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मूलचंद की सुध किसी ने नहीं ली

डा. अशोक बंसल 

इंसान के इरादे बुलंद हों तो कुछ भी असंभव नहीं है। इस कहावत को सच सावित कर दिया   मूलचंद ने। मूलचंद मथुरा  के राजकीय संग्रहालय में प्रदर्शित प्राचीन कलाकृतियों पर खुदी ब्राह्मी लिपि की इबादत ऐसे पढते  हैं जैसे हिंदी में लिखी गई चिट्ठी ।  हैरत की बात है कि मूलचंद सिर्फ पांचवीं पास है। वे मथुरा संग्रहालय में पिछले38 साल से चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद पर तैनात है। शर्म की बात यह है कि मथुरा म्यूजियम के अधिकारियों ने मूलचंद   की असाधारण   प्रतिभा का दोहन  अपने हित में किया लेकिन उस गरीव की न कभी पीठ थपथपाई और न ही उसकी पदोन्नति की. 
ब्राह्मी का जन्म मौर्य काल (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व ) का माना जाता है। छठी शताब्दी के गुप्त काल तक बनी मूर्तियों, सिक्कों व शिलालेखों पर ब्राह्मी लिपि का ही इस्तेमाल किया गया है। सम्राट अशोक के सभी 14 शिला लेखों पर खुदी इबारत ब्राह्मी लिपि में है।
 पाली और ब्राह्मी  लिपि को पढने  में महारत हासिल करने की कहानी काफी दिलचस्प है। मूलचंद ने बाताया कि शुरूआती दौर में उनकी डयूटी संग्रहालय की वीथिका में लगाई गई थी। तब बर्लिन विश्वविद्यालय की एक वयोवद्व प्रोफेसर संग्रहालय की मूर्तियों का बारीक अध्ययन करने आती थी। साल में पंद्रह दिन वह मथुरा संग्रहालय में रूकती थी। मूलचंद ने बताया कि वे मूर्तियों पर लिखी इबारत पर चढी धूल हटाते थे। प्रोफेसर टार्च की रोशनी में ब्राह्मी लिपि की इबारतें पढ़ती थी।विदेशी महिला को ब्राह्मी लिपि पढ़ते देख  मूलचंद की दिलचस्पी बढ़ी। मूलचंद ने  एक कापी बनाकर  ब्राह्मी लिपि की वर्णमाला के आगे हिंदी वर्णमाला लिख ली। धीरे-धीरे उन्होंने मूर्तियों पर लिखी इबादत को तेजी से पढना सीख लिया। मूलचंद के मुताबिक अब वे ब्राह्मी लिपि में कुछ भी लिख सकते हैं।
 
 
प्राचीन मूर्तियों , मथुरा कला, भारतीय संसकृति और इतिहास की जानकरी रखने वाले शत्रुघ्न शर्मा के मुताबिक मूलचंद की प्रतिभा का कोई सानी नहीं है।लेकिन उसकी प्रतिभा की उपेक्षा हुई है।  कुछ समय  पहले मथुरा म्यूजियम के  निदेशक ने मूलचंद को कलाकृतियों पर खुदी ब्राह्मी लिपि का अध्ययन करते देखकर गुस्सा आ गया था। उन्होंने मूलचंद  की  प्रशंसा करने की वजाय उसे  मूर्तियों की देखरेख के काम से हटा कर साइकिल स्टैंड पर भेज दिया। दरअसल निदेशक को ब्राह्मी लिपि का कोई ज्ञान नहीं था। संग्राहलय आने वाले विदेशी अतिथियों के आगे उन्हें बगलें झाँकने को मजबूर होना पड़ता था .
मूलचंद ने बताया कि इस 2300 साल पुरानी लिपि को सबसे पहले 1839 में जेम्स प्रिंसेप नाम के अंग्रेज ने पढा था। 
2006 में ''ब्राह्मी लिपि के उदभव  और विकास ''  पर  आयोजित गोष्ठी में भाषण देने मथुरा संग्राहलय आए राष्ट्रीय संग्रहालय के महानिदेशक डा. आर.सी शर्मा मूलचंद जैसे अशिक्षित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की प्रतिभा देखकर चौंक गए। उन्होंने मूलचंद के प्रमोशन की भरसक कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली।आर्थिक अभाव के कारण मूलचंद अपने पुत्रों को अच्छी शिक्षा दिलवाने में असमर्थ रहे । रिटायरमेंट के कगार पर खड़े मूलचंद ने अब अपनी तरक्की के सपने देखना बंद कर दिया है.
 
 
फोटो---म्यूजियम में मूलचंद
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