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मुलताई के किसानों का आंदोलन
किसान संघर्ष समिति द्वारा हर साल 12 जनवरी को मुलताई में शहीद किसान स्मृति सम्मेलन का आयोजन किया जाता है. इस साल 16वीं बरसी पर मुलताई गोली कांड में शहीद किसानों के परिवार एवं प्रभावित किसानों को न्याय दिलाने के लिए देश भर के जन आंदोलनों के साथी, शिक्षाविद, अधिवक्ता, सामाजिक कार्यकर्ता और आस-पास के गांवों से हजारों किसान मुलताई पहुचें। मुलताई से जबर सिंह वर्मा कि रिपोर्ट;
मुलताई घोषणा-पत्र 2014 जारी !! 
भारत में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या की घटनाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 1995 से 2012 के दौरान 3 लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की । मध्यप्रदेश में लगभग 28 हजार किसानों ने आत्महत्याएं की और आत्महत्या करने वाले प्रति पांच किसानों में एक महिला किसान होने का रिकार्ड मध्यप्रदेश के खाते में दर्ज है, जो देश में सर्वाधिक है। भारत में किसानी के संकट के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं...
बीते 68 सालों में हुए आन्दोलनों में मीडिया अन्ना आन्दोलन को सबसे व्यापक-जन भागीदारी का अन्दोलन मानता है। यह बात सही है कि इस बीच किसी दूसरे जन आन्दोलन में स्व प्रेरणा से प्रेरित होकर करोड़ों लोग सड़कों पर नहीं उतरे, लेकिन यह भी सच है कि स्थानीय स्तर पर देश में हजारों ऐसे आन्दोलन हो चुके हैं, जिनमें आमजन ने अधिकतम भागीदारी कर ठोस नतीजे निकाले। मध्य प्रदेश के दुरस्त और बेहद पिछड़े आदिवासी बाहुल क्षेत्र मुलताई का किसान आंदोलन इसकी मिशाल है। इस आंदोलन की शुरूआत ही सुखे की मार झेल रहे आम गरीब किसानों की ओर से मुआवजे की मांग को लेकर हुई थी। मुद्दे और संसाधन सब कुछ किसानों का अपना था।
बात इतने में ही खत्म नहीं होती। आंदोलन स्व प्रेरणा से मुलताई तहसील और बैतूल जिले के गांव-गांव और घर-घर पहुंचा। गांव के बुजुर्ग, बच्चे, महिलाएं सब आंदोलन में कूदे। इस आंदोलन के नेता डा. सुनीलम के नेतृत्व में परमंडल गांव में 25 दिसंबर 1997 को पांच हजार लोग जमा होते हैं। किसान संघर्ष समिति बनती है और 25 दिसंबर 1997 को ही 75 हजार किसान मुलताई से पैदल, बैलगाड़ी, ट्रेक्टरों में सवार होकर 50 किलोमीटर दूर स्थित बैतूल जिला मुख्यालय पहुंचते हैं। किसानों द्वारा खड़ा किया गया यह शांतिपूर्ण आंदोलन स्वयं में अद्भूत-अनोखा था। इस क्षेत्र में ऐसी मिशाल न किसी नेता, जनसंगठन ने पहले पेश की, न ही भविष्य कर पाने कोई उम्मीद है। इसकी वजह है। दिल्ली-भोपाल में मीडिया में हाय-तौबा मचाकर और आधुनिक संसाधनों के उपयोग से लोगों का जमा होना अथवा जमावड़ा एकत्र करना अलग मसला है। मगर, आधुनिकता, टीवी-अखबारी दुनिया से दूर के दुरस्त-दुर्गम क्षे़त्रों में बिखरे दलित-मजदूर-छोटे किसानों में अलख जगना अथवा जगानाएक अलग किस्म की चुनौती थी। जिसे मुलताई ने पार किया।
हालांकि, सूखे की मार झेल रहे गरीब किसानों के इस आंदोलन को भी मध्य प्रदेश सरकार ने दमन से कूचला। 12 जनवरी 1997 को मुलताई गोलीकांड इसका उदाहरण है। आंदोलन के अगुआ किसान नेता डा. सुनीलम की हत्या की नीयत से हुई पुलिसिया गोलीबारी में 24 निर्दोष किसानों को आपनी जानें गवांनी पड़ी थी। 
 
मुलताई के इस आंदोलन की तुलना अन्ना आंदोलन से की जाए तो स्पष्ट समझ में आएगा कि यह आंदोलन हर दृष्टि से स्तह पूर्णतः स्वस्पूर्त और जनभागीदारी से था। पांच हजार लोगों ने किसान संघर्ष समिति बनाकर खुद के मुद्दे तय किए और अपने संसाधनों से इनको अमलीजामा पहनाने को काम किया। हर गांव का किसान और हर पार्टी का नेता दलगत राजनीति से उपर उठकर एकजुटता से आंदोलन के साथ था। जबकि, अन्ना आंदोलन का सभी पार्टियों के साथ ही देश के कई जन समूह मुखर विरोध कर रहे थे।
 
आम आदमी पार्टी ने देश-दुनिया से आर्थिक सहयोग लेकर दिल्ली में चुनाव लड़ा। इनके जन उम्मीदवारी के प्रयासों को भी मीडिया ने इसे खूब हवा दी। मगर, मुलताई के किसान 15 साल पहले जन उम्मीदवार का चयन कर चुनाव लड़वा चुके हैं। जनता ने बीजेपी-कांग्रेस के खिलाफ अपना उम्मीदवार की खड़ा नहीं किया, बल्कि खुद के संसाधन भी लगाए और अपने प्रत्याशी को 50 से 60 प्रतिशत मतों से विजयी बनाया। मुलताई से दो बार विधायक बने डा. सुनीलम इसका उदाहरण हैं। मुलताई के किसानों ने आंदोलन से लेकर चुनाव लड़वाने तक को घर-घर से अनाज-पैसा एकत्र किया और श्रमदान किया। यहां न देश का कोई बड़ा नेता किसानों के समर्थन में आया, न किसी ने बाहर से आकर पैसा लूटाया। गरीब किसानों द्वारा जनआंदोलन और मत के जरिए सत्ता-धन और बहुबल को दी गई यह बड़ी चुनौती थी। यह बात अलग है कि दिल्ली या भोपाल की चकाचौंद में खोई मीडिया इस तरह के आंदोलन की तरफ ध्यान नहीं देती या फिर बिसरा देती है।
 
आज दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के साथ खड़ा मीडिया तब सत्ता के प्रभाव में ही सही, मगर मुलताई आंदोलन के खिलाफ खड़ा था। पुरी चुनाव रिर्पोटिंग में जन उम्मीदवार के जीतने की संभावना तो दूर, जमानत जब्त होने की खबरें दिखाना तक किसी ने गवांरा नहीं समझा। यह स्थिति तब थी जब जन उम्मीदवार 50 से 60 फीसदी मतों से जीतकर आए। यह उपेक्षा हमारे चौथे स्तंभ के मन में शहर-गांव के बीच उपजे भेद को दर्शाता है। शहरों की छोटी से छोटी खबरों को संजीदगी से सुर्खियां बनाने वाला हमारा मीडिया गांव-देहात के बड़े-बड़े जनआंदोलनों-मुद्दों की कैसे उपेक्षा कर देता है, मुलताई किसान आंदोलन इसकी बानगी है।
 
दिल्ली में 27 फीसदी वोट लाने वाली आम आदमी पार्टी को मीडिया ने किस कदर सिर माथे बैठाया, यह सबने देखा। इसलिए मुलताई के किसान आज भी फक्र से कहने में गुरेज नहीं करते कि दिल्ली में आज जो प्रयोग हुआ, उसे वह पहले ही कर चुके हैं। यह बात अलग है कि किसानों में जागरूकता का अभाव, रोजमर्रा की उठापटक वाली जिंदगी से निकलकर संसाधन जुटाने की सीमिति समय सीमा, किसी संगठन की राष्ट्रीय उपस्थिति और मीडिया के ब्लैक आउट के कारण राष्ट्रीय स्तर पर तो क्या, प्रदेश स्तर पर भी मुलताई किसान आंदोलन की वह ताकत दिखलाई नहीं पड़ी, जो अन्ना आंदोलन की देशभर में दिखी। मगर, बड़ी ताकत रखने वाले गांव के किसानों को किसी व्यक्ति-दल के पीछे लगने की बजाय खुद संगठित होना होगा। डा. सुनीलम जैसे नेता पैदा करने होंगे।
 
आज देश के किसानों के आगे लूट पर आधारित वर्तमान व्यवस्था को बदलने की चुनौती है। देश के जनसंगठन, किसान संगठनों के साथ ही आम ग्रामीण किसानों को इस चुनौती से निपटने को एकजुट होना होगा। मुलताई के किसानों का यह प्रयास जारी है। किसान संघर्ष समिति 15 सालों से शहीद किसानों को याद करने के साथ ही किसान पंचायतें करती आ रही हैं। हर साल देशभर के किसान नेता यहां जुटते हैं और किसान घोषणा पत्र तैयार होता है।
 
 
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