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ऐसे हुई एक नदी की मौत

अंबरीश कुमार 

नैनीताल । पहाड़ की एक नदी ने दम तोड़ दिया है । यह किसी के लिए खबर भी नहीं बन पाई यह इसका दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है । यह नदी है श्यामखेत से निकलने वाली शिप्रा नदी । इस  छोटी सी नदी की मौत धीमे धीमे हुई । अब इसके बाद अन्य नदियों की भी बारी है । क्योंकि पहाड़ के ज्यादातर जल स्रोतों पर संकट के बादल मंडरा रहे है । वजह अंधाधुंध निर्माण । खेती बागवानी की जमीन का घटता रकबा और बाजार का बढ़ता दबदबा ।  इसकी वजह से अब छोटी नदियों का अस्तित्व खतरे में है । 
 ज्वलंत उदाहरण है श्यामखेत भवाली की  शिप्रा नदी जिसका मूल स्रोत सुख चूका है और बरसात में यह सिर्फ पहाड़ से गिरने वाले पानी की नकासी का नाला बनकर रह गई है । यह एक नदी की मौत है जो खबर भी नहीं बनी । यह नदी अचानक नहीं ख़त्म हुई बल्कि इसे धीरे धीरे ख़त्म किया गया ।  बीते जून तक तक यह नदी पूरी तरह सूखी हुई थी और इसे देखकर कोई यह कह भी नहीं सकता था कि कभी यहाँ कोई नदी बहती थी । भीमताल से रामगढ़ जाने का रास्ता भवाली की एक छोटी सी पुलिया से गुजरता है जिसे देख यह भ्रम होता है कि यह नाले के ऊपर बनी हुई है । दरअसल यह पुलिया शिप्रा नदी पर बनी हुई है और बीस पच्चीस साल पहले इसमें इतना पानी होता था कि बच्चे और नौजवान तैरते थे । भवाली से जो रास्ता मुक्तेश्वर की और जाता है वह एक दो किलोमीटर बाद ही घने जंगलों से घिर जाता है । चीड ,बांज और  देवदार के पेड़ों का यह घना जंगल जल का भी बड़ा स्रोत रहा है । बरसात में हर दुसरे तीसरे मोड़ पर आपको माम्मोहक झरने नजर आएंगे । पहले यह झरने साल भर दिखते थे पर अब सिर्फ बरसात में नजर आएंगे । वजह जल स्रोतों का ख़त्म होना । आसपास के जल स्रोत यही नीचे के श्यामखेत से निकलने वाली शिप्रा नदी को समृद्ध करते थे और यह आसपास के निवासियों के लिए पीने की पानी का भी सहारा था । भवाली से मुक्तेश्वर जाते समय श्यामखेत की घाटी जो पहले हरीभरी थी अब कंक्रीट का जंगल नजर आती है । पहाड़ के सामजिक कार्यकर्ता भुवन पाठक इसी सड़क से आते जाते रहते है । पाठक के मुताबिक रिहायशी कालोनी और एपार्टमेंट बनाने के चक्कर में पहले शिप्रा नदी की धारा बदली गई और फिर भी बात नहीं बनी तो उद्गम स्थल को भी पाट दिया गया । 
श्यामखेत से ऊपर जाने वाली सड़क से गुजरें तो इस बात की पुष्टि हो जाएगी । समूची घाटी से खेत और जंगल ख़त्म हो चुके है । पहले यह फल पट्टी का इलाका था अब सब एपार्टमेंट में बदल गया है । नदी जिस रास्ते बहती थी वह रास्ता अब कंक्रीट की सड़क में बदल गया है । यह बहुत ही खतरनाक संकेत है । निर्माण काम जिस बेतरतीब ढंग से हुए उससे आसपास के पानी के प्राकृतिक स्रोत सूखते जा रहे है । इसकी वजह से पानी के इन स्रोत पर निर्भर गाँव वालों को अब दूर तक जाना पड़ता है । पिछले एक दशक में जलवायु परिवर्तन के चलते मैदानी इलाकों में गर्मी ज्यादा बढ़ी तो आभिजात्य वर्ग ने पहाड़ की तरफ रुख किया । बड़े पैमाने पर बागवानी की जमीन बड़े बड़े बंगलों और एपार्टमेंट में बदलने लगी है । रामगढ , सतबूंगा से लेकर मुक्तेश्वर तक यह हुआ । निर्माण हुआ तो विस्फोटक का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल और जेसीबी मशीनों का भी । इससे पहले बांज और देवदार के जंगल काट डाले गए । इसकी वजह से गागर के ऊपर के जंगल ख़त्म हुए और फिर पानी के स्रोत ।अब पहाड़ को उजाड़ कर जो कालोनी बनी है उसमे यदि कोई घर ले रहा है तो उसे पानी का इंतजाम टैंकर के जरिए खुद करना पड़ता है । एक टैंकर पंद्रह सौ रुपए का आता है और दो दिन चलता है । इससे पता चल जाता है कि प्राकृतिक संसाधनों से खिलवाड़ की क्या कीमत देनी पड़ेगी । ठीक यही समस्या मुक्तेश्वर से पहले सेब की फल पट्टी सतबूंगा में हुए अंधाधुंध निर्माण से हुई । नैनीताल के वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता राजीव लोचन शाह ने कहा -पहाड़ के परम्परागत जल स्रोत ख़त्म हो रहे है और जंगल की कटाई के साथ अंधाधुंध निर्माण इसकी बड़ी वजह है । इस वजह से छोटी छोटी नदियों पर भी खतरा मंडरा रहा है । कई निर्माण कंपनियां तो जल स्रोतों पर भी कब्ज़ा कर लेती है । इसे लेकर लोग सड़क पर उतर चुके है । 
ऐसे में शिप्रा नदी की मौत एक संदेश भी है और संकेत भी । दो साल पहले तक तो इस नदी के किनारे एक बोर्ड लगा रहता था जिससे पता चलता था कि कोई नदी भी आसपास है । अब तो यह बोर्ड भी हटा दिया गया है । सामने बड़े बड़े एपार्टमेंट बन चुके है और नदी तट पर दुकाने । नदी की जगह जो सुखा नाला नजर आता है वह कूंडे के ढेर में बदल चूका है । नैनीताल में पानी का संकट लगातार बढ़ रहा है । नैनी झील का पानी हो या भीमताल की  झील का ,जून आते आते सभी बहुत नीचे आ जाता है । ऐसे में छोटी छोटी नदियों का अस्तित्व ख़त्म हुआ तो पहाड़ पर ही नहीं मैदान में भी पानी का संकट गहरा जाएगा । sabhar -shukrvaar
फोटो -शिप्रा नदी के उद्गम स्थल पर बसी आबादी 
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