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डगर कठिन है इस बार भाजपा की गुजरात में एक नेता का उदय तिकड़ी से घिरे तो बदल गई भाषा ! यहां अवैध शराब ही आजीविका है
बनारस त बनारसे रहेगा

धनंजय सिंह 

इस शहर का सामान्य घोष है हर हर महादेव, कोई भी देसी विदेशी मेहमान आये लोग स्वागत में हर हर महादेव का नारा जरुर लगाते हैं
जी हाँ पान बनारस की पहचान है, सड़क चलते आपको सावधान रहना पड़ता है की कब कौन किधर से पच्च से पान थूक दे और आप भी लाल हो जाएँ। हालाँकि शहर के लोगों को इसकी आदत पड़ चुकी है और वो किसी की बॉडी लैंग्वेज से ही अंदाजा लगा लेते हैं की अगला थूकने वाला है और उसके बर्थ राइट का ख्याल रखते हुए खुद सावधान हो जाते हैं। पिछले चुनाव के वक्त बेनियाबाग में भाजपा की रैली थी तो भाजपा नेता राजनाथ सिंह ने पान की महिमा पर भी बोला और कहा था की अटल जी जब भी इधर आते थे तो पान की फरमाईश जरुर करते थे। जब मुरली मनोहर जोशी की बारी आई तब उन्होंने कहा था की पान तो राजनाथ सिंह को भी पसंद है लेकिन ये पान खाकर सरकार चलाते रहे पर अगर भांग खा कर सरकार चलाये होते तो हालत कुछ और होती। अब मंच से ऐसे भाषण को भी बनारस वालों ने हवा में उड़ा दिया लेकिन जोशी जी के संकेतों को पकड़ने की कोशिश जरुर की। कुछ लोगों का मानना है की अच्छी सरकार चलाने के लिए भांग खाना बहुत जरुरी है क्योंकि भांग सीधे दिमाग पर असर करती है और आदमी बस एक ही राग, जो होश में रहते हुए पकड़ लेता है, उसी पर चलता जाता फिर भाड़ में जाए दुनिया।
 
अब तमाम आधुनिक औषधियां भी शहर में उपलब्ध हैं लेकिन भांग अपनी जगह कायम है और यहाँ कहा भी जाता है की ‘गंग भंग दुई बहिन हैं, रहत सदा शिव संग/पाप निवारण गंग है, होश निवारण भंग’। जहाँ तक गंग की बात है तो कुछ दिनों पहले धोबी समाज से कहा गया था की वो गंगा में कपड़े धोना बंद करे क्योंकि नदी प्रदूषित होती और जल की पवित्रता पर असर होता है। उस समय ये भी बात उठी थी धोबी समाज के लिए शहर में कहीं इंतजाम किये जाएगा ताकि उनकी रोजी रोटी चलती रहे। अख़बारों में भी इस बात को प्रमुखता से छापा गया क्योंकि पहल एक धार्मिक गद्दी से की गई थी जिसमें शंकराचार्य वगैरह भी शामिल रहे लेकिन अब उस पहल का क्या हुआ उस बारे में कोई कुछ नहीं बोलता। शहर के नाले गंगा में अनवरत जा ही रहे हैं और गंगा सफाई योजना के नाम पर करोड़ों रूपये न मालूम कितनी जेबों में एडजेस्ट हो गए फिर भी रह रह कर गंगा को साफ़ करने का हल्ला मचता रहता है। हलकी बारिश भी हो जाए तो शहर के कई इलाकों में जल और मल एक साथ सड़क के रास्ते चल देते हैं और शहर पवित्तर होने लगता है और जनता बम भोले बोलकर वैतरणी पार करती रहती है जो अब उसकी नियति बन चुकी है। सड़कों का आलम ये कहिये की बनती तो हैं ये लेकिन ध्यान रखा जाता है की साड़ों के खुरों को कोई तकलीफ न हो इसलिए धूल और मिट्टी हमेशा दिखती रहती है। शहर मस्त है इसलिए किसी को कोई जल्दी नहीं होती और अगर जल्दी में हैं तब पैदल भागने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता क्योंकि यदि आप चौड़ी गाड़ी से चलें तो एक भारी आदमी होने का दिमाग में एहसास लेकर चल सकते हैं लेकिन ट्रैफिक का जो आलम है की जल्दी तो नहीं ही पहुँच सकते हैं। वैसे इस शहर में भारी-हलके का कोई मतलब भी नहीं है क्योंकि यहाँ का सामान्य संबोधन भी है राजा, एक दूसरे से मिलने पर लोग पूछते रहे हैं -’का रजा का हाल हौ’ यानि भोले की नगरी में हर कोई राजा है। ये अलग बात है की बदलते ज़माने के साथ अब तमाम लोग सामने वाले को राजा कहने में हिचकने लगे हैं क्योंकि लगता है की बस वही राजा हैं, हालाँकि ऐसे अभी कम लोग ही हैं।
 
इस शहर का सामान्य घोष है हर हर महादेव, कोई भी देसी विदेशी मेहमान आये लोग स्वागत में हर हर महादेव का नारा जरुर लगाते हैं, इसका मतलब वही लोग समझ सकते हैं जो बनारस को जीना जानते हैं या बनारस में जीते हैं। इस नारे में हिन्दू-मुसलमान का कोई भेद नहीं होता, हाँ कुछ जो खांटी बनारसी हैं वो किसी को हर हर महादेव कहने के बाद उसका नाम जोड़ कर ‘भोंसड़ी के’ भी जरुर कहते हैं क्योंकि उसके बिना सम्मान अधूरा है। अब इस अभिवादन को भी समझने के लिए भाग डीके बोस सुनने की जरुरत नहीं है, इस शहर को महसूस करने की जरुरत है, यहाँ लोग इसका बुरा नहीं मानते। जो बनारस के हैं उन लोगों को अभी भी उन लोगों की याद होगी जो बिना बात प्रेम से गालियाँ दिया करते थे और कोई बुरा नहीं मानता था, कई बार ऐसे लोगों को जान बूझ कर छेड़ा जाता था ताकि गलियों का यानि साबर मन्त्र का कोई नया वर्जन निकले। बीएचयू में दूसरे शहरों से आये पुराने छात्रों को कचौड़ी-जलेबी वाली चाची की याद जरुर होगी जो बिना बात मीठी-मीठी गालियाँ दिया करती थी। मरते दम तक उनकी गालियाँ निकलती रहती थीं और साथ में खस्ता कचौड़ी और करारी जलेबी। खैर शहर में कचौड़ी-जलेबी का जलवा अभी भी कायम है और दुनिया भर की गाईड बुक इसे वर्ल्ड फेमस बनारसी नाश्ता ऐसे ही नहीं बतातीं, लम्बी दौड़ लगा कर और जिम में पसीना बहा कर नई जनरेशन भी टूटती है इन दुकानों पर क्योंकि ये भी बनारसीपन की एक निशानी है। हालाँकि अब शाम के नाश्ते के नाम गोलगप्पे और चाट वाले बने हुए हैं अपनी जगह लेकिन जगह-जगह अंडा रोल कार्नर और गरम मसाला वाला चौमिंग बेचने वाले भी जमने लगे हैं, पता नहीं चीन में स्ट्रीट फ़ूड के रूप में चाउमीन कितना लोकप्रिय है लेकिन बनारस में तो चौमिंग की जगह दिख रही है, शहर सब कुछ एडजेस्ट कर लेता है।
 
हाँ दारु की दुकानें बढ़ीं हैं और लोग सरकार को पीकर दे रहे हैं इसमें खालिस अंग्रेजी वाले और देसी पीकर अंग्रेजी झाड़ने वाले, दोनों का बड़ा योगदान है। अपने लीवर-किडनी के बूते सरकार के राजस्व में इजाफ़ा करने वाले पूरे देश में बढ़ रहे हैं तो बनारस क्यों पीछे रहता, लेकिन इसका मतलब नहीं की बूटी की खपत कम हुई, बनारस के बने रहने तक बूटी भी बनी रहेगी। बस फरक ये है की बूटी सेवन के बाद आदमी साइलेंट मोड में चला जाता है इसलिए वर्तमान हालत को देखते हुए लोग वोकल होने के लिए दारु पी रहे हैं और भीतर के योद्धा को जगाये रखने के लिए भी। सुबह टहल रहा था की एक अधेड़ टाईप के सज्जन बड़े ही ऊँचे सुर में तान दे रहे थे — हो गई सुबह, मैं चला शराबखाने/जिसे देखनी हो जन्नत, वो मेरे पीछे -पीछे आये। मैंने सोचा की अपनी मस्ती में ऐसे ही गा रहे होंगे, लेकिन देखा की जहाँ देसी ठेका का बोर्ड लगा था वहाँ दरवाजा खटखटाने लगे, अपन ने आवाज दी की चचा अभी खुला नहीं है। उस बंदे ने पलट कर कहा की – तोसे कौन पूछ रहा है, हमरा रोज ऐसे ही खुलता है। बड़े रोचक लगे सज्जन, मैं उनके करीब चला गया। तब तक दरवाज़ा हिला और एक पव्वा इनके हाथ में। कुर्ते की जेब के हवाले करते हुए बगल की चाय की दुकान पर बैठ गए, पैसे का लेनदेन होते दिखा नहीं। चाय वाले ने जयकारी की – आवो हो जड़ी मियाँ, तू सुधरोगे नहीं, डेली का उधारी मारना बंद करो। मतलब मियाँ हैं और नाम जड़ी है, अब होगा असली नाम कुछ और लेकिन मुझे तो यही नाम अच्छा लगा। तब तक एक सज्जन और आये और ‘महादेव जड़ी मियाँ’ बोल बगल में बैठ गए। चाय वाले ने दो कुल्हड़ पकड़ाए औए जेब की बोतल में से छोटे कुल्हड़ों में पेय ढालने का अनुष्ठान पहली बार देखा, पानी प्लास्टिक के मग में बगल में रखा था। मैंने पूछा की सबेरे सबेरे वो भी बिना पानी? बाद में आये सज्जन ने कहा – आप चाह पियो साहब, दूसरे का काहे देख रहे हो? जड़ी मियाँ ने टोकते हुए कहा की – बोलने देवो भाई, दस मिनट से साथे हैं। त भाई आपको क्या दिक्कत है? पता है अब इसमें भी मिलावट आता है, कोई माल पेवर नहीं रह गया। और सबेरे न त का दिन भर पीते रहें ? संझा के टाईम नाती-पोता के साथ घर में रहना पड़े है और मज्जिद भी जाते हैं इस वास्ते हमरा सबेरे का ही नियम है।
 
मैं सोचने लगा की वाह रे अपने अपने नियम, वैसे काशी में दिन के हिसाब से मंदिर निर्धारित हैं कुछ लोग अभी उस हिसाब से नियम से अलग अलग मंदिरों में पूजा करते हैं, यहाँ नियम से अपने अनुष्ठान -उपासना करने वाले को नेमी कहते हैं, जड़ी मियाँ तो अलग ढंग के नेमी लगे। खैर, देखा की जड़ी मियाँ ने दोनों कुल्हड़ भरे और बोले – ‘ए सरदार , रजा तनी लड़ावा’ फिर दोनों कुल्हड़ आपस में हलके से मिले, कांच के गिलास वाले जैसे जाम टकराते हैं तो चियर्स बोलते हैं उसी तरह कुल्हड़ आपस में लड़ाने का ये बनारसी अंदाज बिहाने -बिहाने वर्णनातीत लगा। ऐसे भी लोग अभी बचे हुए हैं, अपन को तो सोच कर नशा छाने लगा। सरदार यहाँ उन लोगों को कहते हैं जो भैंस -गाय पालने और दूध के धंधे में लगे हैं, यानि यादव जी लोग। सरदार ने ही मेरे मन की बात शुरू की – यार एक बात समझ नहीं आवा, मोलायम सिंग काहें दूसरा जिला से कवनो चौरसिया को लाकर यहाँ लड़ा रहे हैं ? कवनो बिरादर, चाहे बनारस का नहीं मिला ? गणित नहीं समझ में आय रही है ?
 
जड़ी मियाँ — अरे ई तोरे नेतवा का चाल है जवने से की भजप्पा का कैंडिडेट निकल जाए, शहर वाले इतने चूतिया नहीं हैं जो ई चाल न समझें। बताओ भला सीट ऐसी फंसी है की टीवी बता रहा है की जोशिया अड़ गया है लड़ेंगे बनारसे से जबकि ऊ शिशु मंदिल के मास्टर, हमरे पड़ोसी कह रहे थे की मोदिया के लड़ाने में फायदा है, अगल-बगल का सीट भी निकल जावेगी।
 
तभी बगल से किसी ने कहा कि जड़ी चच्चा इज्जत से नाम लेवो, काहें बिहने एक बाभन को ऐसे बोल रहे हो? पाप पड़ेगा, बाभन, उहो बुजुर्ग को नहीं गरियाते, अब हम लोगन के ही देखो झक मार के परचार करना ही पड़ेगा भाई, पल्टी का मामला है। साला हर हर मोदी के जमाने में भी सब बनारस कि सीट का मजाक बना दिए लेकिन क्या किया जाए?
 
सरदार – भाई जड़ी , तू तो मोख्तार मियाँ के बीबी के ही दोगे न? लेकिन जान लो ओके दोगे तब्बो भाजपा वाला निकलेगा। लगता है की जोशी जिव्वा हर पार्टी को सेट करके गोटी बिछा दिहेन ह, एही लिए सीट छोड़े नाहीं चाहत हैं।
 
जड़ी मियाँ – तू कइसे जान लिहे की हम के का देंगे ? यार काँग्रेस क कुछ समझ नहीं आ रहा है, लेकिन मार सारे के कवनों लड़ें, बनारस त बनारसे रहेगा न ? का कर लिहें ?
 
सरदार – भाई देखो, इहाँ तो वन सीट कंपलीट भोले नाथ का है अउर शहर उनहीं के भरोसे है। अब नेता-परेता चाहे जे आवो चाहे जाए, का सुधरीहें ससुरे अउर इहाँ के सुधरी?
 
तब तक अखबार आ चुका था जिसमें था की प्रदेश सरकार ट्रैफिक सुधारने के लिए बनारस रेलवे स्टेशन के पास से एक नया फ्लाईओवर उठायेगी और हाल ही में बने पुराने वाले को थोड़ा तोड़ा जाएगा, तोड़ने में बस डेढ़ करोड़ का खरचा आएगा। सरदार ने ये खबर बांच रहे सज्जन से पूछा की अभी नया बना रहा, तोड़े क खर्चा घेलुआ में है का ? तो पढ़ने वाले ने बताया की नहीं, लिखा है की उस खर्चे को बट्टे में डाल दिया जाएगा।
 
जड़ी मियाँ — साला, तोड़े का खर्चा बट्टे में अउर फिर जो जे आधे पर ले बनाने वाले रहे अउर पहिले ही पूरा पिलान नहीं बनाये ओनके ऊपर का सुनवाई होगा, इस बारे में का लिखा है?
 
सरदार — छोड़ो न भाई, सबेरे सबेरे कहाँ फँसते हो, पूरा दिन निकल जाएगा, फैसला नहीं होगा। खाली करो बोतल अउर चला जाय, काम धाम है की नहीं ?
 
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