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मार्क्स के घर में

उदय प्रकाश 

 जब कल मेरे देश में संसदीय चुनावों के लिए वोट डाले जा रहे थे, तब मैं उस शहर के लिए यात्रा में था, जहां जाने की वर्षों से मेरी आकांक्षा थी। जर्मनी का वह सबसे प्राचीन शहर , जिसका नाम ट्रिएर है और जहां सन १८१८ में उस महान दार्शनिक का जन्म हुआ था , जिसके बाद एक ऐसा वैज्ञानिक दर्शन अस्तित्व में आया, जिसने संसार को समझने का ही नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह बदलने के सिद्धांत को जन्म दिया। 
ट्रिएर नामके इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शहर में, जो रोम के साम्राज्य से भी तेरह सौ साल पुराना है और जहां मध्यकाल के संत एम्ब्रोस का जन्म हुआ था, वहीं १८१८ में जन्मे थे कार्ल मार्क्स। 
कल दोपहर ३. ०० बजे मैं यहाँ पहुंचा हूँ। कल कई पुराने स्मारक और स्थल , जो अब यूनेस्को के विश्व इतिहास की धरोहर हैं, को देखा। और आज मार्क्स के उस घर को देखने जाऊंगा , जहां उनका जन्म हुआ था। यह घर अब एक संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है , जिसमें मार्क्स के बहुत पुराने पत्र , दस्तावेज़ , पांडुलिपियां और उनके द्वारा लिखी गयी किताबों के सबसे पुराने संस्करण सहेज कर रखे गए हैं। 
एक रोमांच-सा महसूस कर रहा हूँ। 
दुःख है कि इस बार अपना एक वोट अपने देश के आमचुनाव में नहीं दे पाया , लेकिन यदि पांच साल तक जीवन शेष रहा तो अगली बार ....
लेकिन बेतहाशा खुशी है कि मेरी वर्षों की वह इच्छा पूरी हुई , जो पहले मुश्किल लगती थी।कल शाम को फ्रेइबुर्ग लौट जाऊंगा और तब आप सब के लिए अपने कैमरे से खींचे गए कुछ चित्र पोस्ट करूंगा। 
अभी तो आप सबको जर्मनी के सबसे पुराने शहर से सुबह की मुबारक !(इस वक्त जब मैं ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, यहां सुबह के पांच बज कर दस मिनट हुए हैं और उस महान दार्शनिक कार्ल मार्क्स का घर यहां से सिर्फ सौ मीटर दूर है, जिसने बीसवीं सदी में इस धरती के दो तिहाई हिस्से को अपने विचारों से बदल डाला था और आज भी समाज से जुडा हुआ कोई भी विचार बिना उसके सन्दर्भों के संभव नहीं …।तो … गुडमार्निंग ! आप सबका दिन खूब अच्छा रहे। …(उदय प्रकाश की वाल से )
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