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और एक था, ज्वेल थीफ़!
वीर विनोद छाबड़ा 
आज देवानंद साहब को गुज़रे तीन साल हो गए हैं।मैंने जब होश संभाला था तो पाया कि देवानंद हमारे पिताजी की पीढ़ी के नायक थे। लेकिन उनकी सदाबहार इमेज की कायल मेरी पीढ़ी भी हो गयी। मैंने १९६५ में उनकी पहली फ़िल्म देखी थी - तीन देवियां। तभी से वो देवानंद से देवसाब हो गए और उनसे रश्क हो गया। तब मैं चौदह प्लस था। सोचता था - बड़ा होकर मैं भी बनाऊंगा - चार देवियां।
देवसाब से रश्क का एक और कारण था कि उनको पुरुषों से ज्यादा महिलाएं पसंद करती हैं, हर उम्र की। सोलह साल की भी और साठ वाली भी। सिनेमाहाल में कभी-कभी मर्दों से ज्यादा तो औरतों की तादाद होती थी। सुनते थे कि लड़कियों के तकिये के नीचे देवसाब की तस्वीर होती थी।
ये भी सुना था कि देवसाब का मशहूर एक्ट्रेस सुरैया से ज़बरदस्त इश्क चला था। मगर सुरैया की नानी तैयार नहीं थीं। देवसाब ज्यादा इंतज़ार नहीं कर पाये और अपने बड़े भाई चेतन आनंद की खोज मोना उर्फ़ कल्पना कार्तिक से ब्याह रचा लिया। लेकिन सुरैया ने उम्मीद नहीं छोड़ी। टूटे दिल के साथ ज़िंदगी गुज़ारने का फैसला किया। उन्होंने मरते दम तक शादी नहीं की।
मैं ही नहीं सारा का सारा पुरुष वर्ग देवसाब से डाह रखता था। शायद यही वज़ह थी कि उस ज़माने में देवानंद कट हेयर स्टाइल के प्रति नौजवान क्या कल के लड़के भी दीवाने थे। मैंने एक मुद्दत तक उनकी स्टाइल को अपनाने की कोशिशकी। मगर कम्बख़्त उनकी मानिंद बाल ही नही सेट हो पाये।नाई की दुकान में दीवारों पर देवानंद, दिलीप कुमार, राजकपूर और अशोक कुमार की पत्रिकाओं से कटी तस्वीरें चस्पी होती थीं। दो राय नहीं कि हॉट फ़ेवरिट में देव पहले पर होते थे और दिलीप कुमार दूसरे पर।
मेरे दिल में दिलीपसाब बसते थे। मगर देवसाब बहुत पीछे नहीं थे। मैंने दिलीप और देव को एक साथ 'इंसानियत' (१९५५) में देखा था। बड़ी धुंधली सी याद है। इसमें एक जिप्सी बंदर कमाल का था। तब पिताजी की उंगली पकड़ कर देखने गया था। बाद में री-रन ये फिल्म और तमाम दूसरी फ़िल्में देखीं।
एक ज़माने में देवानंद की हेयर स्टाइल के अलावा देव कैप भी बड़ी मशहूर हुई। ये कैप 'ज्वेल थीफ़' (१९६७) की देन थीं। ये वो दौर था जब देव साब की फिल्मों का बड़ी शिद्दत से इंतज़ार रहता था।
जॉनी मेरा नाम (१९७०) बहुत बड़ी हिट थी। लेकिन इस फ़िल्म के बाद से देवसाब की मशहूर देव कट काफी हद तक छट गयी। उनके प्रति दीवानगी भी कम हो गयी। दरअसल एक नई पीढ़ी आ चुकी थी जो धर्मेंद्र, जीतेंद्र, राजेश खन्ना की दीवानी थी और अमिताभ बच्चन दस्तक दे रहे थे। इसके बाद हालांकि देवसाब ने कई फ़िल्में बनायीं मगर अपने सुख के लिए। दूसरों ने जो फ़िल्में बनाई भी तो उनसे प्रेम के कारण।
देवसाब ने ११४ फ़िल्में की जिसमें ८२ में वो अकेले हीरो थे। यों तो मुझे देवसाब की ढेर फ़िल्में अच्छीं लगीं। लेकिन खासतौर पर कालापानी, हम दोनों, असली नकली, मुनीमजी, जब प्यार किसी से होता है, तेरे घर के सामने, तीन देवियां, गाइड, ज्वेल थीफ़, जानी मेरा नाम और गैंबलर बहुत पसंद हैं।मैंने उनकी कई फ़िल्में कई-कई बार देखीं हैं। इनमें से 'हम दोनों' सबसे ज्यादा रिपीट की है। मेरी याद में ये डबल रोल वाली पहली फिल्म थी। जब ये कलर में आई तब भी दो बार देखी। ज्वेल थीफ़ का आख़िरी डायलॉग भी बहुत अच्छा लगा था - और एक था, ज्वेल थीफ़।सचमुच दूसरा ज्वेल थीफ़ पैदा नहीं हुआ और शायद होगा भी नहीं। 
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