को जो देश को लूट रहे हैं . अखबार के पन्नों और डब्बे के लिपेपुते चेहरों को जो झूठ बोल कर 'सिंथेटिक कपड़ों' का विज्ञापन करते हैं . अपनी जेब भरते हैं और सौकीन मिजाज लोगों के 'स्किन ' को बर्बाद करते हैं . खादी में स्वाभिमान है उस स्वाभिमान को राष्ट्रीय चरित्र बनाने हमें गर्व होगा . खादी से जुड़े चौवालीस लाख परिवार के हाथ मजबूत होंगे . यह एक घराने की बपौती नहीं है . इस तरह हम छोटी -छोटी चीजों को उठा कर खुद में स्वाभिमान और राष्ट्र को समर्थवान बना सकते हैं . 
        एक दिन किसी अति 'बड़ी पार्टी ' में जहां एक से बढ़ कर एक प्रदर्शन होते हैं वहाँ खादी के 'रफ त्रेक्चार 'के साथ अपने खादी लिबास में  पहुंचिए . .... यह पार्टी के 'एथिक 'में ' इरर ' होगा . यहीं न ? खादी कहता है -'इरर इज आवर ब्यूटी ' 
     भावना ने पूछा -ते छीट होता क्या है ? हमने कहा रुको ,और हमने 'कादम्बनी ' का वह नया अंक उसे सौंप दिया जिसे हमारे मित्र राजीव कटारा ने हमें दिया था . उसके आख़िरी पन्ने पर हमारे 'पुराने ' मित्र इब्बार रब्बी ने छीट पर लिखा है . और जो उन्होंने नहीं लिखा उसे हम बता रहे हैं . छीट हमारा इतिहास है . सौंदर्यबोध का अदभुत उदाहरण . भारत कापसे बुनता था , उस पर छपाई करता था . उस छपाई को छीट कहते थे वह छीट सारी दुनिया में व्यापार देती रही . हम खुशहाल रहे . इसे अंग्रेजों ने तबाह किया . हमें सेंथेटिक की तरफ ले गए .गांधी जी ने उसका जवाब दिया . आज वो हथियार आपके हाथ में है .उसे उठा कर चलिए न दो कदम.  
 
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