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बरसात के बाद पहाड़ पर

अंबरीश कुमार 

टैक्सी वाले ने भवाली के बरसात के बाद पहाड़ पर  बाजार में लकड़ी के टाल वाले परिसर में गाड़ी लगाकर कहा अब आप लोग खरीदारी करके यही आ जाएं तो मै संतोष जी के साथ बाजार में निकल गया धनिया पत्ती लेने के लिए क्योंकि लखनऊ से आंवला लेकर कर आया था और बिना ढंग की चटनी के अपना खाना नहीं होता ।इस बीच लकड़ी के टाल के गेट के पास की दूकान में ताजा रोहू और टेंगन देख कर आशुतोष रुक गए तो हम संकरे बाजार में सामान लेने लगे ।कुल सात लोग लखनऊ से आए थे जिसमे जर्मन संस्थान में काम करने वाली प्रज्ञा दिल्ली से आई थी तो उनकी एक सहयोगी सीधे जर्मनी से रामगढ़  पहुँच रही थी ।इन दोनों लोगों का इंतजाम सीडार लाज में था तो बाकि अपने राइटर्स काटेज के मेहमान थे ।एक अर्ध नेपाली और अर्ध भारतीय खानसामा वरुण साथ था ।  
इधर काफी दिन से दौड़ भाग कुछ ज्यादा हो गई थी इसलिए जब रामगढ़ में तीन दिन के प्रवास का कार्यक्रम बना तो मै तैयार था ।मकसद आराम करना था और कुछ फोटो खींचना ।पहले यह भी तय हुआ था कि सोनू जी भी फोटोग्राफी के मकसद से खुद तो चलेंगे साथ ही कुछ और फोटोग्राफर साथी रहेंगे पर वह कार्यक्रम अचानक रद्द हो गया । पर कई लोग साथ थे । जर्मन की एक टीम थी जो पहाड़ के इस अंचल में महिलाओं की स्थिति का अध्ययन करना चाहती थी ताकि उनके लिए कोई पहल हो सके ।इसलिए तीन प्रतिनिधि जर्मनी के थे जिसमे एक नौजवान एरिक अपने साथ था ।बरसात के बाद पहाड़ बहुत भीगा भीगा सा सीला सा नजर आ रहा था ।हर्जेंडिया के फूल पेड़ में लगे लगे सूख गए थे और गर्मी में फल फूल से आबाद रहने वाला अपना राइटर्स काटेज जंगल में तब्दील हो चूका था ।चौकीदार करण ने घास फूस की कटाई तो कर दी थी पर जब कोई तीन महीने तक घर में ना हो खासकर बरसात के मौसम में तो घर भी सीलन का शिकार हो जाता है ।जिसमे नीचे का हिस्सा जो पेड़ पौधों के बीच है वह ज्यादा प्रभावित हो जाता है ।और वही हुआ था ।पर एक दो घंटे की मस्स्कत के बाद माहौल ठीक हुआ तो शाम ढल चुकी थी ।कुछ देर बाद ही एरिक ने प्रोस्त प्रोस्त के साथ ग्लास दे दिया ।संतोष और आशुतोष रोहू से जूझ रहे थे वे फ्राई करने में जुटे थे और उसके बाद का काम मेरा था ।बड़ा झमेला होता है मछली बनाने की जिम्मेदारी उठाना पर मैंने कह रखा था सब तैयारी होने के बाद किचन में आऊंगा ।इस बीच वरुण ने सबकुछ तैयार कर दिया था इसलिए दिक्कत नहीं हुई ।देर रात तक दावत चली और चर्चा होती रही ।रास्ते में प्रज्ञा ने पकिस्तान में कला संगीत की बदहाली पर एक डाक्यूमेंट्री दिखाई जो वाकई अद्भुत थी ।एक उपन्यास लेकर आया था पर पढ़ नहीं पाया और एक लेख लिखने की तैयारी थी पर वह भी धरा रह गया ।एकदम बच्चों के होम वर्क की तरह ।
रात नींद आई तो सुबह साढ़े पञ्च बजे ही नींद खुली ।केतली में चाय का पानी डाला तो आशुतोष की आवाज आई कि वे भी चाय लेंगे ।चाय के साथ नेट पर बैठा और सामने की खिड़की से पर्दा उठाया तो सीसे पर ओस की बूंदें ठहरी हुई थी ।ठंड भी ठीकठाक ।सामने की पहाड़ी पर बादल भी थे इसलिए हिमालय देखने का विचार त्याग दिया ।वैसे भी पहाड़ पर सन्नाटा है ।वीकेंड को छोड़ सैलानी नही आते है ।सीडार से लेकर हेरिटेज तक खाली पड़ा था ।कुछ देर टहल कर वापस नेट पर आया तो देख दिनेश शाक्य ने आज नवभारत टाइम्स में प्रकाशित विदर्भ पर अपना लेख टैग किया हुआ है ।यहाँ नेट की रफ़्तार को देखते यह सब बहुत कठिन होता है ।तभी राजेंद्र चौधरी का फोन आया और बोले आपने बताया नहीं कि पहाड़ पर जा रहे है ।कुछ देर बात हुई उसके बाद बगीचे को देखने लगा ।जो रात में कुछ ज्यादा ही रहस्मय और भूत बंगला जैसा लग रहा था ।
 
 
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