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राख में बदलती जिन्दगी

संजीत त्रिपाठी

रायपुर। बिजली घर आज के समय में कितने जरुरी हैं, यह बताने की जरुरत नहीं लेकिन इन बिजली घरों से निकलने वाली राख अब न केवल प्रदूषण का बल्कि उससे भी आगे मौत का सबब बनते जा रही है। छत्तीसगढ़ के कोरबा, जांजगीर, रायगढ़ आदि जिलों में यह समस्या धीरे-धीरे विकराल रूप धारण करते जा रही है। इन जिलों के औद्योगिक इलाकों में फ्लाई ऐश के पहाड़ कई जगह नजर आते हैं।
दरअसल कोयले से फ्लाई-ऐश का बनना एक प्रकार का औद्योगिक कचरा है। बिजली उत्पादन के दौरान भारी मात्रा में फ्लाई-ऐश निकलती है। लेकिन अत्यधिक मात्रा में निकलने के कारण इसे इकट्ठा करके रख पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा, इसलिए इसके उत्सर्जन के साथ ही इसका इस्तेमाल ही एक मात्र उपाय है।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2013 में देश में 17.5 करोड़ टन राख उत्सर्जित हुई, जबकि इस्तेमाल में सिर्फ 55.6 फीसदी ही लाई गई। छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा और भी अधिक चौंकाने वाला है, जहां सिर्फ 26.97 फीसदी राख का ही इस्तेमाल हो पाया। यह राष्ट्रीय औसत से काफी कम है।
पॉवर प्लांट के करीब 400 किलोमीटर के दायरे में विसर्जित फ्लाईएश में 2.5 माइक्रो ग्राम से भी कम व्यास वाले पर्टिकुलेट मैटर, सल्फर डाइआक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड, वाष्पशील कार्बनिक यौगिक और कार्बन डाइआक्साइड वातावरण में जहर घोल रहे हैं। फ्लाई ऎश के कण पार्टीकुलेट मैटर (पीएम) के रूप में हवा में तैरते रहते हैं। इन अति सूक्ष्म कणों का व्यास 2.5 माइक्रोमीटर से कम होता है, इसलिए उन्हें पी एम-2.5 कहा जाता है और जिनका व्यास 10 माइक्रोमीटर से कम होता है, उन्हें पीएम-10 कहा जाता है। इन कणों में हवा में मौजूद कार्बन मोनो ऑक्साइड, कार्बन डाई ऑक्साइड, लेड आदि घुले होते हैं और इससे यह जहरीला हो जाता है। फ्लाई-ऎश के कणों का पीएम-2.5 का स्तर 60 से अधिक होने पर ये सूक्ष्म कण आसानी से सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंचते हैं और खून में ऑक्सीजन की मात्रा कम कर देते हैं। इससे सांस लेने में तकलीफ होती है। इसकी वजह से श्वसन संबंधी कई बीमारियां होती हैं। आंकड़े बताते हैं कि 1,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन करने वाले संयंत्र में 50 लाख टन कोयले की जरूरत होती है और इसमें से 20 लाख टन राख निकलती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि समस्या कितनी बड़ी है, क्योंकि छत्तीसगढ़ 15,000 मेगावॉट बिजली का उत्पादन करता है। 
वर्ष 2012 में यह मामला विधानसभा में उठ चुका है। तत्कालीन उद्योग व पर्यावरण मंत्री राजेश मूणत ने बताया था कि प्रदेश में उद्योगों से निकलने वाली फ्लाइ ऐश के उपयोग के लिए सरकार कार्ययोजना बना रही है। वर्तमान में इसका उपयोग ईंटें बनाने में किया जा रहा है। उन्होंने यह स्वीकारा था कि फ्लाइ ऐश से बने पहाड़ों में किसी पर भी वृक्षारोपण नहीं किया गया है।
इधर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का कहना है कि रायगढ़ सबसे अधिक प्रदूषित है। प्रदूषण रोकने के मापदंड व सिस्टम फेल हो गए हैं। प्रदेश में कोरबा, जांजगीर, रायगढ़ आदि जिलों से इसी तरह फ्लाइएश निकलती रही तो खनिज के पहाड़ों की जगह फ्लाइ ऐश के पहाड़ दिखेंगे। उन्होंने फ्लाइ ऐश के पहाड़ों पर पेड़ लगाने का सुझाव दिया।
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