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काशीनाथ के नाम खुला पत्र
उज्ज्वल भट्टाचार्य 
गुरुजी नमस्कार !
बीबीसी में आपका साक्षात्कार पढ़ा. पहले तो विश्वास ही नहीं हो रहा था. फिर सोचा, इन सालों के दौरान तो बहुत कुछ बदल चुका है. आप भी बदल गये होंगे. लेकिन इन सालों के दौरान भी तो आपसे यदा-कदा भेंट होती रही. इतने बदल चुके होंगे आप ? ऐसा तो कभी लगा नहीं.
गुरुजी, अब मैं बच्चा नहीं हूं. लेकिन आपको जब पता चला था कि मैं कविता लिखता हूं, और आपने उन्हें दिखाने का हुक़्म किया था, तब मैं लगभग बच्चा था. आप ही ने परिवेश में चार कवितायें छापी थी. कविताओं में कसावट का अभाव था, लेकिन उनमें एक ईमानदार क्रांतिकारी भावना थी. उसके बाद मेरी एक कविता आपने रद्द भी कर दी थी. आपने कहा था – “देखो, जो तुम्हारी अपनी बात नहीं है, उसे कहने की कोशिश मत करो. यह ईमानदारी का तकाज़ा है.“
साक्षात्कार के बाद आपने कहा है कि यह आपकी बात नहीं है, जन प्रतिक्रिया है. आप साक्षात्कार के दौरान यह कहना भूल गये कि यह आपकी बात नहीं है.वैसे साक्षात्कार में आपने क्या कहा, उसे भी यहां उद्धृत किया जा सकता है : “ धर्म और जाति को अबकी मुझे लगता है कि बनारस की जनता एक ठेंगा दिखाएगी और कहीं न कहीं मोदी के पक्ष में लोग जाएंगे।“ क्या यह आपका वाक्य है ? क्या मोदी के पक्ष में जाना धर्म और जाति को ठेंगा दिखाना है ?
गुरुजी, लेखकीय दायरे से बाहर आप राजनीति में कभी सक्रिय नहीं रहे, बल्कि उससे आंख चुराते रहे. किसी को उससे आपत्ति नहीं थी, वामपंथी आपको अपने दायरे का समझते रहे. मेरा ख्याल था कि आपकी भी यही समझ रही है. मैं आज भी यह कहने को तैयार नहीं हूं कि आज आपकी यह समझ नहीं रह गई है. और इसलिये भी सिर्फ़ इस साक्षात्कार के शब्द ही नहीं, बल्कि उसका समूचा मिज़ाज बेहद तकलीफ़देह है. क्या काशीनाथ सिंह (कम से कम राजनीतिक रूप से) अब अपने नहीं रह गये है ? 
अगर आप नहीं रह गये हैं, तो कहिये. हमने बहुतों को बदलते देखा है. खुलकर कहना इसलिये भी ज़रूरी है, क्योंकि आपके पात्र, उनका खुलापन, उस खुलेपन की ईमानदारी – इन्हीं के ज़रिये आपकी हर रचना बेजोड़ हुई है. अपने स्पष्टीकरण में आपने कहा है : “ नरेंद्र मोदी घनघोर हिंदुत्ववादी और हिंसक साम्प्रदायिक राजनीति के नायक हैं। वे फासीवादी हैं और तानाशाह भी। उन्होंने गुजरात में जो किया है, भारत उसे कभी भून नहीं सकता। वे भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा हैं। मैं किसी भी स्थिति में उनके या बीजेपी के समर्थन की कल्पना भी नहीं कर सकता।“ ये स्पष्ट शब्द हैं, और इन्हीं की वजह से यह खुला पत्र लिख रहा हूं. लेकिन आपके स्पष्टीकरण से यह नहीं स्पष्ट हुआ कि किन परिस्थितियों साक्षात्कार में प्रसारित बातें कही गईं. जन प्रतिक्रिया का तर्क गले नहीं उतरता है. इसमें वह ईमानदारी नहीं है, जो काशीनाथ सिंह के पात्रों की बातों में लगातार उभरती रही है.
मुझे लगता है कि आपको खुलकर सामने आना पड़ेगा. इस ओर, या उस ओर. अगर हम एक ओर हों, तो बेहद-बेहद ख़ुशी होगी. अगर नहीं, तो मान लूंगा कि लोग तो बदलते ही हैं. आप अगर बदल गये हैं, तो ज़रूर उसकी कोई वजह होगी.
 
आपका
उज्ज्वल भट्टाचार्य 
 
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