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तमिलनाडु - जनता के पांच सवाल

शिप्रा शुक्ला 

ज से कुछ हफ़्तों में तमिलनाडु की जनता एक बार फिर मत देने के लिए कतार में खड़ी होगी और अपना मत देगी कि केंद्र में किस दल को सरकार बनानी चाहिए।  एक ओर भाजपा का द्रविड़ दलों के साथ बना सतरंगी गठबंधन प्रदेश की जनता को विकास के लुवाभने सपने दिखा रहा है, वहीँ दूसरी ओर प्रदेश की मुख्यमंत्री जयललिता जो प्रदेश की बिजली, पानी और महगाई की समस्याओं के लिए केंद्र सरकार
 को जिम्मेवार ठहराती आयी है, अब प्रदेश की जनता को केंद्र सरकार में तमिलनाडु को बेहतर स्थान  दिलाने का वादा कर रहीं हैं। 
 
 नेतायों के वादों से परे यदि आम आदमी के दिल में झांके तो पता चलेगा कि प्रदेश की जनता के लिए पांच सबसे महत्वपूर्ण सवाल हैं - महगाई, बिजली, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पानी । एक सर्वेक्षण के अनुसार प्रदेश के 20 फीसद लोगों ने महगाई को प्रदेश में सबसे बड़ी समस्या माना है।  करीब 13 फीसद  लोग प्रदेश में बिजली की कमी से त्रस्त हैं। उससे तनिक कम 12 फीसद  भ्रष्टाचार से दुखी है और 5  प्रतिशत लोग
 बेरोजगारी को हटाने में सरकार से मदद चाहते है तो 4 प्रतिशत लोग पानी के लिए तरस रहे हैं।  स्वाभाविक है कि  महगाई, बिजली , भ्रष्टाचार, बेरोज़गार और पानी इन पांच मूलभूत समस्यांओ से जूझ रही प्रदेश की जनता उम्मीद रखेगी की केंद्र में सरकार बनाने वाला दल इन समस्याओ से निजात दिलाने में उसकी मदद करे । राजनितिक पर्यवेक्षक मानते है कि तमिलनाडु की ज्यादातर जनता लोकसभा और विधानसभा
 चुनावो के अंतर को  समझती है और अपने स्थानीय आकायों की वादा खिलाफी और भ्रष्टाचार से त्रस्त है, शायद यही कारण है कि प्रदेश में 2014 चुनाव में भाजपा के अब तक के सबसे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है। राजीनीतिक पर्यवेक्षक मानते है कि प्रदेश की जनता में बदलाव और विकास की चाह है, जिसे भाजपा और उसके सहयोगी दल अपनी ओर मोड़ने की पुरजोर कोशिश में हैं। 
 
 प्रदेश में 27 फीसद जनता अभी भी गरीबी रेखा के नीचे है और रोजमर्रा की चीज़ो के लिए परेशां है, कोई बड़ी बात नहीं कि मुफ्त का चावल या टीवी चुनाव में उन्हें लुभाने के लिए पर्याप्त रहे है और दिनोदिन बढ़ती महगाई भी उनके लिए बड़ी समस्या है.  2004 - 2005 की गणना के अनुसार प्रदेश में 351 रुपये प्रतिमाह कमाने वाला ग्रामीण और 547 रूपये कमाने वाला शहरी आदमी गरीबी रेखा से नीचे माने गए है।  प्रदेश की द्रविड़
 सरकारें अपनी पीठ ठोकने से बाज नहीं आती कि 1983 में लगभग 51 फीसद  जनता गरीबी रेखा के नीचे थी और अब स्थिति बदल रही है, पर लोग इन सरकारी आंकड़ो के सवाल जवाब में न पड़ गरीबी से निजात चाहते है।  शहरी चमक दमक से दूर यदि गावों में जाकर देखें तो बहुत से घर ऐसे मिलेंगे जहाँ दोनों जून चूल्हा जलाना एक उपलब्धि है।  भ्रष्टाचार और सरकारी धन का दुरूपयोग इसका बड़ा कारण माने जाते है। 
 
 प्रदेश में भ्रष्टाचार का एक ज्वलंत उदाहरण वर्षों से बन रहीं सड़कें है।  सरकारी आंकड़ों को माने तो करीब पांच हजार करोड़ रुपये की लागत वाली सड़क योजनाये फीताशाही और भ्रष्टाचार के चलते प्रदेश में अटकी पड़ी है।  पिछले कई दशको पर प्रदेश की सत्ता में काबिज द्रविड़ दल दूरगामी विकास के बजाय मुफ्त का सामन देकर जनता में वाहवाही लूटने और सरकार में बने रहने के तरीके खोजते रहे है।  यही
 वजह है कि प्रदेश सरकार  के ज्यादातर उपक्रमों में बिना रिश्वत के कोई काम नहीं आगे बढ़ता।  प्रदेश के ज्यादातर बड़े नेता, उनके भाई भतीजे भ्रष्टाचार और आय से ज्यादा संपत्ति के मुकदमो में नामित है। तमिलनाडु देश के भ्रष्टतम राज्यों में से एक गिना जाता है।
 
 बिजली की बात करें तो तमिलनाडु  में बिजली की आपूर्ति पिछले कुछ वर्षो में बद से बदतर हो गई है।  बिजली समस्या 2014 में बढ़ने ही वाली है क्योकि  सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी की रपट के अनुसार प्रदेश में मांग और पूर्ति में 34.1 फीसद का अंतर है और जो देश में सबसे ज्यादा है और पिछले साल से करीब दोगुना है। पिछले कुछ वर्षो में प्रदेश में गर्मियों में चेन्नई को छोड़ कर बाकी जगहों पर
 ऐतिहासिक बिजली कटौती हुई और प्रदेश में 12 - 14 घंटे की कटौती आम बात बन गई थी।  जहाँ घरो और दफ्तरों  में लोग परेशां थे वहीँ इसका बड़ा नुक्सान कारखानों और मिलों को हुआ । सैकड़ों लघु कारखाने बिजली की कमी के कारण बंद हो गए या फिर पास के प्रदेशों में चले गए। पिछले वर्ष प्रदेश सरकार ने सौर्य ऊर्जा और वायु ऊर्जा की ओर कदम बढ़ाये और यह काम निजी हाथो में देने की घोषणा हुई लेकिन मामला अभी
 आगे नहीं बढ़ा है।  उम्मीद है कि 2016 में कुंडाकुलम पावॅर प्रोजेक्ट के शुरू होने पर प्रदेश की जनता को राहत मिलेगी।  प्रदेश के लोग मान कर चल रहे है कि अभी चुनाव के कारण उन्हें बिजली मिल रही है लेकिन मत पाने के बाद नेतायों की तरह बत्ती भी गायब हो जायेगी।
 
 इसीतरह प्रदेश के बहुत से इलाकों में नहाने  को छोड़िये, पीने का भी पानी रोज़ नसीब नहीं है । तमिलनाडु पानी के लिए मुख्यतः वर्षा पर निर्भर है ।  पिछली कई सरकारों ने पानी को संयोजित करने और बेहतर आपूर्ति के लिए कई योजनाएं शुरू की जिन पर हज़ारों करोड़ रूपए खर्च किये जा चुके है और स्थिति में थोड़ी बेहतरी देखी गयी है  लेकिन कई योजनाये अभी भी आधे में लटकी है, और प्रदेश के कई हिस्सो में
 रोज पीने का पानी मिलना एक सपना ही है।   हालाँकि तमिलनाडु उच्च शिक्षा में काफी आगे है लेकिन नौकरिया देने में नहीं।  प्रदेश में तक़रीबन 5 लाख युवायों ने रोजगार के लिए आवंटन दे रखा है, इसके अलावा कितने ही युवकयुवतियां इंजीनियर और दूसरी डिग्रिया लेकर भी नौकरी की तलाश में भटक रहे है।
 
 प्रदेश की सरकारें अक्सर हर मामले में  केंद्र से सहयोग न मिलने की दुहाई देती है वह चाहे कावेरी का पर्याप्त पानी न मिलने का सवाल हो या फिर सेतुसुन्दरम प्रोजेक्ट का ।  जनता जनार्दन अब राष्ट्रीय दलों और केंद्र की सरकार में इन सवालों के जवाब ढूंढ रही है।  प्रदेश में पहली बार भाजपा ने एक महा गठबंधन तैयार कर प्रदेश की जनता की महत्वकान्क्षायों को हवा दी है।  “बहुत हुए भ्रष्ट
 नेतायों के  वादे और उनके भाई भतीजो के मोटे बैंक बैलेंस के किस्से कहानी, हमें बदलाव चाहिए ” ये मांग है कोइम्बटोर की शर्मिला की.  और वे अकेली नहीं है इस मांग में, बहुत से स्थानीय लोग है जो सूरत बदलने की तमन्ना दिल में पाले है और 2014 के चुनावो से बहुत उम्मीदे लगाये है ।
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