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संस्था, समाज और कार्यकर्ता का स्वधर्म

अनुपम मिश्र 

नई दिल्ली ।बीते  21 नवम्बर  को सैडेड ने आईआईसी सभागार में अनुपम मिश्र ने ‘संस्था, समाज और कार्यकर्ता का स्वधर्म‘ विषय पर एक व्याख्यान आयोजित किआ था जो बहुत ही महत्वपूर्ण है आज के सन्दर्भ में । इस व्याख्यान और उसके बाद हुए सवाल जवाब को रिकार्ड किया गया था जिसे हम यहां दे रहे है -
अनुपम मिश्र -हम सब किसी ने किसी संस्था से जुड़े हैं, किसी के मन में समाज की दुर्दशा है तो किसी के मन में टूट-फूट की दिशा है। किसी के मन में समाज में आई गिरावट पर कुछ सेवा करने की इच्छा है और कुछ के लिए ये एक नौकरी है; पर नौकरी पक्की है कि यही काम करना है। बदलने के अच्छे कारण हो सकते हैं कि सत्य की रक्षा करनी है, अस्मिता बचानी है। कभी साधनों की स्वच्छता की बात आती है पर मोटे तौर पर हम संस्था वाली बात पर परिक्रमा करते हैं। हम टाटा-बाटा की जगह नहीं जा सकते हमें यहीं रहना है और संस्था की दुनिया को छोड़कर कहीं नहीं जाना। किसी के लिए ये जीने-मरने का सवाल है कोई चालीस वर्ष से इस काम को करने वाले होंगे तो कोई 2-5 वर्ष के; तो पर इनमें अनुभव की कमी किसी में नहीं होगी। समाज के बारे में सबकी अपनी परिभाषाएं हैं। समस्याओं से जुड़ने के तरीके अलग-अलग होंगे किसी को लगा होगा कि युद्ध है। कुछ जगह तो रणनीति का प्रश्न भी आता है तो युद्ध क्षेत्र की तरह भी देखते हैं लेकिन मैं ऐसा कुछ कर नहीं पाया। मुझे 1969 में गांधी शांति प्रतिष्ठान में नौकरी मिली। कभी गांव गए, कभी शहर गए तो मन में कुछ बैठा। 3-4 साल बाद मध्य प्रदेश जाने को मिला वहां मैं गांधीवादी बनवारी लाल चैधरी से मिला। उनकी संस्था का नाम ‘ग्राम सेवा समिति‘ था। साफ-सुथरा आश्रम था। मैं मजाक में कहता उस आश्रम का कचरा भी फोटो खींचने लायक था। ढ़ेर से फूल-पत्ते होते थे उस कचरे में। 
वहां साधारण काम भी होते थे लेकिन संस्था के बारे मंे उनकी राय अच्छी थी तो सीखने लायक काम समझ में आया। वो था “पहले जोर देते दोे संस्था के आकार पर और उसका आकार  जितना छोटा से छोटा हो, कार्यकर्ता जितने कम से कम हो सकें बेहतर और बजट जितना कम हो अच्छा। बाद में संस्था जिस तरह से विकास करे वैसा बढ़ो ऐसा नहीं बल्कि बाद में उसे और भी कम करो क्योंकि यदि आप अच्छा काम कर रहे हैं तो प्रभाव के बाद उद्देश्य पूरा हुआ तो संस्था को बंद करो।” इससे लगा कि टाॅलस्टाॅय की एक कहानी कि एक आदमी को अच्छे विचार को फैलाने के लिए कितनी जमीन चाहिए। हम अपने विचार को अच्छा मानते हैं। उनकी इच्छा है कि बड़ी जगह पर संस्था बनाई जाए। बाद में सब खंडहर बनने लगता हैं, यदि हम गांव में होते हैं तो बड़ी सी जमीन पर बने और बड़ा कैम्पस हो तथा जिनके लिए काम करते हैं वो भी लाइन में आएं और बाद में वो खंडहर बन जाता है। 1969 में 4-5 करोड़ की सर्वोदय की संस्थाएं चलती थी पर आज उनकी कोई उपस्थिति नहीं बची। 
हम जिन चीजों की बुराई करते हैं उसमें है ‘काॅरपोेट‘ और उनके मन में ये रहता है कि कैसे दूसरे को रांेदकर आगे बढ़ें। उसमें बजट, आकार, संस्था बढ़ना आदि शामिल होते हैं। यदि वो जिले से निकलें हैैं तो राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचना चाहते हैं और फिर अंतर्राष्ट्रीय बनना चाहते हैं। शादी कराने वाला छोटा सा संगठन रैगरपुरा से निकला और अमेरिका तक चला गया आप सब ने दिल्ली की सड़कों में उसका नाम देखा होगा लिखा हुआ ‘ब्रांचेज इन अमेरिका एंड कनाडा 6 रैगरपुरा, करोलबाग, प्रो. अरोड़ा‘। तो धीरे-धीरे संस्थाओं में विवाद चलता है, केस लड़े जाते हैं। बजट कम होता जाता है लोग 9 बजे से-5 बजे तक काम करते हैं फिर नेतृत्व बदलने का समय आता है। तो फिर जूते घिस जाते हैं और फिर जब वो जूते पूरी तरह से घिस जाते हैं तो वो दूसरे को दे दिए जाते हैं। हम रंग-बिरंगी वार्षिक रिपोर्ट बनाते हैं फिर भी हम संस्था की मूर्ति को सजाते हैं दूसरों की प्रशंसा नहीं मिलती इसलिए अपनी प्रशंसा पर लगते हैं। धर्म में दो पर्व आते हैं जैसे कि एक स्थापना का और एक विनाश का। गणेश चतुर्थी में गणेश की प्रतिमा घर में स्थापित की जाती है और फिर कुछ दिन बाद उसे विसर्जित कर दिया जाता है लेकिन किसी संस्था में विसर्जन का पर्व नहीं आता। लेकिन इन त्यौहारों से सीखा जा सकता है तो उससे विसर्जन की प्रेरणा मिलती है। यदि हम विसर्जन न करें तो उन संस्थाओं का विसर्जन अल्ला मिंया करते हंै। 
इसमें कोई शक नहीं समाज जीवंत है। समस्याएं आएंगी और जाएंगी राज बदल जाएं उसकी पद्धति बदल जाए तो कभी कट्टर विचार ऊपर-नीचे आ जाते हैं। सोशल साइट (सामाजिक माध्यमों) से अनसोशल (असमाजिक) काम होते हैं। सरकार कीअ ओर से गेजेट आती हैं तो जब इतनी सारी संस्थाएं कुछ नहीं कर पाईं तो एक संस्था क्या कर लेगी तो बड़ी संस्थाएं बनाएं लेकिन कैसी बनें और किसी की बात कैसे उठानी है उसके लिए संयम और आवेश है। बचपन बचाने से वृद्धों को बचाने के कारण तो हैं पर वो जिस अर्थनीति के कारण हैं उनपर चोट किए बिना आप उनको नहीं बचा पाएंगे। स्वस्थ समाज को संस्थाओं की जरूरत नहीं होती लेकिन हमारा समाज अपनी इम्यूनिटी और टीकाकरण को देखता है। कमजोर हो जाएं तो सहारे की जरूरत हैं अब किसी का पैर टूट जाए तो उसका भी सैलिबिरेशन होता है इसके लिए प्लाटर पर आने-जाने वाले लोग साइन करते हैं फिर उसे काटते हैं और जरूरत पड़ने पर लाठी भी लेते हैं फिर फोटो खींचते हैं और उसे फेस बुक में डालते हैं। इसलिए संस्था का सर्जन जरूर करें। हमारे सामने प्रश्न नहीं आया कि हमारी संस्था से बड़ी संस्था है और वो क्या है वो एनजीओ से बड़ा जीओ है सरकार ये वादा करती है कि वो 5-6 लाख लोगों की सेवा करेगी। उसके पास बड़ी संख्या में साधन और कर्मचारी होते हैं लेकिन इतनी बड़ी संख्या की फौज को भी गिरने में वक्त नहीं लगता। प्लानिंग कमीशन बदला तो संस्था भी बदल गई तो जब उतनी बड़ी संस्था कुछ नहीं कर सकती तो हम कैसे करेंगे। अंग्रेजों ने धर्म के नाम की संस्था को रजिस्टर करने की प्रथा शुरू की। आज आप राज्य को जानकारी दिए बिना उससे प्रमाण पत्र लिए बिना कोई संस्था शुरू नहीं कर सकते पर पहले राजा के समय में आप ऐसा कुछ भी अपनी मर्जी से कर सकते थे। अभी मैं आपको कुछ चित्र दिखाऊंगा जिससे पता चलता है कि लोग बिना किसी मदद के, बिना किसी सहारे के अपना काम खुद कैसे करते हैं। 
इन चित्रों में लगा कि समाज से बढ़कर कुछ नहीं। रेगिस्तान में सबसे कम पानी गिरता है, गहरा है, खारा है पर हर गाव में पीने के पानी का इंतजाम हुआ और वो हुआ ‘समाज की अपनी ताकत से‘। 30,000 गांवों में इतने साल में पानी कमीशन अगर सरकार बनाती तो कितना बजट होता, कितने कर्मचारी होते तो इन्होंने लोगों को अपने-अपने समाज के लोगों को सिखाया। जनभागीदारी की आत्मा को पकड़कर काम किया। योजना बनाओ और उसे जमीन पर उतारने का काम भी सब खुद किया। जहां पानी की सबसे ज्यादा कमी थी वहां व्यवहारिक काम किया। इसमें राजनीति समाजशास्त्र, विज्ञान हैं समता और ममता के सारे विचार हैं। इन चित्रों में:
पहले चित्र में बहुत दूर तक फैला थार का रेगिस्तान दिखता है इसको देखकर लगता ही नहीं कि यहां पर कहीं पानी होगा। 
दूसरे चित्र में रेगिस्तान का विस्तार दिख रहा है, उसमें काले-काले कूड़ा दिख रहा है। ये बकरी और भेड़ की मेंघनी है। इससे स्पष्ट होता है कि यहां पर जीवन है और उसे पानी चाहिए। इस पशुधन का इंतजाम न राज को सौंपा गया और न ही संस्था को। 
ये चित्र एक इमारत का है जो कि एक स्कूल है इसका नाम राजीव गांधी के नाम पर रखा स्कूल है पर इसमें कोई पढ़ने नहीं आता ये इमारत बहुत ही कमजोर है। 
इस चित्र में एक पानी मीठे का कुंआ दिख रहा है। 1000 किलोमीटर तक कोई कुंआ नहीं है और मवेशी यहां पानी पीने आते हैं। यहां मवेशी खुद आते हैं। यहां दूर घास दिख रही है लेकिन पानी के कुंए और चारे एवं खाने के बीच में बहुत अंतर है ताकि जो पशु कुंए से पानी पीकर दूर घास खाना खाने जाए तब तक कुंआ रीचार्ज हो और जब वो पानी पीकर घास खाने आएं तब तक घास भी बड़ी हो जाए। वहां पर एक चरवाह सब पशुओं को लाता है।
इस चित्र में गिरी चल रही है, घूण कहते हैं एक ऊंठ की जोड़ी है इसे 400-500 साल पहले लोगों ने मिलकर बनाया होगा। इसमें कितना साइंस होगा। 
इस चित्र में बीच में रस्सी है वो आधी सीधी है और उसके आगे हल है बीच में कांटा लगा है जिसे किल्ली कहते हैं। 
ये चित्र किल्ली का है ये हिरण की सींग की होती है। इसे खिल्ली से जोड़ कर न रखें तो ऊंच-नीच हो जाएंगे तो उसे खोल देते हैं ताकि ऊंठ पीछे हो जाए। हिरण की सींग से ये खिल्ली बनाते हैं। हड्डी में लोच होती है इसलिए जल्दी नहीं टूटती। 
ये चित्र सागर नाम के इलाके का है इसका सर्वेक्षण भारत के सर्वेक्षण विभाग से नहीं हुआ। यहां पर एमएलए नहीं होते केवल पानी होता है और उसे खींचने का इंतजाम समाज करता है। 
ये चित्र हाबूर पत्थर का है। हाबूर गांव में ही मिलता है। ये पानी के साथ दोस्ती करता है। कड़े पानी को नर्म बनाता है, घिसता नहीं है। इसके टुकड़े करके भूगर्भीय शास्त्रियों को दिया पर कोई जवाब नहीं मिला जो समाज ने इसके गुण देखकर चिन्हित किया। 
ये चित्र हाबुर पत्थर से बनी कुंई है का है, इसमें बेरी हंै। ये हाबुर के पत्थर से बनता है। 
ये चित्र रामगढ़ के पास के तालाब का है इसका नाम बिपासर है (साइट सलैक्शन)। समाज ने सोच-समझकर इसका काम किया। 
इस तालाब के चित्र को देखो इसमें नीचे जिप्सम की परत है। सूखे तालाब में पट्टी पर पानी के निशान हैं। इस इलाके में 7 मिमी पानी गिरा है। यहां कोई एजेंसी नहीं है पर जिप्सम के कारण पानी नीचे अटक जाता है और रेत में जाता है। इस ढ़ांचे में जिप्सम नमी से टकराकर पानी बनता है। इस गांव में 23 बेरियां हैं और 30 फुट का काॅलम है। 
ये स्तंभ का चित्र कोई मंदिर नहीं। ये खेत की मंदिर नुमा है। ये 7 एमएम पर है इसके नीचे भी जिप्सम है इस इलाके में यह मेट कहलाता है। इस खेत में स्वामित्व का विसर्जन कर दिया। इस इलाके में जो रहते हैं उन सभी व्यक्तियों का इस खेम में काम का हिस्सा होता है और प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति यहां पर काम करने आता है। इसमें सर्वश्रेष्ठ गेहूं पैदा होता हैं। इसमें खाद भी नहीं जाती बल्कि मेमनी का मिला हुआ पानी आता है और वो भी शुद्ध वाला। इस खेत की पैदावार के बंटवारे के भी अच्छे नियम है ताकि बंटवारे में अन्याय न हो। ये यहां पैदा अनाज को बेचते नही हैं बल्कि अपने और अपने मेहमान के खाने के लिए रखते हैं। जहां जिप्सम खत्म होगा वहां खडीम खत्म हो जाए तो वहां ये खेत खत्म हो जाते हैं तो ये सब बिना किसी पीपुल साइंस के संभव हुआ। 
ये चित्र ऊंट गाड़ी का है।
इस चित्र मंे दिख रहा है कि यहां ऊंट गाड़ी के टायर को छांव में रखा गया है, ये टायर जहाज के टायर हैं। 
ये एक दुखद चित्र है ये सरकार की छवि को दिखाता है ये सरकार के ‘सबके लिए शिक्षा‘ के नारे को दिखाता है। इसे ओपन स्कूल का नाम दिया जा सकता है क्योंकि यहां न तो कोई दीवार है, नही कुछ है खाली मैदान है और उसके आगे दरवाजा लगा दिया गया है, न तो कमरे हैं न बच्चे और न अध्यापक। 
इस अंतिम चित्र में एक बच्चा दिखाई दे रहा है जो किसी बेकार डिब्बे से अपनी गाड़ी बनाकर चला रहा है और उसी में खुश है जिसे देखकर स्पष्ट होता है कि समाज अपनी समस्याओं का हल ढूंढ़ता है और आन्नद भी मनाता है। 
 
छत्र सिंह: एक बार सादिक भाई मेरे पास आए और वो बोले कि हमें कुंए को रिपेयर करना है। वो कुंआ 252 फिर गहरा था, उसके बीच मंे 20-22 फुट का मलबा था। तो हमने उनके काम को करने की ठान ली और हमने और सभी कारीगर लोगों ने मिलकर उसे तैयार कर दिया। उस कुंए में 30-35 फीट गहरा पानी नीचे जाता है। सुबह वही 60 फुट भरा मिलता है। इस साल वहां 7 एमएम पानी गिरा हैं। तो वहां के लोग सब खुद करते हैं, सरकार कुछ भी नहीं करती है। वहां गांव के आदमी सब करते हैं। यहां एक बार हमने खबर देखी कि किसी इलाके में लोगों के पास पानी की कमी थी तो वो अर्धनग्न होकर प्रदर्शन कर रहे थे कि उनके लिए पानी का इंतजाम किया जाए जिस बात पर हमें बहुत हंसी आई कि उन लोगों को अपनी परंपरा पर जाना चाहिए। 
अनुपम मिश्र: मुझे आधुनिकता से कोई शिकायत नहीं है। यदि इंदिरा गांधी नहर सब को पानी दे तो फंेक दो इन कुंओं को लेकिन वो जहां भी पानी देती हैं वो रेत का पानी देती हैं। विकास के नारे से कुंए की एक पीढ़ी खत्म हो गई कहीं ऐसा न हो कि उस ज्ञान की सारी पीढ़ी ही चली जाए। इसे डग वैल कहते हैं कोई असवाधानी हो तो जान भी ले सकते हैं। समाज में स्वावलंबन नहीं आदान-प्रदान होना चाहिए क्योंकि स्वावलंबन से भी कही बार घमंड हो जाता है। 
रजनी बक्शी: हमारे यहां बदलाव की प्रक्रिया पश्चिम से आई। हमें इस तरह की आदत डाली गई कि आप अपने पड़ोसी पर नहीं एलआईसी पर विश्वास करो। जब हम इतनी आगे चले जाएं तो पीछे कैसे आएं तो उसका जवाब तो समाज की देगा। 
अनुपम मिश्र: बवाना में हुसैनी ब्राहमण हैं जो ताजिया निकालते हैं। 4000 साल पहले अलवर में देव के देबरा गांव में एक मंदिर और मस्जिद साथ-साथ थे तथा वो ढ़ांचा औरंगजेब के समय में बनाया गया था। मंदिर में तो कुछ नहीं लिखा था क्यांेकि वो हिन्दू बहुल इलाका था इसलिए वहां मंंिदर को कोई नुकसान नहीं हो सकता था लेकिन मस्जिद पर लिखा था ‘इसकी रक्षा राम जी करेंगे‘। 
राकेश दीवान: मध्य प्रदेश में बड़वानी के बीच का इलाका है, वहां लोगांे ने मिलकर अपने पानी के ढांचे बनाए। अनुपम एक दृष्टि की बात कर रहे हैं। मैं आपको दूसरे चित्र को दिखाता हूं धार की भोजशाला में दंगे हुए लेकिन बहुत पहले वहीं पर एक विचित्र ढ़ांचा था कि मंदिर में जाए बिना आप मस्जिद में कैसे जाएंगे और मस्जिद को बिना छुए आप मंदिर में नहीं जा सकते। भोपाल में दंगे में लोगों ने एक-दूसरे की मदद की है। हमें ये भी बताना चाहिए कि उन दंगों में कितने लोग बच गए और वो कैसे बचे इसके बारे में भी लोगों को बताना चाहिए लेकिन हम वो बताते ही नहीं है जिससे बदला एवं शत्रुता की भावना पैदा होती है। 
ओम थानवी: अनुपम जी ने गौरवशाली अतीत की बात की। जहां पहले राजस्थान के घरों में पानी नहीं था वहां अब नल टपकते दिखते हैं। पानी से लेकर वास्तुशिल्प तक अध्ययन का मेहकमा है। जीवन शैली के बारे में अनुपम जी ने बताया लेकिन आज वो भी बदलती हुई दिख रही है। पहले राजस्थान के पत्थर और उनपर की हुई कलाकारी, उनकी मजबूती प्रसिद्ध थी लेकिन आज राजस्थान में ऐसे पत्थर नहीं मिलेंगे। आधुनिकता की चपेट में राजस्थान भी आ गया। अब पत्थरों पर कील ठोकी जाती है ताकि वो नीचे न गिर पड़ें। तो उसपर भी सोचना चाहिए। 
द्विवेजेन्द्र नाथ: सिंध से लेकर ब्रहमपुत्र तक शहर में पानी नहीं। वहां की प्रति व्यक्ति आय भी कम है। जब नदियों में बरसात के तीनों महीनों को छोड़कर बाकी महीनों में पानी नहीं होता तो हम किस तरह की दृष्टि को विकसित कर रहे हैं। नदियों को लेकर जो रिश्ता है वो ऐसा है कि दिल्ली अपना कचरा मथुरा को पिलाएगी। वही पानी आगरा जा रहा है। कानपुर पहुंच रहा है और फिर पटना को वही पानी दे रहे हैं। तो वो गंदा पानी इन शहरों की प्यास क्या बुझाएगा। 
किरण: राजस्थान के लोगों ने पानी के सवाल को सामाजिक एकता के साथ छोड़ा जब राज बदलता है तो चीजें बदलती हैं। अभी छत्र ंिसंह जी ने कहा कि जब राज बदलता है तो चीजें बदलती हैं। सादिक भाई का नाम लिया तो दिमाग में वो नाम चिपक गया। आज हमारे सामने जो खतरे हैं वो हैं: भूमंडलीकरण की बात हो रही है। दूसरा जिस समाज की बात कर रहे हैं वो समाज किस रूप में है। तीसरा जलवायु और पर्यावरण का सवाल। ये तीनों चीजें और आज जो उदाहरण हमारे पास आए ये एक चुनौती हैं कि सादि ने बोला और काम कर दिया। कुंए का, और एक ही मंदिर और मस्जिद आपस में इस तरह से बने हैं कि एक में जाए बिना दूसरे में प्रवेश नहीं किया जा सकता। कार्यकर्ता बड़ा खतरनाक हो गया है। आज उनका काम है कि वो एक चीज पर काम करते हैं और बाकी से कट जाते हैं जैसे कि कोई महिलाओं पर काम करता है तो बच्चों के विषयों को नहीं देखता तो हमें उस सब से बचना चाहिए। किसी भी कार्यकर्ता के लिए उद्यम मुख्य है और है अपने दिमाग का अपनी अक्ल का प्रयोग करना। 
आशीष नंदी: अभी अनुपम ने जो पेश किया वो एक विशाल चित्र है। राजस्थान के लोग अपने पानी का इंतजाम खुद करने के लिए जिस तरह से काम कर रहे हैं वो शिक्षा, सीखना तथा सिखाने से परे है। कोई भी अपनी मातृ भाषा को नहीं सीखता है, हर कोई अपनी मातृभाषा को संबंधों से और अपनी इच्छा से ही सीखता है। जैसे कि बचपन में हमारी मां हमें हाथ लगाए बिना ही बता देती थी कि हमें बुखार है लेकिन आजकल कई लोग बिना थर्मामीटर का प्रयोग किए बता ही नहीं सकते कि किसी को बुखार है तो संवेदनाएं महसूस करके खुद से सीखी जाती हैं सिखाई नहीं जाती। उसी तरह से पर्यावरण की समस्या से निकलने के लिए हमें उसकी ताल को पकड़ना होगा। प्यार तथा कविता की भाषा भी उसी तरह से संवेदना की भाषा है। 
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