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ये वो पुस्तक मेला तो नहीं

उत्कर्ष सिन्हा 

लखनऊ।  लखनऊ में फिर पुस्तक मेला लगा है।  हर साल लगता है और अब तो साल में दो बार लगता है। मगर साल दर साल इसका मिज़ाज बदल रहा है।  अच्छे साहित्य की तलाश अब यहाँ पूरी नहीं हो पाती। स्टालों के जंगल में प्रकाशक कम और कारोबारी ज्यादा आने लगे हैं। रोज संगोष्ठियां भी  होती हैं मगर खाली सीटों के साथ।
इस बार भी मोती महल लान में लगा पुस्तक मेला कुछ इसी रुझान का दिख रहा है।  यहाँ धर्म की किताबें हैं। कंप्यूटर और साईंस की किताबे हैं , बाजार का मिजाज देख कर हड़बड़ी में तैयार की गयी सतही व्यक्तित्व प्रधान किताबे हैं।  फेंग शुई है। कबीर के कैसेट हैं। शुगर कम करने वाली चाय है , सुगन्धित धुप बत्ती है।  प्लास्टिक की फाइलें हैं।  लूट सको तो लूट लो और गोदाम जल गया तो सस्ता माल के नारे के साथ 20 रुपये के दर से अग्रेजी के सस्ते नावेल हैं।  प्रकाशको का सालों से अनबिका कबाड़ है। सालो से दिख और बिक रही जीवनिया है। मगर नहीं है तो बेहतरीन हिंदी की किताबें। 
 
लखनऊ पुस्तक मेले के पूरे चक्कर लगाने में महज 20 मिनट लगे। किताबो की टाइटिल आकर्षित नहीं कर पा रही। अपवाद सिर्फ सामायिक प्रकाशन का स्टाल है जहाँ करीने से नारी को केंद्र बना कर सजायी गयी ढेर सारी किताबें हैं।  नयी लेखिकाओं की किताबें है तो नारी विमर्श पर भी  है।  मगर ये अपवाद है।   प्रकाशन को बाजार ने कितनी बुरी तरह से दबोचा है इसका अनुभव मुझे हो चुका है।  लगभग तीन साल पहले नक्सलियों ने जब बड़ी वारदाते की थी तब लखनऊ के एक माफिया टाईप प्रकाशको के दलाल ने मुझसे नक्सलवाद का इतिहास लिखने को कहा।  समय सीमा थी बीस दिन।  उन्होंने रास्ता भी बताया था। गूगल गुरु की शरण में जाने का मंत्र भी दिया था। मेरे इंकार करने पर उन्होंने कहा था कि किताब तो छपेगी भी और दिल्ली पुस्तक मेले में धड़ल्ले से बिकेगी भी मगर आप का नुक्सान हो जायेगा।  उस समय अमबंिों की तूती भी बोल रही थी तो पुस्तक मेले में धीरू भाई अम्बानी बिक रहे थे।  इस बार नरेंद्र मोदी ने उनकी जगह ले ली है। 
 
शहर के  साहित्य प्रेमी अब पुस्तक मेले से बहुत उम्मीद नहीं रखते मगर नन्हे बच्चो के साथ नयी पीढ़ी के माँ बाप के लिए ये जगह अब मुफीद है।  उनके वीकेंड और शाम यहाँ अच्छी बीतेगी।           
 
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