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उजड़ रहे है बुंदेलों के गांव

अंबरीश कुमार 

महोबा  । बुंदेलखंड के गाँव उजाड़ रहे है  । झाँसी ललितपुर से दिल्ली जाने वाली ट्रेन हो या मुंबई या फिर गुजरात की तरफ जाने वाली ट्रेन आजकल अपनी क्षमता से ज्यादा सवारियां ढो रही है  । यह सवारियां किसी वातानुकूलित डिब्बे की नहीं बल्कि जनरल अनारक्षित डिब्बे में लाइन लगा कर चढ़ती है  । गठरी मोटरी से लेकर तीन का पीपा और बोरे में भरा अन्य सामान  । यह क्रम कई दिन से जारी है  । बुंदेलखंड की आबादी करीब चालीस लाख है और पल्स पोलियो के आंकड़ों पर भरोसा करे तो आधी आबादी यानी बीस लाख से ज्यादा की आबादी पिछ्ले कुछ साल में पलायन कर चुकी है ।  एक पलायन सालाना होता है तो दूसरा स्थाई  ।  यह समय सालाना पलायन का है जो मुख्य रूप से दिल्ली ,हरियाणा ,पंजाब ,महाराष्ट,गुजरात के विभिन्न शहरों की ओर हो रहा है । यह सूखे और अकाल की वजह से नहीं बल्कि रोजगार के लिए होता है । यह नजारा झांसी से आगे मध्य प्रदेश की तरफ बढ़ने पर भी नजर आता है  । छतरपुर से बाहर की तरफ जाने वाली बसे इन्ही बुन्देलखंडी मजदूरों से भर कर जा रही है  । आधा बुंदेलखंड खाली हो चूका है पर किसी को भी इस पलायन की चिंता नहीं है  । बुंदेलखंड पैकेज के बाद भी पलायन का नहीं थमना सरकार की योजनाओं पर सवालिया निशान भी लगाते है  । 
महोबा में पानी और चंदेलकालीन तालाब पर काम करने वाले हरिश्चंद ने कहा -जब बुंदेलखंड के नाम पर आए पैसे में से सिर्फ ९७ करोड़ रुपए पिछले कुछ सालों में अफसरों के चाय पानी पर खर्च हो जाए तो पैसे की लूट का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है  । यह जानकारी खुद सरकार ने एक आरटीआई में पूछे गए सवाल के जवाब में दी है  । जिसके मुताबिक बुंदेलखंड के नाम पर जो पैसे आए उसमे बांदा में तेरह करोड़ ,महोबा में आठ करोड़ ,चित्रकूट में बारह करोड़ ,हमीरपुर में चौदह करोड़ ,जालौन में उन्नीस करोड़ ,झाँसी में चौदह करोड़ और ललितपुर में सत्रह करोड़ सिर्फ अफसरों ने चाय पानी पर उड़ा डाले  । 
बुंदेलखंड के ज्यादातर जिलों का दौरा कर ले कही पर भी यह महसूस नहीं होगा की कोई बदलाव आया है । हालाँकि प्राकृतिक संसाधनों की लूट की मामले में उत्तर प्रदेश की स्थिति ज्यादा बदहाल है मध्य प्रदेश के मुकाबले । पिछले एक दशक में उत्तर व्प्र्देश के हिस्से में आने वाले बुंदेलखंड के सभी जिलों में जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों की लूट हुई है वह बेमिशाल है  । हमीरपुर की तरफ से महोबा की तरफ चले तो यह साफ़ साफ़ दिखता है  । पहाड़ को इतना काट डाला गया है कि पहाड़ की जगह खाई बन गई है  । यह काम किया है उस राजनैतिक जमात ने जो सत्ता लके बदलते ही दल भी बदल देती है ।कुछ समय पहले इस संवादाता ने जब महोबा की एक उत्साही कलेक्टर से पूछा कि क्या इस तरह पहाड़ काट देने से जंगल के साथ पर्यावरण का नुकसान नही हो रहा ,तो उनका जवाब थे -इससे से बरसात में इन गड्ढों में पानी भर जाएगा और जमीन रिचार्ज हो जाएगी  । उनके जवाब से पर्यावरण को लेकर नौकरशाही की दृष्टी को आसानी से समझा जा सकता है  । 
बुंदेलखंड पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से सूखे और अकाल से जूझता रहा है और पलायन इसकी प्रमुख वजह भी रही  । पर फिलहाल चंदेलकालीन तालाब बुंदेलखंड के इस अंचल को अकाल से बचाए हुए है वरना हालात और गंभीर होते  । महोबा में यह नजर भी आ जाता है  । यहाँ के प्रमुख तालाबों में मदन सागर ,कीरत सागर ,विजय सागर ,कल्याण सागर और रेहिल सागर में अभी एक चौथाई पानी बचा हुआ है जिससे चार पांच महीने आसानी से कट जाएंगे  । कीरत सागर तालाब से पानी लेने वाले किसान लक्ष्मण ने कहा -अगर यह तालाब ना होते तो समूचा जिला खाली हो जाता  । इसी से खेती किसानी से लेकर मवेशियों का भी पानी मिलता है और पीने नहाने का भी  । पास में कोई नदी भी नहीं है ,इसलिए ये तालाब हम लोगों को बचाए हुए है  । ये सभी ताल तालाब हजार बारह सौ साल पुराने है और उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश दोनों के विभिन्न जिलों में पानी के संकट में काम आते है  । जो लोग अभी बुंदेलखंड में बचे हुए है वह इन्ही तालाबों की वजह से  । पर दुर्भाग्य यह है कि ये तालाब भी रख रखाव के अभाव में जर्जर होते जा रहे है  । महोबा से टीकमगढ़ छतरपुर ,खजुराहो तक चंदेलकालीन तालाबों की बदहाली देखि जा सकती है  ।  
छतरपुर के रहने वाले लेखक और पत्रकार पंकज चतुर्वेदी  का मानना है कि पानी का संकट तो पलायन की वजह है ही पर स्थानीय स्तर पर रोजगार ना उपलब्ध होने की वजह से हर साल इस अंचल से पलायन होता है  । सिर्फ छतरपुर से इस साल अब तक एक लाख से ज्यादा लोग जा चुके है  । समूचे बुंदेलखंड का आंकड़ा तो बहुत ज्यादा है  । पर सरकार अपने आंकड़ों में इसे उल्टा कर देती है  ।  सरकार का दवा है कि पिछले कुछ सालों में साढ़े छह लाख से ज्यादा मजदूरों को मनरेगा में सौ दिन का रोजगार दिया गया  । जिसके मुताबिक बाँदा में 114517,चित्रकूट में 83029 ,हमीरपुर में 129769 महोबा में 45099 जालौन में 115418,ललितपुर में 80790 और झाँसी में 83675 मजदूरों को सौ दिन का रोजगार दिया गया  । पर अखिल भारतीय बुंदेलखंड विकास मंच के महासचिव नसीर अहमद इसे महज आंकड़ों की बाजीगरी मानते है  । अगर इतना रोजगार मिलता तो सिर्फ दिल्ली में  पंद्रह लाख से ज्यादा बुंदेले मजदूर ना रहते  । अन्य राज्यों में  बुंदेलखंड के दस लाख से ज्यादा मजदूर रोजगार के लिए जा चुके है  । 
दरअसल बुंदेलखंड में सबसे ज्यादा संभावना पर्यटन उद्योग और कुछ कुटीर उद्योगों की है  । पर सरकार ने इस दिशा में अबतक कोई ठोस पहल नहीं की है  । मध्य प्रदेश में खजुराहो से लेकर ओरछा जैसे कई पर्यटक स्थल काफी विकसित है  । पर उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड में ऐसी कोई पहल नहीं हुई है  । दरअसल पानी के संकट के चलते बुंदेलखंड में खेती पर ज्यादा निर्भर रहना मुश्किल है   । इसकी एक वजह जलवायु परिवर्तन भी है   ।   
 बुंदेलखंड में पचास साठ के दशक में  दोनों मानसून बंगाल की खाडी और अरब सागर का मानसून इस अंचल को भरपूर पानी देता था और भोपाल से झाँसी के बीच सौ सेंटीमीटर वर्षा रिकार्ड होती थी । पर कुछ ही दशक में जंगलों की अंधाधुंध कटाई के बाद बरसात इतनी कम होने लगी की बुंदेलखंड पिछले डेढ़ दशक में कई बार सूखे औए अकाल का शिकार हुआ । ऐसे में दलहन की खेती बुरी तरह प्रभावित हुई तो मऊ रानीपुर का हैंडलूम उद्योग उजड़ गया  । लगातार अकाल और सूखे की वजह से पलायन तेज हुआ और आज भी जारी है   । साभार -शुक्रवार 
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