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बुधुआ के घर में त्यौहार

शिप्रा शुक्ला 

तमिलनाडु। आज बुधुआ के घर में त्यौहार जैसा माहोल है, ये उसका असली नाम नहीं, जाहिर है तमिलनाडु में कोई अपने बच्चे का नाम बुधुआ नहीं रखता, पर कहानी असली है और इस कहानी में न जाने कितने बुधुआ शामिल है जिनके नाम नहीं बताये जा सकते । छोटे से उसके घर में बच्चे बड़ी चाकलेट खा रहे है और बीबी चौखट पर बैठ पड़ोसन से बतिया रही है, आज खाना जो नहीं बनाना।  और यह ख़ुशी है चुनाव के कारण।  आज सुबह काम को जाते समय बुधुआ की बस्ती के नेताओं ने उसके मत पर्ची और साथ में कुछ गुलाबी नोट थमाए।  वाकई महगाई बढ़ गई है और एक सौ - दो सौ में मत “मांगने” के ज़माने गए।  इस बार बुधुआ के माँ बाप और बीबी समेत चारों लोगो को
 दो दो हज़ार के हिसाब से इनाम मिला साथ ही बिरियानी के पैकेट अलग से।  सो न तो खाना पकाने का झंझट और न ही रोज की बच्चो की किचकिच।  बुधुआ उनके लिए महंगी चाकलेट लाया है जिसे वे स्वाद ले चाट रहे है ।  पिछले हफ्ते बुधुआ एक चुनावी सभा में गया था जहाँ एक हज़ार मिला था और अब आठ हज़ार। एक दिन कुछ साड़ियां भी मिली थी और हाँ बीच में दो क़्वार्टर भी जिसको उसने वहीँ ख़त्म कर दिया था।  हालाँकि पैसा और सामन अलग अलग दलों से आया लेकिन परिवार के मन में किसी से विश्वासघात करने जैसी कोई दुविधा नहीं है।  महीने के तीन - चार हज़ार कमाकर अपने ६ लोगो के परिवार की जीविका चलाने वाले बुधुआ को किसी दल से कोई नाराजगी नहीं है और न हीं किसी से कोई विशेष प्रेम। वह सिर्फ यह जानता है कि जो उनका ख्याल रखता है उस दल को मत देना उनकी जिम्मेवारी है, न तो उसे पता है की यह चुनाव सहिंता के खिलाफ है और न ही उसे भान है कि उसका वोट खरीद लिया गया।  वह तो हमारी व्यवस्था का एक छोटा सा नुमाइंदा है जो अपने हको और कर्तव्यों से अनभिज्ञ महज अपने अस्तित्व की लड़ाई में व्यस्त हैं।  
सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो २०१४ में तमिलनाडु में धन वितरण और रूपये के आवागमन को रोकने के चुनाव आयोग के प्रयास अभूतपूर्व रहे।  चुनाव आयोग के अनुसार मतदान से एक दिन पहले तक आँध्रप्रदेश में सबसे ज्यादा १०२ करोड़ रुपये और दुसरे स्थान पर तमिलनाडु में ३९ करोड़ और कर्नाटक में २०.५३ करोड़ कैश  और शराब और दूसरे सामान जब्त किये गए।  चुनाव आयोग ने तमिलनाडु में एक टोल फ्री नंबर जारी किया था जिसमे चुनाव संहिता सम्बन्धी शिकायते की जा सकती थी, इस पर करीब ७२२ शिकायतें आई लेकिन जब आयोग का खोजी दस्ता घटनास्थल पर पहुंचा तो उन्हे कोई प्रमाण नहीं मिला।  प्रदेश में जगह जगह पुलिस वाले आम लोगो की गाड़ियों को रोक कर तलाशी लेते रहे और व्यापारी वर्ग इस रोकटोक से त्रस्त हो उठा लेकिन कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता कि पैसा के आवागमन रुक गया।  लगता है जब तक पुलिस और आयोग के दस्ते को खबर मिलती, बिचौलिये अपना काम निबटा चुके होते। स्थानीय लोगो की सुने तो प्रदेश में ज्यादातर बड़े नेताओं की रैली गरीब तबके के लिए इनाम बनती सुनाई देती है। 
धन वितरण के लिए कुख्यात तमिलनाडु में इस बार चुनाव आयोग ने प्रदेश में पहली बार मतदान से ३६ घंटे पहले से धारा १४४ लगा दी थी जिसके तहत ज्यादा लोगों का इकट्ठे बाहर रहना वर्जित है।  
चुनाव प्रचार की शुरुआत में ही आयोग ने प्रसिद्ध अभिनेता कमल हसन को लोगो में जागरूकता लाने के लिए अनुबंधित किया था।  कमल हासन ने आयोग के वीडियो  में लोगो से अपना मत न बेचने की पुरजोर अपील की। बाद में जगह जगह पुलिस के छापे, इंटरनेट, मेल और फ़ोन द्वारा शिकायत करने की सुविधाये देकर आयोग ने अपनी पूरी कोशिश निष्पक्ष चुनाव के लिए झोंक दी जो पूरी तरह सफल रही यह कहना मुश्किल है क्योंकि स्वयं प्रदेश चुनाव आयुक्त ने माना है की वे ९५ % शिकायतों पर पक्के सुबूत न होने से कारवाही नहीं कर सके । 
२००९ के लोकसभा चुनाव में द्रमुक और उसके नेता अलागिरी पर अख़बार के साथ धन बांटने और  मतदाताओं को ५०० - ५०० रूपये प्रति मत देने के आरोप लगे थे और इसका जिक्र विकी लीक्स में भी आया था।  जबकि तिरूमंगलम विधानसभा क्षेत्र के उप चुनाव में ५००० तक में मत की खरीद फरोख्त की चर्चाये अब तक गर्म है।  २०१४ लोकसभा चुनाव में अनेको फ्लाईंग स्कॉड के बावजूद मतदान के बाद सभी प्रमुख दल एक दुसरे पर मत खरीदने के आरोप लगा रहे हैं।  पिछले दो महीनो में प्रदेश में हवाला सौदे और सोने की तस्करी में भी बढ़ोतरी हुई जिसका सम्बन्ध चुनाव से जोड़ा जा रहा है।  द्रमुक नेता स्टालिन ने सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक पर सत्ता के दुरूपयोग और बड़े पैमाने पर  धन वितरण के आरोप लगाये है तो अन्नाद्रमुक ने उनके दल द्रमुक पर टुटिकोरिन और तिरुनलवली में रूपये बांटने के आरोप लगाये है।  भाजपा और सहयोगी गठबंधन ने भी द्रविड़ दलों पर ऐसे ही आरोप लगाये है।  चुनावी हित के मद्देनज़र मुफ्त के सामान बांटने में द्रविड़ दलों ने पहले ही बाकी देश को पीछे छोड़ दिया था, अब प्रदेश की राजनीति नए आयाम छू रही है।   
पिछले लोकसभा चुनाव पर नजर डाले तो २००९ लोकसभा चुनाव में
 द्रमुक और अन्नाद्रमुक के मतों के प्रतिशत में महज ४-५ प्रतिशत का फर्क है।  कांग्रेस - द्रमुक गठबंधन को ४२. ५ % मतों के साथ २७ सीटें मिली थी जबकि ३८ % मत पाने के बावजूद अन्नाद्रमुक के थर्ड फ्रंट गठबंधन को  १२ सीटें ही मिली थी।  भाजपा और  सहयोगी दलों को २०% मत पाने के बावजूद कोई भी सीट नहीं मिली थी।  जाहिर  है कि ऐसे में यदि रूपये और दुसरे प्रलोभनों से एक छोटे से हिस्से को भी लुभा लिया जाये तो पूरी कहानी का रुख बदलते देर नहीं लगती।  पिछले लोकसभा चुनाव में ३९ में से प्रदेश की महज ९ सीटो पर जीत हार का फासला एक लाख से ऊपर था और कुछ स्थानो पर तो यह अंतर महज दो और तीन हज़ार का था।  ऐसे में जाने अनजाने बुधुआ और उसकी बस्ती के साथी बहुत महत्वपूर्ण हो
 उठते है।  जब बाजार में खरीदार अनेक हो तो सबसे बड़ी मुश्किल तो बेचारी जनता की है कि अपने दिल, दिमाग की सुने या बच्चो की चमकती आँखों की जो बिरियानी और चाकलेट पा लबरेज हैं। 
 
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