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मिट्टी की मोहब्बत में…

हिमांशु बाजपेयी

पुराने लखनऊ के रहने वाले एक साहब जो कि अपने शहर को अपनी महबूबा की तरह मोहब्बत करते थे एक बार किसी ज़रूरी काम से मुंबई गए. मायानगरी उन्हे रास न आई. बेचारे वहां दीवाने की तरह लोगों से पूछते रहे कि यहां ‘अमां यार’ को क्या कहा जाता है ? हर इलाके के अपने कई खास जुमले होते हैं जो उस इलाके की सामाजिक-सांस्कृतिक मौलिकता में रचे बसे होते हैं, उसकी रूह में पैवस्त होते हैं,उसके वजूद की ज़ीनत होते हैं. ज़रा ठहर के सोचिए कि उदारीकरण और बाज़ारवाद की आंधी से उपजे वो नए शहरी इलाके कितने बदनसीब हैं जिनके पास इस तरह के टकसाली जुमले नहीं हैं.
 
लखनऊ में जो मर्तबा अमां यार को हासिल है वही जलवा बनारस में हर-हर महादेव का है. ये जुमला बनारस के लोगों की धार्मिकता को नहीं बताता बल्कि उनकी आत्मा में घुले बनारस को दिखाता है. ये हिस्सा उस शहर के शऊर की शहरग है जिसका कोई विकल्प नहीं हो सकता. इसीलिए प्रायोजित शोरगुल और हा-ओ-हू के बीच भी ये विश्वास ज़रा नहीं हिला कि मोदी बनारस से चुनाव भले ही जीत जाएं लेकिन अपने पीआर और छल-छद्म को बरकरार रखने पर करोड़ों फूंक देने के बावजूद सच्चे बनारसी के मुंह से हर हर महादेव की जगह हर हर मोदी कभी नहीं निकलवा सकते.
 
क्योंकि हर हर महादेव का जुमला बनारस के हर वयक्ति के लिए उसके अस्तित्व का अभिन्न अंग है जिसमें बदलाव या छेड़छाड़ कर पाना संभव नहीं है. ये सीधे उनकी तहज़ीब से छेड़-छाड़ का मामला है. हज़ारों साल तक अपने शहर की साधना के बाद बनारसियों ने इस जुमले में ये शिद्दत पैदा कर पाई है कि ये अपने आप में एक पूरी तहज़ीब की अलामत बन गया है. इसलिए एप्को जैसी सैकड़ों विदेशी कंपनियां मिलकर भी अगले सैकड़ों साल तक इस जुमले का स्थानापन्न बनारस को नहीं दे सकतीं. प्लांटेड लोगों, डार के कटे लोगों या उन बदनसीबों की बात अलग है जिनको बनारस में रहने
 
के बावजूद बनारस की आत्मा का अंश नहीं मिला.सवाल है कि ऐसा पिटा हुआ जुमला गढ़ने की ज़रूरत क्या थी. असल में पीआर में जुटी विदेशी कंपनियां इस सांस्कृतिक पेंचो-खम को क्या जानें. इसे समझने और सुलझाने में एक उम्र लगती है. एक साल दो साल में तो आप इसका सिरा भी नहीं तलाश सकते. फिर जो कान नोट गिनने की आवाज़ सुनने के आदी हैं वो बिस्मिल्ला खां की शहनाई, किशन
 
महाराज की तीन ताल या छन्नू लाल मिश्र की ठुमरी के सुरों को कहां पकड़ पाएंगें. इस विषय में अगर थोड़ी भावुकता से काम लिया जाए तो एक तरह से हर हर मोदी का नारा बनारस और बनारसियों दोनो के प्रति अभद्रता लगती है.साथ ही एक गंभीर किस्म की आत्म-मुग्धता, दंभ और व्यक्तिपूजा भी. जो उम्मीदवार अपने चुनाव क्षेत्र की मिट्टी के संस्कारों से आत्मीय रिश्ता बना पाने की योग्यता न रखता हो उसे चुनाव लड़ने का कम से कम नैतिक अधिकार तो नहीं ही है. यूं लोकतंत्र में अयोग्य लोग भी चुनाव जीत ही जाते हैं. मोदी पर हज़ारो लोगों के साम्प्रदायिक कत्लेआम में शामिल होने का आरोप है. हरचंद उन्हे एसआईटी-अदालत ने क्लीन चिट दे दी है लेकिन तारीख गवाह है कि अदालतों के फैसले गलत भी हुए हैं और बदले भी हैं. अब फर्ज़ कीजिए कि अगर मोदी लखनऊ से चुनाव लड़ते. हो सकता है वो जीत भी जाते. लेकिन क्या मोदी की उम्मीदवारी और जीत लखनऊ की उस फराखदिल तहज़ीब की हार और मौत नहीं होती जिसमें वाजिद अली शाह ने इस मंत्र के ज़रिए जानbanaras_varanasi
 
फूंकी थी के- ‘हम इश्क के बंदे हैं, मज़हब से नहीं वाकिफ/गर काबा हुआ तो क्या बुतखाना हुआ तो क्या’. जो शहर सारे आलम से हिन्दुस्तान की कौमी यकजहती की सबसे पहली पहचान बना हुआ है, क्या मोदी का उस शहर से लड़ना या जीतना उस शहर के लिए शर्म की बात नहीं होती. मोदी सीधे तौर पर दोषी हों या न हों लेकिन इस बात को लेकर तो कोई विवाद नहीं है कि गुजरात दंगे काबू कर पाने में वो पूरी तरह से नाकाम रहे. हम लखनऊ जैसे शहर को उन्हे सौंपने का रिस्क कैसे ले सकते हैं. उस शहर को जिसमें सैंकड़ों साल से हिन्दू मुसलमान दूध और शक्कर की तरह घुले-
 
मिले बसर कर रहे हैं और आजतक उनके संघर्ष की कोई भी बड़ी घटना नहीं हुई. मोदी अपनी कुर्सी, जो अब उनकी हुई भी नहीं, को लेकर रिस्क नहीं लेना चाहते, इसीलिए दो सीटों से लड़ रहे हैं तो लखनऊ वाले अपनी सैंकड़ों साल पुरानी तहज़ीब को लेकर रिस्क क्यों लें. इस तहज़ीब को हम कलेजे से भींचकर रखते हैं, माथे से लगाकर रखते हैं, इसे लेकर जोखिम नहीं उठाया जा सकता. हमारा विकास नहीं होता है न हो ! लखनऊ में पैदा हुए इफ्तेखार आरिफ कुछ कह रहे हैं-
 
मिट्टी की मोहब्बत में हम आशुफ्तासरों ने
 
वो कर्ज़ उतारे हैं जो वाजिब भी नहीं थे !
 
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