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अब चाहिए सप्तक्रांति

डॉ. सुनीलम्

नई दिल्ली । स्वतंत्रता आंदोलन, गोवा मुक्ति आंदोलन, समाजवादी आंदोलन के नायक समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया 57 वर्ष की अल्प आयु में पौरूष ग्रंथी के छोटे से आपरेशन में लापरवाही (कुछ लोग इसे हत्या का षडयंत्र भी मानते है) के चलते निधन हो जाने के कारण हमारे बीच मे नही है। 12 अक्टुबर 1967 को उनकी मौत विलिंग्टन अस्पताल दिल्ली (जिसे अब लोहिया अस्पताल कहा जाता है) में हुई थी। डॉ. लोहिया को गैर कांग्रेसववाद का जनक माना जाता है। उन्होनें कांग्रेस के साम्राज्य को खत्म करने के लिए रणनीति के तौर पर व्यापक एकजुटता बनाने का आव्हान किया था। जिसके परिणाम स्वरूप आजादी के बाद पहली बार 1967 में सात राज्यों में संविद सरकारे बनी। 1977 में पहली बार गैर कांग्रेस जनता पार्टी की सरकार दिल्ली पर काबिज हुई। उसके बाद तो राज्यों मे और केन्द्र में यह सिलसिला लगातार चलता रहा। आज देश के 29 राज्यो में से गिने चुने राज्यो मे ही कांग्रेस की सरकार है। गैर कांग्रेसवाद की देश में विकसित हुई भावना का इस्तेमाल कर कांग्रेस मुक्त सरकार का नारा देकर भाजपा-एनडीए की सरकार दिल्ली में लगभग 5 माह पूर्व सत्तारूढ हो चुकी है। 
पुण्यतिथि के अवसर पर डॉ. लोहिया का भारतीय राजनीति और समाज पर असर को समझना अच्छा होगा। कट्टर लोहियावादी कहेंगे कि डॉ. साहब का सपना अब साकार हो चुका है, क्योकि केन्द्र और राज्यों में अधिकतर सरकारें गैरकांग्रेसी पार्टियों की है। डॉ. लोहिया का लक्ष्य कभी भी केवल सरकार बनाने तक सीमित नही रहा। जब संविद सरकारों की शुरूआत हुई तब उन्होने बाकायदा सरकार कों छः माह के भीतर ऐसे जनवादी कार्यक्रमो को लागू करने का सुझाव दिया जिनसे मतदाताओं को यह महसूस हो सके की वास्तव में सरकार बदली है तथा उनके जीवन में तब्दीली आई है। क्या डॉ. लोहिया कि इस कसौटी पर देश की गैर कांग्रेसी सरकारों को जांचने-परखने के बाद यह कहा जा सकता है कि डॉ. लोहिया का सपना साकार हुआ? शायद नही! डॉ. लोहिया के निधन के बाद बनी राज्य सरकारो तथा केन्द्र सरकारों का अलग अलग मूल्यांकन करना एक लेख में संभव नही है। लेकिन मोटे तौर पर यह कहां जा सकता है कि डॉ. लोहिया नें अपने जीवनकाल में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के जो चुनावी घोषणा पत्र तैयार किए तथा पार्टियो के जो नीति कार्यक्रम बनाए। उन्हे इन सरकारों ने लागू नही किया। डॉ. लोहिया ने तो केरल में अपनी सरकार द्वारा एक बार गोली चालन कराने पर उससे इस्तीफा मांग लिया था। लेकिन गैर कांग्रेसी सरकारों ने कभी गोली चालन को इतना महत्वपूर्ण भी नही माना कि कानून तौर पर निर्दोश निहत्थे नागरिकों के आंदोलनों पर पुलिस गोली चालन पर कानूनी प्रतिबंध लगाया जाए। जबकि आजादी के बाद से अब तक हजारो नागरिक पुलिस गोली चालन में मारे जा चुके है।
डॉ. लोहिया ने समाज-देश-दुनिया में हो रहे सात अन्यायों के खिलाफ सप्तक्रांति करने का बीडा उठाया था। वे देश तथा दुनिया में हो रहे आर्थिक शोषण-लूट-गैरबराबरी को समाप्त करना चाहते थें। लेकिन सरकार भले ही बदलती रही हों लेकिन देश और दुनिया में गैरबराबरी लगातार बढती चली गई। डॉ. लोहिया ऐसी दुनिया का निर्माण करना चाहते थे जिसमें गैरबराबरी एक और दस के अनुपात से अधिक न हो। लेकिन हमारे मुल्क में जहां एक तरफ 80 करोड आबादी 20 रूपये प्रतिदिन पर जीवन यापन कर रही है। वहीं दुसरी ओर दुनिया में सबसे तेजी से अमीरो की संख्या बढती जा रही है। देश और दुनिया के स्तर पर गिने चुने 500 परिवारों तथा 500 बहुराष्ट्रीय कंपनीयों के पास दुनिया की 70 प्रतिशत से अधिक संपत्ति का केन्द्रकरण हो चुका है। ऐसी स्थिति में संभव बराबरी का सवाल हम सबके सामने बडी चुनौती के तौर पर मौजूद है। समाजवादियों को गैरबराबरी के खिलाफ बडा संघर्ष छेडने की जरूरत है। 
डॉ. लोहिया ने समाज में जाति, लिंग और रंग के आधार पर भेद को मुख्य नाईसाफि के तौर पर देखकर सप्तक्रांति में शामिल किया था। यह सही है कि जिस किस्म के तथा जिस तरह के भेद भाव डॉ. लोहिया के जीवन काल में देखे जाते थे, वैसे आज कम हुए है, लेकिन क्या हम कह सकते है कि जाति, लिंग और रंग के आधार पर भेद भाव समाप्त होने की दिशा में बढने की हमारी गति इतनी तेज है. कि आने वाले 50 सालों में भी हम भेंदभाव मुक्त देश और दुनिया का निर्माण कर सकेगें। यह सहीं है कि जिन जातियों के साथ हजारो वर्षो से भेदभाव किया जाता रहा वें एकजुट तथा जागरूक हुई है। डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर के प्रस्ताव पर संविधान में अनुसूचित जाति एवं जन जातियों को उपलब्ध कराए गए आरक्षण के प्रावधानों तथा डॉ. लोहिया द्वारा पिछडी जातियों एवं महिलाओं के लिए आरक्षण की मुहीम के परिणाम स्वरूप आरक्षित जातियों की आर्थिक, सामाजिक स्थिति में बदलाव अवश्य आया है। लेकिन आरक्षण के प्रावधानो के बावजूद हम भेदभाव समाप्त करने में असफल रहे है। डॉ. लोहिया इसे दिमाग की बनावट तथा हजारो साल के संस्कार से जोडकर देखते थे तथा सोचने के तरीके में बदलाव लाने के लिए द्रोपदी या सावित्री जैसे सवाल समाज में खडे किया करते थे। बढती महिला हिंसा की शर्मनाक घटनाए यह बतलाती है कि समाज महिलाओं को अभी भी मानवीय गरिमा हासिल नही हुई है। समता की बात तो बहुत दूर है। अमरीका, यूरोप और आस्ट्रेलिया में भले ही तमाम सख्त रंगभेद विरोधी कानून क्यो न बने हो लेकिन रंग के आधार पर भेद आज भी कायम है। रंगीन चमडी के लोगो को गोरी चमडी के लोगो के समान देखने की दृष्टि पश्चिम मुल्कों में भी अब तक विकसित नही हो पायी है। लेकिन डॉ. लोहिया के जमाने की तुलना में अब जमीन आसमान का अंतर आ गया है। जिस अमरीका में डॉ. लोहिया को रंगीन चमडी का होने के कारण सांसद होने के बावजूद कैफेटेरिया में नही घुसने दिया गया था, जिसके चलते उन्होने सत्याग्रह करना पडा था। उस अमरीका में आज अष्वेत राष्ट्रपति ओबामा राष्ट्रपति पद पर आसीन है तथा दक्षिण अफ्रिका में नेलसन मंडेला के रंगभेद विरोधी आंदोलन की जीत के बाद वहां भी अश्वेतों की सरकार कायम हो चुकी है। 
डॉ. लोहिया ने शस्त्र हिंसा के माध्यम से समाज में वर्चस्व कायम करने की प्रवृत्ति को सात नाईसाफियों में शामिल किया था। आज अमरीकी साम्राज्यवाद दुनिया में शस्त्र हिंसा का नंगा नाच कर रहा है। सद्दाम हुसैन को शस्त्रो के दम पर सत्ताचुत करने के बाद ईराक को अमरीका नें बर्बाद कर अपने कठपुतली सरकार बना ली तथा अमरीकी कंपनीयों को लूट के लिए ईराक सौप दिया। अंतराष्ट्रीय समुदाय के दबाव के चलते सैनाओं को वापस लौटना पडा लेकिन आज भी ईराक पर हमले जारी है। दुसरी तरफ अलकायदा एवं अन्य आईएसआईएस जैसे जि़हादी कट्टर ईस्लामिक संगठनों के लडाके ईस्लामिक राज स्थापित करने के लिए हर संभव हिंसा करने पर आमादा है। इंज़राईल द्वारा गाजा पट्टी को कब्जे में बनाए रखने के लिए 1400 फिलीस्तिनी निर्दोष नागरिकों को मिसाइलो तथा बमो का शिकार बनाया जा चुका है। भारत में भी सरकारे बन्दुक के दम पर राज कर रही है। आजादी के बाद पुलिस गोली चालन में 80000 से अधिक निर्दोष नागरिक मारे जा चुके है। कशमीर और पूर्वोत्तर में आर्मस फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट जैसे कानून ईरोम शर्मिला के 14 वर्ष के अंनशन के बावजूद आज भी लागू है। देश और दुनिया में हिंसाचार बढा है। भले ही तीसरा विश्व युद्ध न हुआ हो। नाभकीय विधंव्स से दुनिया के अस्तित्व को खतरा आज भी बरकरार है। पूरी दुनिया में शस्त्रों की होड चरम पर है। नाभकीय एवं पारंपरिक शस्त्र मुक्त दुनिया का निर्माण आज भी सपना बना हुआ है। 
डॉ. लोहिया नें सप्तक्रांति में निजता के अधिकार को शामिल किया था। मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. यु. आर. अनंथमूर्ति ने लोहिया जी की जन्म शताब्दी पर आयोजित कार्यक्रम में निजता के अधिकार को सप्तक्रांति में शामिल करने को डॉ. लोहिया का इतिहास में सबसे बडा योगदान माना था। निजता का अधिकार आज भी कागजों तक सीमित है। विचारो की, कपडे पहनने की, आस्था रखने की, यहां तक की इच्छा से प्रेम करने तक की आजादी लगातार सीमित होती जा रही है। लव जेहाद के नाम पर आरएसएस समर्थक संगठनों ने जिस तरह का बवाल शुरू किया है, उससे साफ है कि समाज की कटठ्र पंथी ताकते प्रेम को भी सीमाओं में बांधने को आमादा है। बजरंगियो द्वारा वेलेन्टाइंड डे पर देश भर मे जिस तरह का उत्पात मचाया जाता है उससे यह और अधिक स्पष्ट होकर सामने आ रहा है। देश में बढती बलात्कार की घटनाओं पर देश के शीर्षस्थ नेताओ के बयान, बलात्कारियों को आजीवन कारावास दिलाने की बजाय लडकियों को सलीके से कपडे पहनने तथा रात के समय घर से बाहर न निकलने की सीख देते सुने-पढे जाते है। ईस्लामिक कट्टरपंथियो द्वारा लडकियो को घर से न निकलने, स्कुल न जाने के फतवे जारी किए जा रहे है। जिसका विरोध करते हुए मलाला जैसी छोटी बच्ची को भी जानलेवा हमले झेलने पड रहे है। विचार की असहमति की गुजाइंश लगातार सिकुडती जा रही है। पूणे में जिस तरह से हिन्दू राष्ट्र सेना के कार्यक्रर्ताओ द्वारा एक युवा की उसकी तथाकथित आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर हत्या कर दी गई। डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर की अंधविश्वास के खिलाफ मुहीम चलाने के कारण हत्या कर दी गई। यहां तक की फेसबुक पर विभिन्न विचार रखने वाले लोगो पर मुकदमं दर्ज कर उन्हे गिरफतार किया जा रहा है। हाल हीं में बडवानी जिलाधीश की आश्चर्यजनक प्रेस विज्ञप्ति नर्मदा घाटी संवाद यात्रा के दौरान पढने मिली जिसमे लिखा था की फेसबुक, ट्व्विटर, व्हाट्सएप पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने पर धारा 144 के तहत कार्यवाही कर गिरफतार किया जाएगा। संचार क्रांति ने भी सरकारों, कंपनियों तथा ताकतवर लोगो को इतनी बडी शक्ति प्रदान कर दी है कि कोई भी व्यक्ति फोन, एसएमएस, मेल या किसी भी अन्य साधन से जो बात करता है, उसे गुप्त नही रखा जा सकता। स्टिंग आपरेशन के दुरूपयोग ने नागरिकों की निजी जिंदगी में पूरी तरह अतिक्रमण कर लिया है। युआईडी के माध्यम से (आंख और उंगलियों के निषानों के माध्यम) से नागरिकों की निजता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। 
संक्षेप में कहा जाए तो देश और दुनिया में सात नाईंसाफिया सैकडो नाईंसाफियो में तब्दील हो चुकी हैं। डॉ. लोहिया इन नाईंसाफियों के प्रतिरोध में बदलाव की संभावनाए देखते थे। हम सबको इन नाईंसाफियों के खिलाफ संघर्ष तेज करने की जरूरत है। क्या हम इसके लिए तैयार है?
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