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यादों के सहारे

अशोक बंसल

वृध्द  होने पर इन्सान में भौतिक और पारलौकिक   में भेद करने की ललसा  पैदा  होती है. आस्था जैसे   टीवी चैनेल भले लगने लगते हैं. वक्त काटने के लिए पूजा -पाठ में ज्यादा से ज्यादा रम जाना उसे अच्छा लगता है.  सांसारिक  लोगों  की ऐसे वृध्द और एकाकी  हो जाते लोगों के लिए यही  सर्वोत्तम सलाह भी है. पर ८५  बसंत देख चुकी और छब्बीस  बरस पूर्व मित्र जैसे  पति का साथ हमेशा- हमेशा के लिए छोड़ चुकी कनक चाची  का जीवन दर्शन कुछ और ही है. कनक चाची  ने अपने पति  प्रकाश चन्द्र चतुर्वेदी के साथ पत्रकार शिरोमणि दादा बनारसीदास चतुर्वेदी की सेवा में वर्षों गुजारे. आत्मप्रचार से दूर रहे  लेखक और अनुवादक प्रकाश चन्द्र चतुर्वेदी टीकमगढ़ में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे . टीकमगढ़ नरेश ने दादाजी के सुझाव पर लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला था और अनेक वर्षों वे अपने भांजे प्रकाश के साथ टीकमगढ़ में रहे .
पति की म्रत्यु के  बाद कनक चाची फिरोजाबाद छोड़कर मथुरा आ गयीं और बस गईं मथुरा की मोतिकुँज कालोनी में .प्रकाश चाचा के जाने के बाद पिछले २8 सालों से चाची यादों के सहारे जी रही हैं.  यादों  में फिरोजाबाद और टीकमगढ़  में लम्बे समय तक प्रवास करने वाले मामा बनारसीदास चतुर्वेदी  और   इतिहास में दर्ज तमाम महापुरुषों के रोचक किस्से और   प्रकाश  चाचा  की साहित्यिक गतिविधियाँ और ठहाके वाली ठिठोलियाँ शामिल हैं.  दादाजी के  फिरोजाबाद के घर में क्रान्तिकारियो का आवागमन बराबर बना रहता था .चाचीजी बताती हैं कि काला पानी की सजा काटने वाले क्रांतिकारी  बाबा प्रथ्वी सिंह आजाद   ,शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की बहिन ,शहीद चंद्रशेखर आजाद की माताजी , भगत सिंह के साथी शिव वर्मा आदि प्रसिद्ध लोग दादाजी के पास आते ही न थे वल्कि कई कई दिन घर में रुकते  थे.   कनक चाची इतिहास के इन तमाम  पन्नों  के बीच चलती फिरती हैं ..इन यादों को चाचीजी कलेजे में समेटे हुए है. 
बुढ़ापे में इंसान के सठिया जाने का खतरा रहता है.चाचीजी इस रोग  से मुक्त  हैं.सामने वाला यदि साहित्य या भारतीय  क्रातिकारी आन्दोलन में रूचि रखता है तभी वह अपनी यादों के  इन  पन्नों को पलटती हैं.  चाचीजी को याद है कि बाबा प्रथ्वी सिंह ने २५ साल छोटी लड़की से शादी की थी. बाबा पृथ्वी सिंह अपनी पत्नी के साथ दादाजी के पास आते और रुकते .चाचीजी  बाबा प्रथ्वी सिंह की पत्नी से खूब  घुल मिल गईं , दोस्ती हो गई.चाचाजी खान हैं महान लोगों के निजी किस्सों की .    ये किस्से महान लोगों के हैं ,चाचीजी के निजी जीवन के कतई नहीं. अपनी   कृशकाय काया के कष्टों का जिक्र तो चाचीजी पूछने पर भी नहीं करती.
दादाजी "विशाल भारत "  (कलकत्ता ) के संपादक  रहने के बाद टीकमगढ़ आ गए  थे. प्रकाश चाचा   ने दादाजी के कहने पर अमेरिका के   लेखक हेनरी डेविड थोरो की पुस्तक 'वाल्डेन' का  हिंदी अनुवाद किया . महात्मा गाँधी ने इस पुस्तक के बारे में लिखा है कि थोरो ने उनके जीवन को  बहुत प्रभावित किया. चाचीजी  कहती है कि  इस पुस्तक के  अनुवाद करने के लिए  प्रकाश  सुबह ४ बजे जाग जाया करते थे. हिंदी के उपयुक्त शब्दों की  तलाश में शब्दकोष  से माथ्थापच्ची करते  करते . सुबह दादाजी के साथ ठहलने निकलनिकलते तो बातचीत का विषय वाल्डेन होता था .  राष्ट्रपति  राजेंद्र प्रसाद ने दादाजी को राज्यसभा में सदस्य मनोनीत करने से पहले क्या वार्तालाप किया था और राजनीति से अपने आप को दूर रखने की बात कही थी , सी .एफ. एंड्रूज  और गांधीजी के साथ दादाजी के  अनेक किस्से   चाचीजी को याद हैं.  
एक दिन मैं चाचीजी की मेज पर रख्खी थोरो की 'वाल्डेन' पढने के लिए मांग लाया .पुस्तक वापस करने में मुझे देरी हो गयी. चाचीजी ने मोबाईल पर तकादा करना शुरू कर दिया. मैं जब पुस्तक लौटाने गया तो चाचीजी  ने भावुक स्वर में कहा कि ''अशोक ,बुरा मत मानना . अलमारी में रखी ये पुस्तकें  और हाथ के लिखे कागजों के पुलंदे तुम्हारे चाचा की धरोहर है. मैं इनके बीच चलती फिरती हूँ ,जीती हूँ तो मुझे अपार सुख मिलता है. इन यादों के सहारे मैंने २8 बरस ख़ुशी ख़ुशी गुजार दिए.
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