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घरेलू श्रमिकों की पीड़ा

सोनल शर्मा

 अभी दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में महिला घरेलू श्रमिक पर उसकी मालकिन की बर्बरता का मामला लोगों के जहन में धुंधलाया भी नहीं था कि पिछले दिनों बसपा सांसद धनंजय सिंह के साउथ एवेन्यू स्थित घर पर घरेलू सहायक की हत्या की सन्न कर देने वाली घटना सामने आ गई।
बहुत थोड़े अंतराल पर हुई इन दोनों घटनाओं के बाद दिल्ली में घरेलू सहायकों के काम के हालात और उनसे जुड़े मुद्दे सुर्खियों में आ गए हैं। बसपा सांसद के घर हुई घटना कई मायनों में इसलिए भी ज्यादा गंभीर है कि यह घटना न केवल एक सांसद के घर में और देश की राजधानी में हुई, बल्कि इस सांसद का ताल्लुक दबे-कुचले वर्ग का प्रतिनिधि मानने वाली पार्टी से है, जिसने अब तक इस मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। 
असल में हाल की इन दोनों घटनाओं में कुछ ऐसी चौंकाने वाली समानताएं हैं जिनसे घरेलू श्रमिकों के खिलाफ होने वाली हिंसा के संदर्भ को समझने में मदद मिल सकती है- दोनों ही घटनाओं में उत्पीड़न छोटी-मोटी मारपीट नहीं, बल्कि गंभीर हमलों की शक्ल में हुआ जिसमें पीड़ितों के खिलाफ डंडे से लेकर विभिन्न प्रकार के धारदार उपकरणों का प्रयोग करके उन्हें गंभीर चोटें पहुंचाई गर्इं। दोनों ही प्रकरणों में उत्पीड़न कई महीनों तक चला और उत्पीड़न के बारे में आरोपी मालिक और पीड़ित श्रमिकों के अलावा और भी कई लोगों को जानकारी थी।
दरअसल, कोई भी हिंसा की घटना पीड़ित और अपराधी के बीच किसी न किसी प्रकार की शक्ति की असमानता को व्यक्त करती है। इन दो और इस प्रकार की अन्य तमाम घटनाएं मालिकों के हित में असीम राजनीतिक और आर्थिक असमानता को दिखाती हैं जिसके प्रभाव में वेनिर्भय होकर लंबे समय तक अपना बर्बरतापूर्ण बर्ताव जारी रखते हैं। एक तरह से यह दुस्साहसिकता लिंग पर आधारित हिंसा के विभिन्न रूपों- जैसे, यौन उत्पीड़न और घरेलू हिंसा- की भांति ही होती है। हिंसा करने वाले व्यक्ति को किसी प्रकार की सजा का भय नहीं होता। पीड़ित कितना कमजोर है, उसे इस बात का अच्छी तरह अनुमान होता है। इस तरह से देखें तो कहा जा सकता है कि हिंसा के ये रूप एक पति द्वारा अपनी पत्नी पर की जाने वाली घरेलू हिंसा से बहुत अलग नहीं हैं। घरेलू हिंसा में शामिल पति यह जानता है कि अपनी पत्नी के विरुद्ध हिंसा करके उसके रुतबे और सामाजिक स्वीकार्यता में कोई खास कमी नहीं आनी है। बल्कि कई मौकों पर राज्य और समाज का रवैया ऐसी हरकतों को परोक्ष रूप से समर्थन देने का होता है।
हालांकि बीते दिनों सामने आए इन मामलों में आरोपी और पीड़ित दोनों के महिला होने से ये घटनाएं ज्यादा हैरानी भरी लग रही हैं। शायद यही वजह है कि सतही तौर पर देखने पर इन घटनाओं की जड़ें लिंग आधारित हिंसा से जुड़ी हुई नहीं लग रही हैं, पर वास्तव में इन घटनाओं की खुलती हुई परतें यह इशारा करती हैं कि कैसे कुछ महिला मालिकों का रसूख और उससे पैदा हुआ गरूर उनके घरेलू श्रमिकों के कमजोर तबके और खासकर महिला होने पर हावी हो गया। हाल की इन घटनाओं में जो दरिंदगी भरा बर्ताव हुआ है, क्या हम आसानी से इसकी कल्पना एक वयस्क पुरुष के साथ कर सकते हैं? अगर नहीं, तो क्या हम इस प्रकार की हिंसा को लिंग आधारित हिंसा नहीं मानेंगे?
यह वही दिल्ली शहर है, जहां पिछले साल सोलह दिसंबर को एक महिला के संग हुई दरिंदगी के बाद विशाल जन-आंदोलन खड़ा हो गया था, जो महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई में मील का पत्थर सिद्ध हुआ। घरेलू श्रमिकों में स्त्रियां बहुतायत में हैं और हाल में श्रमिकों के साथ जो क्रूरता की गई है वह केवल उनके कमजोर तबके के होने से नहीं, बल्कि उनके महिला होने से भी जुड़ी हुई है। हिंसा की ये घटनाएं वर्गवाद के छद््म आवरण में मूलत: लिंग पर आधारित हिंसा के रूप हैं।
एक अन्य महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या हाल की इन घटनाओं के बाद हम घरेलू श्रमिकों के मालिकों को संभावित अपराधी के रूप में देख सकते हैं? ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हर चोरी और हत्या की वारदात के बाद दिल्ली पुलिस और मीडिया को घरेलू श्रमिक अपराधी दिखने लगते हैं? क्या दिल्ली पुलिस घरेलू श्रमिकों का उत्पीड़न रोकने के लिए भी उसी गर्मजोशी से काम कर सकती है जैसे वह उनके मालिकों को सुरक्षित रखने के लिए करती है?
पुलिस और सरकार का रवैया न केवल मध्यवर्ग की ओर झुका हुआ प्रतीत होता है, बल्कि यह झुकाव घरेलू श्रमिकों और उनके मालिकों के बीच के शक्ति असंतुलन को बनाए रखने का काम भी करता है। दिल्ली पुलिस की वेबसाइट पर ‘नागरिकों से अपील’ इस बात का साक्ष्य है कि पुलिस के लिए नागरिक सिर्फ ये मध्यवर्गीय परिवार हैं और घरेलू श्रमिक उनके लिए खतरा। दिल्ली विकास रिपोर्ट (2009) में भी इस बात का जिक्र है कि किस प्रकार केवल घरेलू श्रमिकों की पुलिस-जांच न
 
 
 
केवल सरकार और पुलिस के पक्षपाती नजरिए को उजागर करती है, बल्कि यह इस खोखली अवधारणा को भी मजबूत करती है कि मालिक अपने घरेलू श्रमिकों के विरुद्ध किसी प्रकार के अपराध में शामिल नहीं हो सकते। घरेलू श्रमिकों के काम की स्थितियों के बारे में सरकार कितनी उदासीन है, यह इस बात से पता चलता है कि इस संदर्भ में उसके पास कोई आंकड़े नहीं हैं। आंकड़ों के अभाव में, ऐसी घटनाओं को इक्का-दुक्का घटना के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जैसा कि हाल में भी हुआ, न कि एक कड़वी हकीकत के अंश के रूप में, जिसे बदलने के लिए सरकार के पास मजबूत कानून होना चाहिए।
घरेलू श्रमिकों और उनके मालिकों के बीच का रिश्ता जाति और वर्ग की असमानता पर आधारित होने के साथ-साथ राज्य के उदासीन रवैए का भी परिणाम है, जो घरेलू श्रमिकों को ऐसे समूह के रूप में नहीं देखता जिसे संरक्षण की जरूरत है। नतीजतन कानून के सामने घरेलू श्रमिक एकदम असहाय नजर आते हैं। घरेलू श्रमिकों के अधिकारों के लिए कानून बनाने में भारत सरकार की आनाकानी जगजाहिर है: भारतीय संसद में आजादी के समय से ही घरेलू श्रम के नियमन के लिए कितने ही विधेयक रखे गए, जो कभी कानून नहीं बन पाए। हाल ही में संपन्न अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का सम्मेलन घरेलू श्रमिकों पर ढुलमुल रवैये का एक ताजा उदाहरण भर है।
कानून से हम किस प्रकार की उम्मीदें कर सकते हैं? क्या कानून वास्तव में घरेलू श्रमिकों की रोजमर्रा की जिंदगी को बदल सकता है? शायद नहीं। कानून से सीधे किसी भी प्रकार की उम्मीद करना अति उत्साह होगा। इतना जरूर है कि कानून श्रमिकों के लिए अधिकार की एक भाषा का सृजन कर सकता है, जो अपने आप में एक हथियार होगा। इस प्रकार की भाषा न केवल शोषण के अनुभवों को कड़वा सच मान कर चुपचाप सहने की प्रथा को तोड़ सकती है, बल्कि मालिकों को भी यह बताएगी कि घरेलू श्रमिकों और उनके संबंध की क्या हदें हैं।
हाल में हुई ये दो घटनाएं इस बात की ओर भी इशारा करती हैं कि किस प्रकार कुछ मालिक उन हदों को भूल जाते हैं। हाल की इन घटनाओं ने मुझे अपनी एक घरेलू श्रमिक से हुई उस बातचीत की याद दिला दिया जिसमें उसने खुद के प्रति अपनी एक महिला मालिक के व्यवहार को कुछ इस प्रकार बताया था:
‘उसको हर काम टिच चाहिए था। वो बड़ा अकड़ती थी, इंसान को एक जैसे गुस्सा सा नहीं आता, एक जुनून! वो ऐसे बड़े धौंस वाली थी... जैसे कोई काम अगर ठीक से नहीं हुआ तो बाजू पकड़ के कस कर हिला देना। मुझे बहुत बुरा लगता था। मैं सोचती थी कि इसके यहां कौन काम करेगा... उसे सब बढ़िया चाहिए था, अगर कहीं थोड़ी-सी भी मिट््टी रह जाती थी, जैसे लकड़ी की अलमारी के कोनों में पूरे दिन आंधी चलेगी तो चाहे कितना भी कर लो दिन में दो बार तो डस्टिंग तो होनी ही है। तो अगर कभी मिट््टी दिखती थी तो मिट्टी लगा देना मेरे मुंह पर। वो इंसान नहीं समझती थी  काम वालों को, वो समझती थी ये जानवर हैं।’
दिल्ली शहर में हाल में घरेलू श्रमिकों के खिलाफ हुई हिंसा और अमानवीय व्यवहार की घटनाएं भले ही देखने में एक दूसरे से अलग लगें, पर वास्तव में वे तेजी से आगे बढ़ रहे समाज के आर्थिक, सामजिक और राजनीतिक ताने-बाने में कुछ इस प्रकार गुंथी हुई हैं कि वे अपवाद से ज्यादा नियम लगती हैं। इन दोनों स्थितियों को महज अमानवीय और शर्मनाक कह देने भर से हम इन घटनाओं के संदर्भ का लेशमात्र भी नहीं समझ सकते खासकर जब हमारा समाज एक ऐसे दौर में है जहां आए दिन अमानवीयता का एक नया रूप देखने को मिलता है।
अगर आप घरेलू श्रम के मुद््दे पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं से पूछें तो वे आपको बताएंगे कि हाल के दिनों में जो वारदातें हुई हैं वे कतई अपवाद नहीं हैं। अगर कुछ अपवाद है तो यह कि घरेलू श्रमिकों की दुर्दशा को मुख्यधारा मीडिया में कवरेज मिली है जिसने इन घटनाओं को शायद पहली बार इस तरह से पेश किया है कि घरेलू श्रमिकों की पीड़ा को कुछ हद तक एक आवाज मिली है।
हो सकता है कुछ दिनों में घरेलू श्रमिकों के खिलाफ होने वाली हिंसा सुर्खियों में न रहे, पर उसका मतलब यह नहीं होगा कि इस देश में घरेलू श्रमिकों के खिलाफ हिंसा नहीं हो रही होगी। सरकार, पुलिस और अभिजात वर्ग जब तक घरेलू श्रमिकों के प्रति अपने नजरिए को नहीं बदलते और उनको अपने ही समाज के एक समान हिस्से के रूप में नहीं देखते, तब तक इस देश में वसंत कुंज और साउथ एवेन्यू अपने आपको बार दोहराते रहेंगे।जनसत्ता
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