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बागियों को शह देते मुलायम गैर भाजपावाद की नई पहल दम तोड़ रही है नैनी झील अखिलेश पर दबाव बढ़ा रहें है मुलायम
बिन पानी सब सून . . .

शिप्रा शुक्ला
हफ्ते में एक दिन “ उप्प तन्नी” यानि कि बोर वेल का खारा पानी और १५ दिनमें एक बार “नल्ल तन्नी” यानि अच्छा पीने का पानी, इतना मिले तो राजम्माका महीना चैन से गुजर जाता है।  बेटे बहू और उनके बच्चो के साथ रहने वालीराजम्मा घरो की सफाई करके अपना जीवन यापन करती है।  पहले उनके पति औरबच्चे तिरुनलवेल्ली के अपने गांव में सब्जियां उगाते थे और किसी तरह गुजर
बसर करते थे।  इस काम का सबसे मुख्य जरूरत थी पानी, मेघ देवता नाखुश होते तो उनकी सब्जियां उनके रसोईका चूल्हा जला पाने में असमर्थ रहती।  हारकर, अपना जमीन का टुकड़ा बेच करनका परिवार कोइम्बटोर आकर बस गया कि लड़के शायद दर्जी बन जाएँ तो परिवारके दिन बहुरेंगे।  उनके दोनों बेटे दर्जी तो न बन सके, लेकिन पूरा परिवारलोगों के बाग़ बगीचे की देखभाल और घरों की साफ़ सफाई करके गुजर बसर करता हैऔर दिन भर की कड़ी धूप में पसीना बहाये बिना दो जून की रोटी खा कमा रहा है।  लेकिन राजम्मा के लिएपानी आज भी उतना ही बड़ा सवाल है।  पानी आने वाले दिन पूरा का पूरा परिवारसब काम छोड़ लाइन में लग पानी इकट्टा करता है और पूरे परिवार की हफ्ते, दोहफ्तों या फिर महीने भर की पानी की जरूरत का इंतजाम करता है।  पर समस्यातब आती है जब किसी वजह से पानी न आये। पूरे मार्च में उनके इलाके मेंपानी नहीं आया, सुना मोटर ख़राब थी, जब धीरे धीरे रखा पानी खत्म हो गया तो परिवार ने बैलगाड़ी पर पानी बेचनेवालों से १२० रुपये में थोड़ा पानी ख़रीदा और अपना काम चलाया लेकिन बेवजहये खर्च परिवार को अखर गया।

गर्मी आई नहीं की तमिलनाडु के ज्यादातर लोग पानी की त्राहि त्राहि में लगजाते है। देर शाम लगी लम्बी पानी की कतारें और एक के बाद एक हरे, नीले,पीले, लाल प्लास्टिक के घड़ों की सतरंगी कतार किसी भी गली मोहल्ले मेंदेखी जा सकती है।  छोटे छोटे बच्चे, बीमार और गर्भवती औरतें, ड्यटी करलौटे जवान और बूढ़े सभी इस कतार में देखे जा सकते हैं, बस एक और घड़े कीखातिर। लोग एक घड़े पानी के लिए कई घंटे लाइन में लगते है या अपनी गाढ़ी कमाई पानी पर खर्च करने पर मजबूर है। दूरदराज के गावों में स्थिति और भी बदतर है।  कुनूर निवासी विजयन कहते है दोचार दिन पानी न आये तो काम चल जाता है लेकिन आजकल महीने में एक बार पानीआना नियम जैसा बन गया है। हालाँकि सरकारी नुमाइंदे कहते है कि  सभीस्थानों पर टैंकर द्वारा पानी भेजा जाता है लेकिन आम लोगो की कहानी कुछऔर ही बताती है। हाँ, यदि आप बड़ी रकम खर्च करने को तैयार है तो पानी की कोई किल्लत नहीं और बहुत से लोगऔर पाश रिहाइशी कालोनिया कमर्शियल दर पर पानी खरीदती है पर आम आदमी कहाँजाये ?
 
तमिलनाडु में पानी की आपूर्ति का मुख्य साधन नदिया और कुँए हैं, जो किभारी गरमी की वजह से सूख जाते है।  ये सच है कि पिछले दशकों में प्रदेशमें आबादी में खासा इजाफा हुआ है और खेती की जमीन में कमी आई है और घरोंऔर उद्योगो की तादात में ाफी ई है।  इसके चलते प्रदेश में भूगतपानी का स्तर नीचे चला गया है लेकिन क्या इन पर नजर रख उसके अनुकूलयोजनाएं नहीं बनाई जानी चाहिए थी। यदि आंकड़ों पर नजर डाले तो पिछलें ६ दशकों में प्राकृतिक संसाधनो के बेहतरउपयोग के प्रयासों की ईमानदारी पर सवाल खड़े हो जाते हैं।  तमिलनाडु औरपडोसी कर्नाटक के लोग कावेरी के पानी बंटवारे पर एकदूसरे से लड़ भिड़ते रहेहैं, और पानी बांटने को लेकर कई दशको से चल रहा विवाद अभी भी थमा नहींहै, लेकिन तमिलनाडु का ८० प्रतिशत वर्षा का जल समुद्र में व्यर्थ चलाजाता है और जनता प्यासी की प्यासी है। इसके लिए सरकार चलाने वालों की जवाबदेही जरूर बनती है।

प्रदेश में २०१४ में  घरेलू, सिंचाई, जानवरों और उद्योग के लिए पानी कीमांग और पूर्ति में ११ % का भेद है।  विशेषज्ञों आने वाले वर्षो में यहभेद बढ़ने की आशंका जताते  हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले चार दशकोंमें प्रदेश में मानसून कमोवेश सामान्य रहा है, परन्तु प्राकर्तिकसंसाधनों को सरंक्षण न किया जाना ही प्रदेश की पानी की समस्या का सबसेबड़ा कारण है जिसके चलते जहाँ एक ओर  प्रदेश की जनता प्यासी रह जाती है वहीँ दूसरी तरफ बारिश के पानी का बड़ाहिस्सा व्यर्थ ही समुद्र में बह जाता है।  विशेषज्ञों का कहना है कि बहजाने वाला पानी पूरे प्रदेश के पेयजल की समस्या को हल करने में समर्थ है।
पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट ( पीडब्लूडी ) के एक सर्वेक्षण के अनुसारहालाँकि पिछले कुछ वर्षो प्रदेश में मानसून अपेक्षाकृत ठीक रहा है लेकिनबारिश के पानी संचय के ज्यादातर उपाय ठन्डे बस्ते में चले जाने से भूमिगतपानी का स्तर बहुत नीचे चला गया है।  बहुत से कुएं सूख गए हैं और लोगोंके पास घड़ा लेकर कार्पोरेशन के पानी की लाइन में खड़े होने के आलावा कोईउपाय नहीं है। प्रदेश के कई जिलों में पानी का स्तर बहुत नीचे चला गया है खासकर वेस्टन घाट के करीबकोइम्बटोर और थेनी में जहाँ पानी का स्तर प्रदेश में सबसे नीचे है औरपिछले वर्ष की तुलना में पानी करीब १५ मीटर नीचे चला गया है।  मार्च २०१३की तुलना में पूरे राज्य में पानी करीब आधे से चौथाई मीटर के बीच नीचेचला गया है और चेन्नई में पिछले साल २०१३ मार्च के आंकड़ों के विपरीत इसवर्ष २०१४ मार्च में ०.९ मीटर नीचे है।  कांचीपुरम, तिरुवल्लुर, और तिरुवन्मलई में यही स्थिति है।वेल्लोर, विल्लीपुरम, त्रिची और डिंडीगुल में भी पानी के स्तर में एकमीटर से ज्यादा की घटत देखी गयी है।स्वाभाविक है चुनाव के मौसम में जब प्रचार की गर्मी नेताओं को  जनता केसामने ला खड़ा कर रही है लोग देश, प्रदेश और दलों की राजनीति से परे जीनेके एक महत्वपूर्ण साधन पानी का हक़ मांगना चाहते है।  बड़े बड़े वादे करटीवी मिक्सी जैसी सुविधाये दिलाने वाले राजनितिक दल रोजाना कुछ पानीदिलाने की बात क्यों नहीं करते। केवल इंसान ही पानी की कमी से परेशान होऐसा नहीं है, जानवर भी इससे तंग है. नीलगिरि के आसपास के जंगलो और दुसरे कई जंगलों में से पानी की तलाश मेंहाथी और दुसरे जंगली जानवरों के बाहर निकलने की कई घटनाएँ सामने आईं हैऔर आदमी और जानवर के बीच की अस्तित्व की लड़ाई एक बार फिर जोरों पर है।

इससे बचने के लिए फारेस्ट विभाग ने उद्मालपेट और अमरावती के अनामलै टाइगररिज़र्व, कालक्कड़ मुन्धन्तुरै टाइगर रिज़र्व, मुदुमलाई  टाइगर रिज़र्व औरसत्यमंगलम टाइगर रिज़र्व के कई ऐसे इलाके जहाँ पानी की बहुत कमी है पानी के कृतिम नाले तैयार कियेगए हैं जिसके कि जानवर जंगल से बाहर न निकले।विशेषज्ञों का मानना है प्रदेश के तटीय इलाकों में बड़े पैमाने पर बिना
किसी नियम कायदों की परवाह के भूमिगत जल को निकलने का दौर चला है।चेन्नई, चिदंबरम, नागपट्टिनम और टुटिकोरिन स्थानो पर उद्योगो और जनसँख्यामें काफी वृद्धि हुई है और परिणाम स्वरुप जमीन से बेतहाशा  पानी निकलागया।  साथ ही नदियों के अत्यधिक खनन के कारण नदियों में बारिश के जल कोसमाने की क्षमता कम हो गई है इसीलिए कावेरी समेत प्रदेश की ज्यादातर बड़ी नदियों का बहुत सा पानी बहकर समुद्र में गिर जाता है। विशेषज्ञ जल्द जल्द से जल्द नदियों और दुसरेप्राकर्तिक साधनों के सरंक्षण पर जोर देते है जिससे कि वर्षा के जल कोसंचित कर उसका जनहित में उपयोग किया जा सके और नदियों में से होकर
जीवनदायक जल समुद्र में न जा गिरे ।वर्षा के जल संचय के लिए तमिल नाडु में स्वतंत्रता के पहले के तीन बड़ेजलाशय थे।  बाद में प्रदेश में ८२ जलाशय और करीब ४०००० छोटे तालाब बनायेगए।  जो प्रदेश की बढ़ती आबादी और जल की मांग को पूरा करने में सक्षम हैलेकिन दुखद ये है की इन जलाशयों और तालाबों की निम्न स्तर के रखरखाव के चलते तकरीबन  ८० % जल समुद्र में जा विलीन हो जाता है। जलाशयों की क्षमताघटने का बड़ा कारण है - अवसादन या सेडीमेंटशन।  विशेषज्ञ जलाशयों के कचरे को निकलने की बहुत जरूरत मानते  है।केंद्र सरकार की देश की प्रमुख नदियों को जोड़ने की योजना अभी अधर में है,इसलिए विशेषज्ञ फौरी तौर पर प्रदेश की नदियों को जोड़ने पर जोर देते हैक्योकि कई बार प्रदेश की एक नदी उफान पर देखी गई है तो दूसरी में सूखा पड़
रहा होता है। उनका मानना है की दिनोदिन बढ़ती पानी की मांग और आपूर्ति केभेद से निबटने के लिए तटीय इलाकों में बेहतर जल संचय किया जाए, नए बांधऔर तालाब बनें  और हो सके तो प्रदेश की नदियों को जोड़ दिया जाये। जब ये होगा तभी प्रदेश की जल समस्यासे मुक्ति मिलेगी और प्रदेश में पानी को लेकर धरने प्रदर्शन का दौर औरपडोसी प्रदेशो से झगडे का चलन ख़त्म होगा ।

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