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घर की देहरी लांघ स्टार प्रचारक बन गई डिंपल वह बेजान है और हम जानदार हैं ' मुलायम के लोग ' चले गए ! बिगड़े जदयू-राजद के रिश्ते
एक विलक्षण नेता
डा. अशोक बंसल 
आजकल राजनीति और नेताओं का स्तर इतना गिर चुका है कि शरीफ ,संजीदा और समाज में कुछ कर गुजरने की इच्छा  वाले लोग नेता बनने से कतराने लगे हैं . नेतागीरी धंधेखोरों का पर्याय बन गई है. स्मरण करने योग्य बात यह है कि आजादी के पहले नहीं बाद में -स्वतंत्र भारत में - भी  हर शहर में ऐसे महापुरूष राजनीति में सक्रीय रहे जिनके क्रियाकलाप और सोच हमारे लिए आज अनुकरणीय है. ऐसे ही एक महापुरूष थे -वृन्दावन के कन्हैया लाल गुप्त .
मथुरा में जोर-जुल्म की आपातकालीन हुकुमत को जबर्दस्त टक्कर देने वाले कन्हैयालाल गुप्तअपने जीवन की अंतिम संध्या में  वृन्दावन की एक गली में गुमनामी के अंधेरे में रहे और आदर्श के इस जीवंत उदाहरण की सुध ब्रजवासियों ने नहीं ली। शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र में करनी और कथनी में अद्भुत तालमेल स्थापित कर हर किसी को  हैरत में डालने वाले कन्हैया लाल गुप्त को न तो किसी की मदद और न किसी पुरस्कार की दरकार थी। उन्हें आत्मप्रचार से दूर रहने में सुख मिलता था।
कन्हैयालाल गुप्त 1977 में मथुरा के चम्पा अग्रवाल इण्टर काॅलेज से प्राचार्य के पद से रिटायर हुए। वे इस पद पर दस साल तक रहे। वे शिक्षकों के हितैषी थे। आपातकाल में नसबंदी का आतंक शिक्षकों को भी झेलना पड़ा था। तब प्राचार्य कन्हैया लाल ने इसके खिलाफ मोर्चा सँभाला। पूरे शहर में कन्हैया लाल की ईमानदारी और उनके आदर्श चर्चा का विषय रहे।
आपात्काल में कन्हैयालाल का व्यक्तित्व निखर कर सामने आया। तत्कालीन कलेक्टर एम.रंजन ने कन्हैयालाल गुप्त को राजनीति से दूर रहने की सलाह दी लेकिन वे नहीं माने। आपातकाल में जबरन नसबन्दी के हिटलरी आदेश का विरोध करने पर 25 अगस्त 1975 को कन्हैया लाल को मीसा के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। पूरे शहर में कन्हैयालाल की जय-जयकार हुई। साठ शिक्षकों ने उनके समर्थन में गिरफ्तारी दी और छात्रों ने सड़कों पर जुलूस निकाले। 
आपातकाल की समाप्ति पर जनवरी 1977 में सम्पन्न हुए  विधानसभा चुनाव में कन्हैयालाल गुप्त जनता पार्टी के मथुरा से उम्मीदवार बने और रिकार्ड वोटों से जीते। प्रदेश की राजधानी  लखनऊ की राजनीति उन्हें रास नहीं आई। उनसे शिक्षामंत्री बनने के लिए कहा गया। लेकिन वे नहीं माने।
 सन् 80 में उत्तर प्रदेश  विधानसभा भंग हो गई । तब अपनी लोकप्रियता के कारण कन्हैयालाल के पास 44 संस्थाओं के विभिन्न पद थे। उन्होंने सोचा कि राजनीति उनके मतलब की नहीं है। सभी सरकारी और निजी पदों से एक क्षण में मुक्ति पाई और बस गए वृन्दावन में। अन्तिम साँस तक वे वृन्दावन में रहे। वृध्दावस्था में उन्होंने संस्कृत सीखी। संस्कृत का शिक्षक उनकी उम्र से आधी उम्र का था। साठ वर्ष की उम्र तक आदर्श शिक्षक रहे और वृध्दावस्था  में आदर्श छात्र बन गए। 
1934 में कन्हैया गुप्त मथुरा के क्लेंसी इंटर काॅलेज में शिक्षक थे। आज ‘माध्यमिक शिक्षक संघ’ शिक्षकों की महत्वपूर्ण संस्था है। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस संस्था का जन्म मथुरा के ‘चम्पा अग्रवाल इण्टर काॅलेज’ के एक कक्ष मेंकन्हैया लाल गुप्त की पहल से  हुआ था।  इसका पहला प्रादेशिक सम्मेलन  प्रसिध्द  पत्रकार कृष्ण दत्त पालीवाल की अध्यक्षता में इसी काॅलेज में हुआ था। शिक्षकों के हितों की रक्षा में खपे कन्हैया लाल दो बार विधान परिषद में एमएलसी रहे। उनका कार्यकाल 1964 तक रहा। कन्हैयालाल को शिक्षा में सुधार के लिए गठित ‘कोठारी आयोग’ में सदस्य भी बनाया गया।
वृन्दावन में आज टी.बी. सैनेटोरियम का नाम देश भर में है। इस संस्था के संस्थापक कन्हैयालाल गुप्त ही थे। कन्हैयालाल गुप्त को किसी राजनैतिक पार्टी से कोई विशेष लगाव या विरोध नहीं रहा। वह तो गांधी जी के पूर्णरूपेण अनुयायी रहे।
जब वह एम.एल.ए. थे तब मथुरा की डेम्पियर नगर कालोनी में एक कोठी कन्हैयालाल के नाम प्रशासन ने आवंटित कर दी थी। कोठी एक बंगाली विधवा की थी। कलकत्ते  में रहने वाली इस विधवा को अचानक अपने मकान की जरूरत पड़ी। कन्हैयालाल गुप्त से उक्त विधवा ने जैसे ही अपनी जरूरत की बात कहा, उन्होंने एक घंटे के अन्दर कोठी की चाबी मकान मालकिन को सौंप दी।
कन्हैया लाल गुप्त में आदर्शवाद, संघर्षशीलता, ईमानदारी और मानवीयता कूट-कूट कर भरी थी।
यह एक संयोग ही था कि कन्हैयालाल के जन्म की तारीख 2 अक्टूबर है। 1917 में जन्मे कन्हैयालाल अपने आचरण और विचार से     गांधीजी का स्मरण दिलाते थे। मथुरा के लोग उन्हें मथुरा का गांधी कहकर सम्मान देते थे। मथुरा के इस गांधी को नई पीढ़ी जानती नहीं, और पुरानी भूल गई। नौजवान पीढ़ी को प्रेरित करने के लिए कन्हैया लाल गुप्त की स्मृति की रक्षा जरूरी है। हमारे जनपद के शिक्षा मनीषियों का दायित्व है कि वे कन्हैयालाल गुप्त के जीवन की कहानी स्कूल और महाविद्यालय के छात्रों के पाठ्यक्रम में शामिल करें। ऐसा करने से अच्छे जीवन मूल्यों को बल मिलेगा।

 

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