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मन्ना डे , एक पीढी विदा हो गई

वीर विनोद छाबड़ा 

प्रबोध चंद्र डे उर्फ मन्ना डे के निधन से उनके परिवार की एक पीढ़ी ही अस्त नहीं हुई बल्कि हिंदी फ़िल्म जगत के पुरुष गायन क्षेत्र की एक पीढ़ी भी समाप्त हो गयी है। हेमंत कुमार, मोहम्मद रफी, मुकेश, महेंद्र कपूर, किशोर कुमार और अब मन्ना....। बिछुड़े सभी बारी बारी। सिर्फ दिल ही नहीं आत्मा भी स्वर बन कर गले से निकल कर वातावरण में विचरती थी। ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछुड़े चमन.../काबुलीवाला/ये रात भीगी-भीगी, ये रात चांद प्यारा प्यारा.../चोरी चोरी/ प्यार हुआ इकरार हुआ.../आवारा/ रमैया वता वैया..../श्री 420/मुस्कुरा लाड़ले मुस्कुरा, कोई भी फूल नहीं है तुझसा खूबसूरत.../एक फूल दो माली/ याला-याला दिल ले गयी.../उजाला/ ऐ मेरी ज़ोहरा जबीं तुझे मालुम नहीं.../वक़्त/ कौन आया मेरे दिल के द्वारे पायल की झंकार लिए.../देख कबीरा रोया/पूछो ना कैसे मैंने रैन बिताई.../मेरी सूरत तेरी आंखें/ लागा चुनरी में दाग़ छिपाऊं कैसे.../दिल ही तो है/ ऐ भाई ज़रा देख के चलो.../मेरा नाम जोकर/ कस्मे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं..../उपकार/ ना मांगू सोना-चांदी ना मांगू हीरा-मोती..../बाबी/ प्यार की आग में तन-बदन जल गया.../ज़िद््दी/ फुल गेंदवा ना मारो लगत करेजवा में तीर...आदि बेशुमार अमर नग़मों के गायक प्रबोध चंद्र अपने घरेलू नाम ’मन्ना’ डे के नाम से विख्यात हुए।
मन्ना के प्रेरणा स्त्रोत उनके जन्मांध चाचा विख्यात संगीतज्ञ-गायक के.सी. डे थे जिनकी मदद के वास्ते मन्ना कलकत्ता से मुबई आए थे। शास़्त्रीय संगीत में पकड़ इतनी अच्छी थी कि शास्त्रीय संगीत के महापंडित पं.भीमसेन जोशी भी ’बसंत बहार’ से उनके गायन के पक्के मुरीद हो गए थे। एकल गायन में उनकी विशिष्ट पहचान तो थी ही, जुगलबंदी में भी उनका जवाब नहीं था। लता व आशा के साथ सौ से ज्यादा और रफी व किशोर के साथ पचास से ज्यादा जुगलबंदियां कीं। फुटबाल, क्रिकेट, कुश्ती व पतंगबाजी के शौकीन मन्ना ने संगीत से शास्त्रीयता व मिठास को गायब होते देख 2001 में मंबई को अलविदा कह कर छोटी बेटी सुमिता के घर बैंगलौर आ गए। उन्हों साठ से ज्यादा साल तक गायन को अपनी आत्मा दी थी। 
बांग्ला में प्रकाशित ‘जीबोनेर जलसा घरे’ उनकी आत्मकथा है जो हिंदी में ‘यादें जी उठीं’ के नाम से आयी। पद्मश्री, पद्मविभूषण, दादा साहब फालके, फ़िल्मफे़यर लाईफ़टाईम आदि अनेक पुरुस्कार उन्हें मिले। मगर हर यही दिखा कि इससे मन्ना नहीं अपितु पुरुस्कार पुरुस्कृत हुआ यानि सारे पुरुस्कार उनकी बहुआयामी प्रतिभा व व्यक्त्वि के समक्ष बौने थे। अमर आवाज़ों की दुनिया का ये जादूगर आज दुनिया के समक्ष ये पहेली छोड़ कर परमात्मा में विलीन हो गया है- जिं़दगी कैसी है पहेली...../आनंद/। शत-शत प्रणाम मन्ना दा!
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