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समुद्र तट पर कुछ दिन

अंबरीश कुमार 

सूर्योदय देखने की वजह से सुबह पांच बजे ही नींद खुल गई थी ।खिड़की से पर्दा हटाया तो बाहर अँधेरा छंटता नजर आया । समुद्र तट सामने ही था इसलिए एक कप काफी पीने के बाद बाहर निकलने का कार्यक्रम बना । यह महाबलीपुरम में तमिलनाडु पर्यटन विभाग का रिसार्ट था जंहा कई बार रुकना हुआ है ।चेन्नई से करीब पचास किलोमीटर दूर यह जगह काफी खुबसूरत है । मुख्य सड़क और शहर से दूर होने की वजह से शांत भी है ।पांडिचेरी जाने से पहले महाबलीपुरम में रुकने का कार्यक्रम बना था । करीब तेइस साल बाद उसी काटेज के आगे बैठा था जहां पहली बार रुका था । बहुत कुछ याद आने लगा ।महाबलीपुरम में तमिलनाडु पर्यटन के इस रिसार्ट में बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया है ।वैसा ही जंगलों में घूमते हुए जाने का अहसास इस बार भी हुआ जो पहली बार हुआ था ।सागर की लहरे जब पैर को भीगा कर लौटी तो मुठ्ठी भर रेत बटोर ली । कुछ सीपियाँ भी आ गई जिन्हें घर ले आया हूँ ।इस समुद्र ने तब इतना डरा दिया था कि कोई उम्मीद भी नहीं बची थी । वर्ष १९९० में दक्षिण में विवाह के फ़ौरन बाद दक्षिण में करीब पखवाड़े भर घूमने का कार्यक्रम बना था और सीधे चेन्नई (जो तब मद्रास था ) पहुंचे थे । यह आमंत्रण दक्षिण के गाँधीवादी कार्यकर्ता और जयप्रकाश नारायण के सहयोगी शोभाकांत जी ने दिया था । सीधे उनके आवास गोविन्दप्पा नायकन स्ट्रीट पहुंचे । देर से पहुंचे थे और बरसात थम नहीं रही थी ।जाना था महाबलीपुरम पर शोभाकांत जी ने इस बरसात में जाने की इजाजत नहीं दी ,कहा सुबह गाड़ी से भिजवा देंगे ।बताया कि बहुत बड़ा तूफ़ान आ रहा है इसलिए कार्यक्रम रद्द करे और यही रुके । तूफान कि भविष्यवाणी यह थी कि मद्रास शहर का बड़ा इलाका डूब सकता है । पर साथ में यह भी जानकारी दी कि इस तरह की भविष्यवाणी हर साल होती है पर मद्रास तो बच जाता है नेल्लोर में लोग तबाह हो जाते है । सुबह भी मौसम वैसा ही था इसलिए दोपहर बाद जाने का कार्यक्रम बना और रिसार्ट के प्रबंधक को शाम तक पहुँचने की सूचना दे दी गई । समुन्द्र के किनारे किनारे जाने वाला महाबलीपुरम का रास्ता बरसात में देखते बनता था ।नारियल के घने जंगल हवा में लहराते नजर आ रहे थे ।तब तटीय इलाकों पर अतिक्रमण नहीं हुआ था इसलिए लगातार समुंद्र दिख रहा था और उंची लहरे भी । तमिलनाडु पर्यटन विभाग के रिसार्ट तक पहुँचते पहुंचे मौसम और खराब हो चुका था ।कैशुरिना के जंगलों के बीच से एक घुमावदार रास्ता रिसेप्शन के सामने खत्म हो जाता था जहाँ एक तरफ रेस्तरां था तो सामने श्रंखला में बने काटेज । मैनेजर हैरान था क्योकि अकेले हम ही ऐसे सैलानी थे जो आज पहुंचे थे बाकि सभी ने अपने कार्यक्रम तूफ़ान के चलते निरस्त कर दिए थे बहुत से कर्मचारी भी चले गए थे । मैनेजर ने हिदायत दी की अपने काटेज से बाहर बिलकुल ना जाए और समुन्द्र की और तो किसी कीमत पर नहीं । खाने का आर्डर अभी दे दे जो काटेज में सर्व कर दिया जाएगा । नाश्ता तो तब मिलेगा जब सुबह तक बच पाएंगे क्योकि तूफ़ान आधी रात के बाद महाबलीपुरम के तट तक पहुंचेगा । इस बात ने और डरा दिया ।तबतक कार भी जा चुकी थी और कोई चारा नहीं था ।खैर नीचे के काटेज में पहुंचे तो बेडरूम के सामने की दीवार कांच की थी और उसपर लगा पर्दा हटाते ही लगा मानो लहरें कमरे के भीतर तक आ जाएँगी । लगातार बरसात से ठंड बढ़ चुकी थी और पंखा चलाने की भी जरुरत नहीं थी ।अँधेरा हो चुका था और कुछ मोमबती दी गई थी इस खौफनाक रात का मुकाबला करने के लिए जहां सामने सी आती उंची उंची लहरे डरा रही थी ।समुन्द्र के पास बहुत बार रुका हूँ पर इतनी उंची लहरे कभी नहीं । सामने पल्लव साम्राज्य के दौर का मशहूर तट मंदिर लहरों औए बरसात में बहुत रहस्मय सा नजर आ रहा था ।नारियल के पेड़ों के झुण्ड तक लहरा रहे थे और सामने कैशुरिना के जिन दो पेड़ों पर आराम करने वाला झूला पडा था वह हवा के झोंके से ऊपर नीचे हो रहा था ।चारो ओर से आ रही तूफानी हवा की आवाज और कमरे के बाहर तक आतीं लहरे । खाना खाते खाते रात के दस बज चुके थे और बैरे के मुताबिक करीब साढ़े बारह बजे तक तूफ़ान के इस तट पर आने की आशंका थी ।मन अशांत था और तब मोबाइल भी नहीं होते थे और फोन लाइन भी शाम को खराब हो गई थी । खैर कब नींद आई पता नहीं चला ,उठा तो कमरे में रौशनी थी हालाँकि सूरज नहीं निकला था ।चाय के लिए बैरे को बुलाया तो पता चला तूफ़ान लेट हो गया है अब दस बारह घंटे बाद आएगा ।बहुत समय था और कई विकल्प भी । तूफ़ान का डर ख़त्म हो चूका था और बरसात थमते ही तट पर आ गए पर लहरों से दूर ही थे ।
अचानक एक बड़ी लहर आई तो ध्यान टूटा ।सामने सूरज समुद्र से आधा बाहर आ चूका था ।समुद्र तट पर रिसार्ट में रुके कुछ जोड़े भी अब बाहर आ चुके थे ।दाहिने की ओर  'शोर टेंपल ' के आसपास सैलानियों की भीड़ बढ़ने लगी थी ।नए साल की वजह से सैलानी ज्यादा थे ।रिसार्ट के समुद्र तट पर सुनामी के कहर का निशान जगह जगह दिख रहा था ।महाबलीपुरम जब पहली बार पहुंचा था तो यह छोटे से गांव की तरह नजर आया । एक पहाडी और उसके आसपास प्राचीन मंदिरों का शिल्प देखने वाला है । शिल्पकारों ने पहाड को तराश कर उन्हें न सिर्फ मंदिरों में बदला बल्कि तरह तरह कि आकृतियों में बादल डाला है । महाभारत की कई कहानियां यहाँ शिल्प में बदली जा चुकी है । पल्लव साम्राज्य की यह ऐतिहासिक धरोहर एक नही कई बार देखने वाली है । महाबलीपुरम बाजार से करीब आधा किलोमीटर दूर पर वह प्राचीन मंदिर है जिसके बाहरी हिस्से पर लगातार समुन्द्र की लहरे टकराती रहती थी और कई जोड़े वह बैठकर फोटो खिंचाते नजर आते थे । अब यह मंदिर परिसर घेरकर एक पार्क में तब्दील किया जा चुका था और मंदिर के बाहरी हिस्से के आगे पत्थर डालकर उसे सुरक्षित किया जा चुका था । जो पहले गाँव जैसा था वह अब एक कस्बे में बदल चुका था और दक्षिण भारतीय रेस्तरां के साथ बड़ी संख्या में चाइनीज और इंटरकांटिनेंटल रेस्तरां नजर आ रहे थे । विदेशी सैलानी तो पहले जैसे ही थे पर देसी सैलानियों कि संख्या काफी ज्यादा थी । 
महाबलीपुरम से निकले तो समुद्र के किनारे किनारे ही पांडिचेरी की तरफ बढ़ गए। पांडिचेरी जो अब पुद्दुचेरी कहलाता है ,उसका रास्ता महाबलीपुरम से ही होता हुआ जाता है ।दक्षिण के इस अंचल में कई खुबसूरत समुद्र तट है जो सैलानियों को पसंद आ सकते है और ऐसे समुद्र तट पर रुकना बहुत महंगा भी नहीं है ।महाबलीपुरम ,पांडिचेरी ,रामेश्वरम ,कन्याकुमारी से चलकर तिरुअनंतपुरम के समुद्र तट उदाहरण है । यदि दिसंबर जनवरी के पीक सीजन को छोड़ दे तो  अमूमन डेढ़ दो हजार रुपए में रिसार्ट में जगह मिल जाती है । तमिलनाडु और केरल में पर्यटन विभाग के रिसार्ट मध्य वर्ग की जरूरतों के हिसाब से ही बनाए गए है । पांडिचेरी में तो अगर कुछ पहले योजना बनाकर जाएँ तो बहुत ही कम खर्च होता है क्योंकि अरविंदो आश्रम के गेस्ट हाउस में ठाह्रने और भोजन आदि का खर्च बहुत कम है । पांडिचेरी में अरविंदो आश्रम का पार्क गेस्ट हाउस समुद्र तट पर है। अरविंदो आश्रम के सभी अतिथि गृह में यह ज्यादा भरा रहता है सिर्फ समुद्र के किनारे होने की वजह से। पर यह आश्रम ही है कोई होटल नहीं। हर कमरे में माँ मीरा की बड़ी फोटो लगी रहती है। यहाँ से समुद्र का नजारा भी अद्भुत नजर आता है। मैं दूसरी मंजिल के उनतीस नम्बर कमरे में रुका हुआ हूँ और बच्चे पहली मंजिल के कमरा नंबर 44 में। अपना कमरा काफी बड़ा और आरामदेह है जबकि नीचे के कमरे छोटे हैं और वहाँ से समुद्र का वह दृश्य नहीं दिखता जो यहाँ से नजर आता है। चेन्नई से एक दिन पहले शाम यानी दो जनवरी को इस गेस्ट हाउस में पहुँचे थे। पहले ट्रेन फिर बहुत दिनों बाद बस से सफ़र करते हुये। सभी साथ थे। पर चेन्नई से ही तबियत ढीली थी। मैरीना बीच और महाबलीपुरम के समुद्र तट पर भी ठण्ड ही महसूस हुयी तो दवा लेनी पड़ी। यह सब सुबह-सुबह हलके कपड़े में समुद्र तट पर कई घण्टे गुजरने की वजह से हुआ। चेन्नई में इतनी ठण्ड सुबह हो जायेगी यह अंदाजा नहीं था। हालाँकि गोपालपुरम के लायड गेस्ट हाउस में ए.सी. लगातार चलता रहा क्योंकि इस तरह के कमरे में कोई खिड़की नहीं होती है।
खैर ज्यादा हैरानी पुद्दुचेरी में रजाई गद्दा बिकता देख कर हुयी। हर कोई गर्म कपड़े पहने नजर आया साथ ही टोपी भी। दक्षिण में इतनी ठण्ड पहली बार लोगों ने महसूस की। हर साल की तरह इस बार भी नए साल पर बाहर था और समुद्र तट पर आराम करने के लिये आया था क्योंकि पिछले छह महीने से व्यस्तता काफी बढ़ गयी थी और लगातार दौरे हो रहे थे। लिखना भी कम हो गया था। इसलिये हफ्ता भर समुद्र तट पर रहना चाहता था। पर बुखार ने अपना कार्यक्रम काफी हद तक चौपट कर दिया। इस बार पांडिचेरी में चेट्टीनाड व्यंजनों का स्वाद लेना चाहता था और इसके लिये एक मित्र ने व्यवस्था भी कर दी थी। पर यह सम्भव नहीं हो पाया।
सबके जाने के बाद एक कप कॉफी के साथ मै बालकनी में बैठ गया और समुद्र की तेज होती लहरों को देखने लगा। सामने नारियल के पेड़ों की कतार लहराती नजर आ रही थी। एक छोटा बच्चा समुद्र के किनारे काले पत्थरों पर अपनी माँ के साथ उछल-कूद करने में व्यस्त था। दाहिने तरफ की बीच रोड पर सैलानियों कि संख्या बढ़ती जा रही थी। फिर बैठे-बैठे ऊब जाने पर बाहर निकल आया। इस फ्रेंच रेस्तरां के आसपास चौपाटी जैसा नजारा था और ठेले से तली हुयी मछली की गंध चारों ओर फैली हुयी थी। तटीय शहरों में समुद्र तट पर सभी जगह यह नजारा दिखता है। साथ ही मदिरा की दुकानें भी। चेन्नई में तो इस तादात में मदिरा की दुकानें नहीं दिखती पर पुद्दुचेरी में हर चार कदम पर मधुशाला नजर आ जाती है और मदिरा की सेल भी लगी नजर आयी। विदेशी ब्रांड की कीमत यहाँ काफी कम है क्योंकि टैक्स में काफी छूट है। उसका असर समुद्र तट भी दिख जाता है पर कोई हुल्लड़ मचाता नजर नहीं आयेगा। खा
ने-पीने के मामले में फ्रांसीसी संस्कृति का असर पुद्दुचेरी में साफ झलकता है। कई बार तो लगता है कि फ़्रांस के ही किसी शहर में घूम रहे हो। वास्तुशिल्प से लेकर बाजार की दुकानों और रेस्तरां होटल के नाम भी फ्रांसीसी हैं। ठीक उसी तरह जैसे गोवा पर पुर्तगाल का असर नजर आता है। पर यह शहर कुछ अलग जरूर है जहाँ भारी भरकम लक्जरी गाड़ियों की जगह साइकिल ज्यादा नजर आती है। शाम को तो बीच रोड पर वाहनों की आवाजाही पूरी तरह बंद कर दी जाती है इसलिये सैलानी बेफिक्र होकर सड़क पर कई किलोमीटर तक घूम लेते हैं। बहुत से सैलानी समुद्र तट के किनारे पड़े पत्थरों पर बैठे नजर आते हैं। नए साल का यह दूसरा दिन है इसलिये नवविवाहित जोड़ों की संख्या भी ज्यादा है जिसमें उत्तर भारत वाले भी शामिल हैं।
पुद्दुचेरी अन्य तटीय शहरों के मुकाबले काफी साफ़ सुथरा और किफायती शहर है। यहाँ पर खाना और रहना दोनों ही सस्ता है। अगर अरविंदो आश्रम के सबसे आलीशान पार्क गेस्ट हाउस में रुके तो छह सौ में सबसे बड़ा सूट जैसी जगह मिल जाती है जिसमें तीन-चार लोग आ सकते हैं। एक व्यक्ति का एक दिन का खाना नाश्ता आदि भी आश्रम के केंद्रीय भोजनालय में पचास रुपए में हो जाता है। पर यह सब आश्रम जैसा ही है। कोई रूम सर्विस नहीं है। खाने के लिये भी रेस्तरां में ही जाना पड़ेगा। मैं यात्रा में चाय काफी के लिये बिजली की छोटी केतली और उसका सामान साथ लेकर साथ चलता हूँ इसलिये सुबह चार बजे उठने पर कोई दिक्कत नहीं होती। वर्ना सुबह पार्क गेस्ट हाउस के रेस्तरां खुलने का समय ही सात बजे है। आश्रम का शायद यही अकेला रेस्तरां है जहाँ अंडा मिल जाता है वर्ना बाकी जगह शुद्ध शाकाहारी नाश्ता और खाना। सुबह सैलानी नाश्ता करने के बाद समुद्र तट पर पहुँच जाते है और देर तक बैठे रहते हैं।कादम्बनी के यात्रा विशेषांक में प्रकाशित पिछले कुछ यात्रा संस्मरण के अंश 
 
 
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  • सम्मोहक शरण का अरण्य
  • पत्थरों से उगती घास
  • नैनपुर अब कोई ट्रेन नहीं आएगी
  • शंखुमुखम समुद्र तट के किनारे
  • बदलती धरती बदलता समुद्र
  • सपरार बांध के डाक बंगले तक
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