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महेशखान के घने जंगल में
अंबरीश कुमार 
महेशखान का जंगल वाकई जंगल लगता है ।इस तरह के जंगल देश में अब कम ही बचे है । रामगढ़ से करीब बारह किलोमीटर दूर इस जंगल में जाने पर पांच किलोमीटर का कच्चा पहाड़ी रास्ता घने जंगलों के बीच से गुजरता है ।यह जंगल रामगढ़ के टैगोरे टाप जिसे टाइगर टाप भी कहते है ठीक उसके पीछे  तीन किलोमीटर की दूरी पर है ।महेशखान में जंगलात विभाग का डाक बंगला सौ साल से ज्यादा पुराना है ।यह डाक बंगला वर्ष 1911 में बना था । डाक बंगले के बरामदे में लगे  शिलालेख से यह पता चला ।हालाँकि इस जंगल में पैदल रास्ता कुछ दशक पहले तक था जो अब चार पहिया वाहन के लिए कच्चे रास्ते में बदल चुका है पर मजबूत गाड़ी ही इसपर चल पाती है । डाक बंगले का पुराना चौकीदार प्रताप सिंह पिछले करीब तीन दशक से इस जंगल में है । यहाँ आने वाले अफसरों से लेकर जंगल के जानवरों तक के किस्से सुनाता है । महेशखान के लिए चले तो अपने साथ सविता के भाई भाभी और बच्चे भी थे । उन्हें जाना तो था काठगोदाम पर वाहन की दिक्कत होने की वजह से तय हुआ कि वही गाड़ी हमें छोड़कर उन्हें काठगोदाम स्टेशन पहुंचा देगी । महेशखान में बर्ड वाचर की कोई टीम आई हुई थी इसलिए हम लोगों के लिए ठाह्रने की व्यवस्था शाम चार बजे से थी । तीन बंबू हट बुक कराए गए थे । रामगढ़ के नए पडोसी और महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति और  पूर्व पुलिस महानिदेशक विभूति नारायण राय ,भाभी जी और पुराने पडोसी विजय शंकर चतुर्वेदी भी परिवार के साथ थे । हमें पहले पहुंचना था तो रेंजर को फोन किया  । कोई मिश्रा जी थे जिन्होंने कहा कि हट तो चार बजे ही मिल पाएगा क्योंकि जो लोग उसमे रुके है उनके जाने के बाद सफाई आदि में समय लगता है  । साथ ही यह भी बताया कि डिनर के लिए सामान लेकर आए क्योंकि जंगल में कुछ भी नहीं मिलता है आलू तक लाने के लिए बारह किलोमीटर दूर भवाली जाना पड़ेगा  । हमने बताया कि हट भले बाद में मिले पर हम बारह बजे तक जंगल में पहुँच जाएंगे  । खाने का इंतजाम विजय जी के जिम्मे था वही सब तैयारी किए हुए थे  । गागर से करीब पांच किलोमीटर नीचे उतरने पर बाएं तरफ महेशखन के डाक बंगले का एक बोर्ड नजर आया जिसपर दूरी चार किलोमीटर लिखी हुई थी और ड्राइवर ने गाड़ी कच्चे रास्ते पर मोड़ी तो सामने सड़क पर जंजीर लगी नजर आई और साथ ही एक चेक पोस्ट  । जंगलात विभाग का गार्ड एक रजिस्टर लिए गाड़ी की खिड़की के पास पहुंचा और बोला आपने परमिट लिया है  ,फिर नाम पूछा और रजिस्टर देख कर जंजीर का ताला खोल दिया और हम जंगलों के बीच आगे बढ़ गए  । 
उत्तर से दक्षिण तक जंगलों की कई यादगार यात्रा की है जिसमे बस्तर के जंगल से लेकर केरल के वायनाड के जंगल कभी भी भूल नहीं पाता हूँ  । बरसात में तो यह जंगल अद्भुत नजर आते है  । खास बात यह है कि महेशखान के जंगल में जाने से एक दिन पहले शाम को इतनी बारिश हुई कि राय साहब ने फोन कर पूछा कि कल जंगल में हम अपने काटेज में तो कैद होकर नहीं रह जाएंगे  । पर पहाड़ की बारिश का कोई ठिकाना नहीं होता  बरसने पर आमादा हो तो कई दिन बरसती रहे वर्ना एक दो घंटे में ही आसमान साफ़ हो जाता है । और हुआ भी यही । शाम तक ही मौसम साफ़ हो चूका था । सुबह से ही सविता के भाई भाभी लौटने की तैयारी में जुटे थे जिन्हें दिल्ली जाना था । उनके दोनों बच्चे बगीचे में फल फूलों के बीच मटरगस्ती करने में जुटे थे । करीब ग्यारह बजे नीरज गाड़ी लेकर आ गया और हम महेशखान की तरफ चल पड़े । जंगल की सड़क कच्ची और उबड़ खाबड़ थी ।  दाहिने तरफ जंगल थे तो बाई तरफ पहाड़ । तरह तरह के पक्षियों की आवाज से बच्चों की उत्सुकता बढ़ रही थी । करीब आधा घंटा चलने के बाद ही एक बाड़े में कुछ घर और बंबू हट दिखाई पड़े तो समझ गए कि महेशखान आ गया है । गाड़ी एक बड़े से लोहे के दरवाजे के सामने खड़ी हुई तो देखा समूचा परिसर सत् आठ फुट ऊँचे तार से घिरा हुआ है । यह बाड़ा जंगली जानवरों से बचने के लिए बनाया गया था ,यह जानकारी डाक बंगले के गार्ड प्रताप सिंह ने दी जो गेट पर पहुँच गया था और सामान उतार रहा था । गेट के पास ही किचन का लाउंज रिसेप्शन जैसा नजर आ रहा था इसलिए सब वही बैठ गए । सामने घना जंगल और सिर्फ पक्षियों की आवाज । तभी दो कुत्ते भौकते हुए अपनी तरफ आगे आते दिखाई पड़े । एक सफ़ेद तो दूसरा काला । सफ़ेद वाला छोटा पामेरियन था तो दूसरा काला वाला किसी और नस्ल का । पास आकर दोनों रुक गए  । दोनों बच्चे आदी और मेहुल जो इन कुत्ते के भौंकने से कुछ डरे हुए थे वे अब सहज हुए और फोटो खिंचवाने के लिए सामने आ गए । कुछ देर फोटो खींचने के बाद उन्हें विदा किया गया क्योंकि उन्हें काठगोदाम से ट्रेन पकडनी थी ।उनके जाने के बाद प्रताप सिंह ने सामान बंबू हट में रखवा दिया तो कुछ देर आराम किया गया ।थोड़ी देर बाद उठा तो लैपटाप खोला पर पता चला प्लग में बिजली तब आती है जब जेनरेटर चलता है ।कमरे में एक सीएफएल  
की रोशनी आ रही थी जो सौर उर्जा से चल रहा था ।
लैपटाप चलना नही था इसलिए बाहर आ गए और जंगल का मुआयना करने लगे ।पक्षियों की तरह तरह की आवाज गूंज रही थी ।करीब तीन बजे रामगढ़ से दूसरी गाड़ी पहुंची जिसमे विजय चतुर्वेदी और राय साहब राय साहब का परिवार था ।पता चला जंगल के रास्ते पर गाड़ी ज्यादा वजन नही ले पा रही थी इसलिए राय साहब और विजय करीब दो किलोमीटर पैदल चल कर आ रहे थे ।अब सब लोग इकठ्ठा हो गए तो किचन पर महिलाओं ने क़ज़ा कर लिया और चाय बनाई गई ।रात का खाना बनाकर लाया गया था इसलिए ज्यादा चिंता नहीं थी ।जंगल के बीच का यह इलाका सभी को पसंद आया ।विजय ने डारमैट्री को देख कर कहा जब सोलह लोग इसमें रुक सकते है और बारह लोग बंबू हट में तो अगली कार्यशाला यही पर रखी जाए ।चाय के बाद सभी परिसर से बाहर आ कर घने जंगलों की और चल पड़े ।कुछ दूर पर ही पेड़ पर आना वाच टावर था और हमें वही तक जाना भी था ।बांज चीड और देवदार के जंगल में बने वाच टावर से दूर तक का दृश्य नजर आ रहा था ।करी घंटे भर जंगल म भ्रमण के बाद हम अपने काटेज में लौट आए ।शाम ढल रही थी और अँधेरा गहरा रहा था ।हर काटेज के आगे छोटा सा आरामदा था जिसमे बांस की कुर्सियां पड़ी थी ।सविता पद्मा जी और विजय जी की पत्नी अब खाने की व्यवस्था के लिए किचन की तरफ जा चुकी थी ।पर मै ,विजय और राय साहब जंगल के सामने अपने बरामदे में बैठ चुके थे । विजय शुद्ध शाकाहारी तो है ही दूसरा भी कोई शौक नहीं रखते ।पर हम बैठे और चर्चा के साथ ब्लैक लेवल का दौर चला ।राय साहा पकिस्तान सीमा पर हुई मुठभेड़ के रोचक किस्से सुना रहे थे ।ठंढ बढ़ गई थी और बीच बीच में जंगल से जानवरों की भी आवाज आ रही थी ।कुछ देर बाद खाने का बुलावा आ गया ।विजय जी की पत्नी ने सत्तू के बहुत ही स्वादिष्ट पराठे बनाए थे और दो तरह की सब्जी भी ।खाने के आड़ कुछ देर टहलना हुआ फिर सही अपने अपने काटेज में चले गए ।देर रात एक जंगली जानवर की आवाज से नींद टूटी तो सुः प्रताप ने बताया कि तेंदुआ हमारे काटेज के सामने जंगल में कुछ दूर ही था ।इसके आलावा भौकने वाला हिरन भी लगातार आवाज कर रहा था । अगर समूचा परिसर तार से ना घिरा हो तो जानवर भीतर आ जाते ।ऊपर के डाक बंगले के आसपास बाघ आता रहता है ।बहरहाल महेशखान की यात्रा यादगार रही इसे लिखने का मौका आज रामगढ़ में भारी बरसात के बीच मिला ।कल से अपना समूचा इलाका बादलों से घिरा हुआ है ।बीच बीच में बरसात हो रही है ।इस मौसम में महेशखान का दृश्य वाकई अद्भुत होता ।  
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  • सम्मोहक शरण का अरण्य
  • पत्थरों से उगती घास
  • नैनपुर अब कोई ट्रेन नहीं आएगी
  • शंखुमुखम समुद्र तट के किनारे
  • बदलती धरती बदलता समुद्र
  • सपरार बांध के डाक बंगले तक
  • संजय गांधी ,तीतर और बाबू भाई
  • गांव ,किसान और जंगल
  • छोड़ा मद्रास था, लौटा चेन्नई
  • बरसात के बाद पहाड़ पर
  • कोंकण की बरसात में
  • मार्क्स के घर में
  • समुद्र तट पर कुछ दिन
  • एक फ्रांसीसी शहर में कुछ दिन
  • जंगल के रास्ते हिमालय तक
  • शिलांग के राजभवन में
  • नार्टन होटल में कुछ दिन
  • शहर से दूर साल्ट लेक में
  • झेलम के हाउसबोट पर
  • कोच्चि के बंदरगाह पर
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