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एक फ्रांसीसी शहर में कुछ दिन

अंबरीश कुमार 

समुद्र तट के रेस्तरां ' ले कैफे  ' की लाइट जल चुकी थी और पीली रौशनी में उसका बरामदा चमचमा रहा था ।पार्क गेस्ट हाउस की बालकनी में बैठे बैठे उब जाने की वजह  से कुछ कदम दूर ले कैफे तक आ गया था । जाने की इच्छा रोमा रोला स्ट्रीट पर एक सज्जन से मिलने की थी पर हिम्मत नहीं हुई । रोमा रोला स्ट्रीट का नाम सुनकर ही कभी फ्रांसीसी उपनिवेश  रहे इस जगह के बारे में नजरिया बदल जाता है । खैर बाकी सब खाना खाने के लिए शहर के बीच गए हुए थे और मै रुक गया था क्योकि पैदल चलने की हिम्मत नहीं हो रही थी । इसी वजह से बाहर  निकलने से बच रहा था । इससे पहले देर तक बालकनी में बैठा रहा और बुखार में समुद्र की ठंडी हवा बर्दाश्त करता रहा । जब ठंड ज्यादा लगी तो शाल लेकर आराम कुर्सी पर बैठ गया । पांडिचेरी जो अब पुद्दुचेरी कहलाता है उसका मशहूर पार्क गेस्ट हाउस है ।अरविंदो आश्रम के सभी अतिथि गृह में यह ज्यादा भरा रहता है सिर्फ समुद्र के किनारे होने की वजह से । पर यह आश्रम ही है कोई होटल नहीं ।हर कमरे में माँ मीरा की बड़ी फोटो लगी रहती है । यहाँ से समुद्र का नजारा भी अद्भुत नजर आता है ।मै दूसरी मंजिल के उनतीस नंबर कमरे में रुका हुआ हूँ और बच्चे पहली मंजिल के कमरा नंबर ४४ में । अपना कमरा काफी बड़ा और आरामदेह है जबकि नीचे के कमरे छोटे है और वहां से समुद्र का वह दृश्य नहीं दिखता जो यहां से नजर आता है । चेन्नई से कल शाम यानी दो जनवरी को इस गेस्ट हाउस में पहुंचे थे ।पहले ट्रेन फिर बहुत दिनों बाद बस से सफ़र करते हुए ।सभी साथ थे ।पर चेन्नई से ही तबियत ढीली थी । मैरीना बीच और महाबलीपुरम के समुद्र तट पर भी ठंड ही महसूस हुई तो दवा लेनी पड़ी ।यह सब सुबह सुबह हलके कपडे में समुद्र तट पर कई घंटे गुजरने की वजह से हुआ । चेन्नई में इतनी ठंड सुबह हो जाएगी यह अंदाजा नहीं था ।हालाँकि गोपालपुरम के लायड गेस्ट हाउस में ऎसी लगातार चलता रहा क्योकि इस तरह के कमरे में कोई खिड़की नहीं होती है ।खैर ज्यादा हैरानी पुद्दुचेरी में रजाई गद्दा बिकता देख कर हुई । हर कोई गर्म कपडे पहने नजर आया साथ ही टोपी भी । दक्षिण में इतनी ठंड पहली बार लोगों ने महसूस की ।हर साल की तरह इस बार भी नए साल पर बाहर था और समुद्र तट पर आराम करने के लिए आया था क्योकि पिछले छह महीने से व्यस्तता काफी बढ़ गई थी और लगातार दौरे हो रहे थे ।लिखना भी कम हो गया था ।इसलिए हफ्ता भर समुद्र तट पर रहना चाहता था । पर बुखार ने अपना कार्यक्रम काफी हद तक चौपट कर दिया । इस बार पांडिचेरी में  चेट्टीनाड व्यंजनों का स्वाद लेना चाहता था और इसके लिए एक मित्र ने व्यवस्था भी कर दी थी । फ्रांसीसी वाइन के साथ डिनर का न्योता भी था । पर  यह संभव नहीं हो पाया । सबके जाने के बाद 
एक कप काफी के साथ मै बालकनी में बैठ गया और समुद्र की तेज होती लहरों को देखने लगा ।सामने नारियल के पेड़ों की कतार लहराती नजर आ रही थी ।एक छोटा बच्चा समुद्र के किनारे काले पत्थरों पर अपनी माँ के साथ उछल कूद करने में व्यस्त था ।दाहिने तरफ की बीच रोड पर सैलानियों कि संख्या बढती जा रही थी । फिर बैठे बैठे उब जाने पर बाहर निकल आया ।इस फ्रेंच रेस्तरां के आसपास चौपाटी जैसा नजारा था और ठेले से तली हुई मछली की गंध चारो ओर फैली हुई थी ।तटीय शहरों में समुद्र तट पर सभी जगह यह नजारा दिखता है ।साथ ही मदिरा की दुकाने भी ।चेन्नई में तो इस तादात में मदिरा की दुकाने नहीं दिखती पर पुद्दुचेरी में हर चार कदम पर मधुशाला नजर आ जाती है और मदिरा की सेल भी लगी नजर आई । विदेशी ब्रांड की कीमत यहाँ काफी कम है क्योंकि टैक्स में काफी छुट है ।उसका असर समुद्र तट भी दिख जाता है पर कोई हुल्लड़ मचाता नजर नहीं आएगा ।खाने पीने के मामले में फ्रांसीसी संस्कृति का असर पुद्दुचेरी में साफ झलकता है ।कई बार तो लगता है कि फ़्रांस के ही किसी शहर में घूम रहे हो ।वास्तुशिल्प से लेकर बाजार की दुकानों और रेस्तरां होटल के नाम भी फ्रांसीसी है ।ठीक उसी तरह जैसे गोवा पर पुर्तगाल का असर नजर आता है । पर यह शहर कुछ अलग जरुर है जहां भारी भरकम लक्जरी गाड़ियों की जगह साइकिल ज्यादा नजर आती है । शाम को तो बीच रोड पर वाहनों की आवाजाही पुरी तरह बंद कर दी जाती है इसलिए सैलानी बेफिक्र होकर सड़क पर कई किलोमीटर तक घूम लेते है । बहुत से सैलानी समुद्र तट के किनारे पड़े पत्थरों पर बैठे नजर आते है ।नए साल का यह दूसरा दिन है इसलिए नवविवाहित जोड़ों कि संख्या भी ज्यादा है जिसमे उत्तर भारत वाले भी शामिल है ।पुद्दुचेरी अन्य तटीय शहरों के मुकाबले काफी साफ़ सुथरा और किफायती शहर है ।यहाँ पर खाना और रहना दोनों ही सस्ता है ।अगर अरविंदो आश्रम के सबसे आलीशान पार्क गेस्ट हाउस में रुके तो छह सौ में सबसे बड़ा सूट जैसी जगह मिल जाती है जिसमे तीन चार लोग आ सकते है ।एक व्यक्ति का एक दिन का खाना नाश्ता आदि भी आश्रम के केंद्रीय भोजनालय में पचास रुपए में हो जाता है । पर यह सब आश्रम जैसा ही है ।कोई रूम सर्विस नहीं  है । खाने के लिए भी रेस्तरां में ही जाना पड़ेगा । मै यात्रा में चाय काफी के लिए बिजली की छोटी केतली और उसका सामान साथ लेकर साथ चलता हूँ इसलिए सुबह चार बजे उठने पर कोई दिक्कत नहीं होती ।वर्ना सुबह पार्क गेस्ट हाउस के रेस्तरां खुलने का समय ही सात बजे है । आश्रम का शायद यही अकेला रेस्तरां है जहाँ अंडा मिल जाता है वर्ना बाकी जगह शुद्ध शाकाहारी नाश्ता और खाना । सुबह सैलानी नाश्ता करने के बाद समुद्र तट पर पहुँच जाते है और देर तक बैठे रहते है ।
दस ग्यारह बजे ज्यादातर सैलानी कमरे पर लौटते मिले । ब्रिटेन से आई एक युवती सामने के पार्क में बगीचे की फोटो खींचती नजर आई ।यह पार्क छोटा है पर बहुत खुबसूरत ।इसी वजह से इसका नाम पार्क गेस्ट हाउस पड़ा है ।इस आश्रम में ध्यान के लिए अलग हाल है और हर कमरे में योग करने के लिए एक चटाई दी जाती है । कुछ लोग इस चटाई को लेकर समुद्र तट से लगे पार्क में बैठ कर योग करते है । इसके अलावा काटेज गेस्ट हाउस और न्यू गेस्ट हाउस आश्रम के अधीन है ।राजभवन के पास ही इनका किचन है जहां बहुत सादा सा नाश्ता दूध दलिया ब्रेड आदि मिलता है तो खाना भी इसी तरह का ।पर अगर मन न भरे तो सामने ही बहुत अच्छे दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय  रेस्तरां है तो समुद्री व्यंजनों के लिए चेट्टीनाड के मशहूर रेस्तरां भी है ।इनमे लोबस्टर ,प्रान से लेकर पंफलेट तक मिलती है । 
रेस्तरां में  भीड़ बढ़ने के बाद बैठने की इच्छा नही हुई तो कमरे पर लौट आया । सुबह सूर्योदय का दृश्य देखना चाहता था इसलिए भी थकान से बचने की इच्छा थी । वैसे भी रात चार बजे के आसपास समुद्र की तेज आवाज से नींद खुल गई थी पर घने बादल देख कर बालकनी से लौट आया था क्योकि सूर्योदय  
दिखना मुश्किल था । पर दूसरे दिन सुबह बादल कम होने की वजह से उम्मीद बंधी । सामने देखा तो बहुत से सैलानी भी सूर्योदय का दृश्य देखने के लिए पत्थरों पर बैठ गए थे । समुद्र तट पर सूर्योदय का दृश्य सम्मोहित कर देता है । सूरज के समुद्र से निकलने से पहले इतने रंग बदलते है कि कोई उठ कर जा नहीं सकता । कन्याकुमारी में मैंने अस्सी के दशक में देखा था जब सुबह पांच बजे सैलानी तैयार होकर विवेकानंद आश्रम की बस से समुद्र तट पर पहुँचते थे । सिर्फ तीन समुद्र के बीच से निकलते सूरज को देखने के लिए । पिछले तीन दिन से मै भी सुबह सुबह इस दृश्य को देखने के लिए कैमरा लेकर समुद्र तट पर  जम  जाता था और उसी वजह से सुबह की ठंड से तबियत बिगड़ी । पर फिर भी सूर्योदय देखने की इच्छा नहीं भरी । इस जगह की खासियत यह थी कि कही बाहर नहीं जाना था कमरे में लेटे लेटे भी यह नजारा देखा जा सकता था और बालकनी पर बैठ कर भी ।   बालकनी में बैठे तो नारियल के पेड़ों के बीच से अचानक समुद्र से एक नारगी गोला निकलने लगा तो समुद्र के पानी का रंग भी बदल गया । 
 
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  • सम्मोहक शरण का अरण्य
  • पत्थरों से उगती घास
  • नैनपुर अब कोई ट्रेन नहीं आएगी
  • शंखुमुखम समुद्र तट के किनारे
  • बदलती धरती बदलता समुद्र
  • सपरार बांध के डाक बंगले तक
  • संजय गांधी ,तीतर और बाबू भाई
  • गांव ,किसान और जंगल
  • छोड़ा मद्रास था, लौटा चेन्नई
  • बरसात के बाद पहाड़ पर
  • कोंकण की बरसात में
  • महेशखान के घने जंगल में
  • मार्क्स के घर में
  • समुद्र तट पर कुछ दिन
  • जंगल के रास्ते हिमालय तक
  • शिलांग के राजभवन में
  • नार्टन होटल में कुछ दिन
  • शहर से दूर साल्ट लेक में
  • झेलम के हाउसबोट पर
  • कोच्चि के बंदरगाह पर
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