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विकास की दौड़ में खो गया बंगलूर
शिप्रा शुक्ला 
आधुनिकीकरण और शहरीकरण की दौड़ में पुराना बंगलौर कहीँ गुम हो गया दीखता है। चौड़ी चौड़ी सड़के, हरे भरे उद्यान आज जैसे नए बंगलूरू की बहुमंजिली इमारतों की चकाचौंध मे खो गये है।  कई सालों के बाद शहर मे जाने पर कुछ पुरानी यादें ताज़ा हो उठती है और अनेकों उम्मीदें जागती है कि जिस छोटी सी पुलिया से घर की तरफ़ मुडते थे वह मिलेगी या फिर किसी इमारत के नीचे दब गयी होगी, और जिन पेड़ों पर हमनें अपने नाम खोदे थे वे खड़े मिलेंगें या फिर किसी के घर की चौखट मे दफ़न हो चुके होगे। 
करीब दो - तीन दशक पहले का बंगलोर कबन पार्क  और लालबाग के लिये जाना जाता था और शहर मे प्रवेश करते ही सबसे पहली नज़र हरीतिमा पर टिक जाती थी लेकिन शहरीकरण की दौड़ मे तेजी से सरपट भागते बंगलूरू से पुराना बगलौर बहुत पीछे छूट गया है.  बगीचों के लिए प्रसिद्ध शहर अब भारतीय सिलिकॉन वैली के नाम से जाना जाता है ओर अत्याधुनिक माल ओर पब के लिये लोग इसे याद करते है।  एक वक्त पर बंगलौर को सेवानिवृत्त होने के बाद बसने के लिये उत्तम माना जाता था और बंगलौरवासी यहाँ के मोसम ओर हरीतिमा पर मुग्ध रहते थे। अस्सी के दशक में बंगलौर को वृक्ष मित्र का ख़िताब मिल था। पर शहर की फ़िज़ा बदल गयी, आज देश के सबसे तेजी से विकसित हो रहे शहरों मे से एक है।  
इस दौड मे शहर ने देश की इंफोर्मेशन टेकनॉलजी राजधानी का तमगा हासिल किया है और देश के करीब एक तिहाई आई टी प्रोफेशनल आज बंगलोर मे कार्यरत है।  नौकरी के बेहतर आयाम ओर बढ़िया मौसम ने लोगोँ ओर कंपनियों को लुभा रखा है और कर्नाटक की राजधानी हर क्षेत्र मे विकास की ओर अग्रसर है।  बंगलोरे की महज ३५ - ४०  प्रतिशत आबादी वहां की मूळ निवासी है जबकि आबादी का बड़ा हिस्सा देश के दूसरे हिस्सों से यहॉँ आकर बस गया है। १९९१ में करीब ४१ लाख लोगो का शहर अब  लगभग तिगुनी एक करोड आबादी को समा रखे है।  इस बदलाव से खान पान ओर रहन सहन मे भी बद्लाव आ रहा है और एम टी आर के सेट डोसा,  रवा इडली और बैसीबिल्ली भात की जगह अब शवर्मा ओर मोमो जयादा प्रचलित होते जा रहे है। स्वाभाविक है  बंगलोर इस विकास की भारी कीमत भी चुका रहा है और सरपट बढ़ती आबादी समस्याएं साथ लेकर आई है ।  अचानक आये तकनीकी बूम के लिये शहर मे योजनाबद्ध तैयारी की कमी साफ़ देखी जा सकती है।  
बंगलौर के निवासी पानी, सड़क जैसी मूल सुविधाओं के लिये तरस रहे है। वाइट फील्ड, इलेक्ट्रॉनिक सिटी और दुसरे ईलाकों मे कई बहुमंजिली इमारतें मिलेँगी जिन तक पंहुचने के लिये पक्की सड़क नहीं है ओर लोग अपने परिवार के साथ वहां रहने के लिये मजबूर हैं।  पानी की समस्या गरीब अमीर सबको परेशाँ करती हैँ, दो बंगलौर बासी जब आपस मे पह्ली बार मिलते है तो जरूर पूँछ लेते है कि आपके यहाँ पानी क़ब आता है। टैंकर से पानी मंगाकर काम चलाना यहाँ के लोगों  मजबूरी है । 
शहरीकरण की मार सबसे ज्यादा महसूस की जा सकती है बगळूरू की सडकों पर।  सुबह - शाम तो जैसे ट्रैफिक महज रेंगने लगता है और शाम को दफ्त्तर से निकले लेकिन कब शाम रात मे बदल जाती
 है  पता ही नहीं चलता।  हालाँकि शहर के कुछ इलाकों मे मेट्रो बखूबी चल रही है लेकिन यह शहर की करोड़ के करीब पहुँच रही आबादी के लिए पर्याप्त नहीं है। शहर में करीब करीब पचास लाख वाहनों का रजिस्ट्रेशन है, जिसमे दुपहिए, तिपहिये और कार ट्रक सब शामिल है। जाहिर है बगंलूरु की सड़कें पूरी तरह वाहनों के बोझ से दबी है और जनता यातायात की असुविधा ओर प्रदूषण की दोहरी मार सह रही है।  यह सच है इन पचास लाख वाहनो मे से बहुत से अब तक लोहे मे तब्दील होगे ओर असल गिनती कुछ कम हो सकती है लेकिन वाहनो के बहुतायत ही है कि बगंलूरु पुलिस हर महीने गलत पार्किंग के तकरीबन पचास हज़ार मामले दर्ज करती है।  वाहनों की संख्या मे बंगलुरु बस दिल्ली से थोङा ही पीछे है।  सड़कों पर बहुत भीड़ के चलते ओरेकल, इनफ़ोसिस, विप्रो जैसी बडी आई टी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को सप्ताह के कुछ दिन घर से ही काम करने की सुविधा दी है और कई स्कूलों ने अपने समय मे फेरबदल करके सड़कों का बोझ कम करने और अपने लोगों का समय बचाने के उपाय आज़माने शुरु किये  हैं लेकिन सङकों की दास्ताँ बिल्कुल नौ दिन चलने अढ़ाई कोस जेसी ही है. 
 
वक्त के साथ साथ जैसे बंगलौर की फिजा भी बदल गई है ओर अपने नाम के साथ बदल रहा है बंगलुरु।  बंगलुरु के नाम को लेकर कई कहानियां सुनाई देती है, एक कहानी के अनुसार राजा को बीन्स खिलाये जाने पर वेन्डा काला उरु यानि कि उबली बीन्स का शहर बैंगलूरू नाम पड़ा तो दूसरी कहानी बताती है कि वहां पाये जाने वाले बेनचु पत्थर और बैंग पेङों के कारन शहर का नाम बंगलुरु पड़ा था।  इतिहासविद मानते है कि पुरातत्व खोजो मे बंगलुरु का उल्लेख प्रहरी शहर के रुप में मिलता था ओर इसे कन्नड़ मे बेंगावल-उरु ( सिटी ऑफ गार्ड्स ) के नाम से जाना जाता था।  बंगलुरु अंग्रेजो के जमाने मे बैंगलोर बन गया जिसे २००८ में वापस बंगलुरु में बदल दिया।  नाम बदल देने से इंसान की तकदीर भले ही बदल जाये, शहर की  तस्वीर नहीं बदलती।  अपने सरनुमायों के दिये नामोँ से अनभिज्ञ बंगलुरु अपनी रफ़तार से हांफ़ रहा है। उम्मीद है सरकार और स्थानीय शासन शहर की दिनोदिन बढ़ती आबादी ओर उस से पैदा हो रही समस्याओं की ओर ध्यान देंगी। 
 
 
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