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याद आते है शैलेंद्र

डा. अशोक बंसल 

मथुरा, ‘‘होठों पर सच्चाई रहती है, दिल में सफाई रहती है, ‘‘ मेरा जूता है जापानी,’’ ‘‘आज फिर जीने की तमन्ना है’’ जैसे दर्जनों यादगार फिल्मी गीतों के जनक शैलेंद्र का बचपन मथुरा की गलियों में बीता। तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड से नवाजे गए और अभिनेता राजकपूर की आंखों के तारे रहे शैलेन्द की मथुरा से जुड़ी अनेक यादों का स्मरण कर 90 साल के बाबूलाल की आंखे नम हो जाती है। बाबू लाल शैलेन्द्र के एक मात्र जीवित सहपाठी हैं जो मथुरा के किशोरी रमण इंटर कॉलेज में उनके साथ पढ़े और धौली प्याऊ कालोनी में पड़ोसी रहे। बाबूलाल रेलवे में फोरमैन की नौकरी से रिटायर हुए।
किसी जमाने में मथुरा रेलवे कर्मचारियों की कालोनी रही धौली प्याऊ की गली गंगासिंह के उस छोटे से मकान की पहचान सिर्फ बाबू लाल को है जिसमें शैलेन्द्र अपने भाईयों के साथ रहते थे। सभी भाई रेलवे में थे। बड़े भाई बीडी राव शैलेन्द्र को पढ़ा-लिखा रहे थे। बाबू लाल ने बताया कि मथुरा के राजकीय इंटर कॉलेज में हाईस्कूल में शैलेन्द्र ने पूरे उ0प्र0 में तीसरा स्थान प्राप्त किया। वह बात 1939 की है। तब वे 16 साल के थे। केआर इंटर कॉलेज में आयोजित अंताक्षरी प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे और खूब ईनाम जीतते थे। इसके बाद शैलेन्द्र ने रेलवे वर्कशाप में नौकरी कर ली। बाबूलाल भी रेलवे में लग गए। कुछ दिन मथुरा रहकर शैलेन्द्र का तबादला मांटुंगा हो गया बाबूलाल मथुरा मे ही रहे। 
बाबू लाल ने बताया कि शैलेन्द्र से वे भी मिलने मुंबई जाते रहते थे। वे भी मथुरा आते रहते थे। मथुरा आते ही वे गुनगुनाते थे- ‘‘जहां पर मेरी मथुरा नगरी, वहां पर जमुना जल, तू चला चल’’। अपनी गली गंगासिंह के नुक्कड़ पर बैठकर वे कहते थे- मरने के बाद चरचा होगी तेरी गली में, मरना तेरी गली में, जीना तेरी गली में। बाबूलाल ने बताया कि कुछ साल बाद खबर आई कि शैलेन्द्र ने नौकरी छोड़ दी है। हम मुंबई गए तो उन्होंने पूरा किस्सा सुनाया कि उन्होंने दस गीत लिखे थे। पैसे की जरूरत थी। राजकपूर से एक बार पहले भी मिल चुके थे। दस गीतों के साथ उन्होंने उनसे मिलने का वक्त मांगा। उन दिनों राजकपूर बरसात फिल्म की तैयारी में जुटे थे। तय वक्त पर शैलेन्द्र राजकपूर से मिलने घर से निकले तो घनघोर वारिश होने लगी। कदम बढ़ाते और भीगते शैलेन्द्र के होंठों पर ‘बरसात में तुम से मिले हम सनम’ गीत ने अनायास ही जन्म ले लिया। अपने दस गीत सौंपने से पहले शैलेन्द्र ने इस नए गीत को राजकपूर को सुनाया। राजकपूर ने शैलेन्द्र को सीने से लगा लिया। दसों गीतों का पचास हजार रूपये पारिश्रमिक उन्होंने शैलेन्द्र को दिया। नया गीत बरसात का टाइटिल गीत बना। बाबूलाल ने बताया कि शैलेन्द्र ने नौकरी छोड़ दी और विरार में ‘रिमझिम’ नाम से कोठी बना ली।
एक सवाल के जबाब में बाबूलाल बोले कि उस जमाने में उन्हें याद नहीं कि शैलेन्द्र प्रसिद्ध थे या नहीं, पर मुंबई जाने पर उनकी संपन्नता दिखाई देती थी। उन्होंने कहा मैंने रिमझिम में शंकर जयकिशन को बैठे कई बार देखा। दो गाड़ी थी शैलेन्द्र के पास। एक गाड़ी वे मेरी सेवा में लगा देते थे। एक दिन मालूम पड़ा कि शैलेन्द्र राजकुमार के साथ गाड़ी में बैठकर गए हैं। यह बात उनकी गजभर का घूंघट निकालने वाली पत्नी ने बताई। शैलेन्द्र का विवाह बीना स्टेशन मास्टर की बिटिया से हुआ था। मैं इंतजार में बैठा था। शैलेंद्र ने लौटकर बताया कि राजकपूर को कल एक गीत लिखकर देना है। मैं सो गया और वे पीते रहे। सुबह चार बजे वे उठे और जुहू बीच की ओर निकल गए। वापस आए तो होंठो पर मुस्कराहट थी और हाथ में पकड़े कागज पर गीत लिखा था। बाद में शैलेन्द्र ने बताया कि समुद्र की मचलती लहरें उनके गीतों को प्रेरणा देती हैं।
 
शैलेंद्र ने बाबूलाल को एक बार बताया कि राजकपूर ने तीसरी कसम फिल्म बनाने से उन्हें मना किया था। दरअसल, शैलेन्द्र को फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम बहुत पसंद आई। उन्होंने गीतकार के साथ प्रोड्यूसर बनने की ठानी। राजकपूर और वहीदा रहमान को लेकर तीसरी कसम बना डाली। खुद की सारी दौलत और मित्रों से उधार की भारी रकम फिल्म पर झोंक दी। फिल्म डूब गई। कर्ज से लद गए शैलेन्द्र बीमार हो गए। यह 1966 की बात है। अस्पताल में भरती हुए। तब वे ‘‘जाने कहां गए वो दिन, कहते थे तेरी याद में, नजरों को हम बिछायेंगे’’ गीत की रचना में लगे थे। शैलेन्द्र ने राजकपूर से मिलने की इच्छा जाहिर की। वे बीमारी में भी आरके स्टूडियों की ओर चले। रास्तें में उन्होंने दम तोड़ दिया। यह दिन 14 दिसंबर 1966 का था। मौके की बात है इसी दिन राजकपूर का जन्म हुआ था।
 शैलेन्द्र को नहीं मालूम था कि मौत के बाद उनकी फिल्म हिट होगी और उसे पुरस्कार मिलेगा। 
बाबूलाल ने बताया कि उन्हें न तो गीत तकनीक की समझ है और न साहित्य से लगाव, पर अपने मित्र शैलेन्द्र के गीतों के मुखड़े उन्हें कंठस्थ है। सोते-जागते वे इन्हें गुनगुनाया करते हैं। शैलेन्द्र तीसरी कसम की नाकामयाबी के बाद के बाद मथुरा आए तो बोले यार एक फिल्म बनाने की इच्छा है जिसमें केआर इंटर कॉलेज और अपनी गंगा सिंह गली के दृश्य फिल्माना चाहूंगा। 
शैलेन्द्र की यह इच्छा पूरी नहीं हुई।शैलेंद्र के बेटे शैली श्ैालेंद्र मुम्बई में फिल्मी गीतकार  बने .
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