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किधर जा रहा है सिनेमा

सैयद एस तौहीद

सातवें दशक की शुरूआत में बीआर इशारा की बोल्ड फ़िल्मों ने धूम मचा दी थी । उनकी पहली फ़िल्मों ने नई बहसों को जन्म दिया था । इशारा की फिल्में सतही व्यस्क खुलेपन से काफी आगे थी। इस साहसी फिल्मकार ने मुख्यधारा में रहकर ही व्यस्क किस्म की फिल्में बनाई। रामसे की हारर फिल्मों में मौजूद टाईप आफ सेक्सुआलिटी में सतहीपन –फेड अप कर देता है। उन फिल्मों में विमर्श को तलाशना व्यर्थ ? दशकों पूर्व 'कर्म' में देविका रानी-हिमांशु राय बीच चुंबन सीन को लेकर काफी तर्क-वितर्क हुआ, लेकिन भारतीय सिनेमा में सेक्सुआलिटी कंटेंट नहीं रूका,विषयांतर जरूर हुआ। विक्रम भटट की हारर फिल्मों में सेक्सुआलिटी तो जरूर है,लेकिन रामसे की तुलना में दूसरे किस्म का।  इस किस्म की फिल्मों से 'सेक्सुआलिटी'  संकीर्ण रूप में अभिवयक्त किया गया । फिल्मों ने खुलेपन को अलग-अलग तरह से रखा। ताज्जुब नहीं कि 'डर्टी पिक्चर' एडल्ट सर्टीफाईड’ होकर भी सुपरहिट रही। इसमें मशहूर सितारों के स्थान पर पार्न फिल्मों के कलाकार होते, क्या इस स्तर की स्वीकार्यता मिलती? सील्क की कहानी फिर से सुपरहिट हो पाती?  हालिया 'बी ए पास' व नशा फिर हेट-स्टोरी व जिद तथा रागिनी भी हिट रही । इन फिल्मो की सफलता ने मुख्यधारा की समानांतर धाराओं को प्रोत्साहन दिया है। किंतु यह फिल्में इशारा की पहल को बढा सकीं? एडल्ट बनाने का अनजान कलाकारों को लेकर रिलीज हुआ करती एडल्ट फिल्मों का आधार व स्वरूप बदल गया है। अब जाने-पहचाने कलाकार व नाम भी काम करते देखें जा सकते हैं। सेक्सुआलिटी के नजरिए से यह बडा बदलाव है। विचार करना चाहिए कि इसे बदलाव कहा जाए। सिनेमा में सेक्सुआलिटी अब एक सम्मानित विषय है ?  
 
आज भोजपुरी सिनेमा इस बात को सम्मान मान रहा कि उसने सी व डी ग्रेड की फिल्मों को खत्म कर दिया है। लेकिन क्या वो नहीं भूल रहे कि सफाई अभियान में गंदगी की ओर झुक गए? भोजपुरी सिनेमा का खुलापन शब्दों से होकर फिल्मांकन व दृश्यों तक पहुंच गया है। कहानियों से हटकर चर्चा करें तो वहां आ रहे आईटम गानों में सेक्सुआलिटी की बडी संकीर्ण परिभाषा नजर आती है। एक किस्म का वैचारिक समापन कहना चाहिए।बडे शहरों में अब सुबह के शो वाली सी-डी ग्रेड हिंदी फिल्में कम नजर आती हैं। भोजपुरी फिल्मों ने जगह अपने लिए रख ली है। छोटे शहर-कसबे व गांवों के सिनेमाघरों में टाईमपास के लिए सी-डी फिल्में अब भी दिखाई जाती हैं। इनके नामकरण के लिए निर्माताओं को पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए! साहब इनका नाम कामुक व अति कामुक नामों में अवार्ड लेगा।  कांति शाह की फिल्मों को आप किसी कतार में रखते हैं?  फिल्म नामकरण के टाप अवार्ड  दावेदार शाह का मुकाम ? वो बी या सी नहीं कांति ग्रेड की फिल्में बनाते हैं। कामुक-व्यस्क फिल्मों के लेखक भी बडे रचनाकार किस्म के हैं। एडल्ट कहानी-पटकथा लिखना जोखिम वाला काम होता है, क्या वो अपनी सृजनात्मक क्षमताओं को व्यर्थ नहीं कर रहे? कहा जाता है कि इस किस्म की फिल्मों से कला व सार्थक की कामना नहीं करनी चाहिए, क्या इनकी चिता पर जन्म लेने वाली मुख्यधारा व्यस्क फिल्मों से भी कामना नहीं करें?  हालीवुड की एडल्ट व स्ट्रीक्टली एडल्ट फिल्मों में भी सतहीपन होता है!  वहां के सिनेमा में खुलेपन का असर देश में बन रही फिल्मों पर हुआ, यहां सिनेमा में खुलापन परोसने वालों का तर्क देखिए !  एडल्ट फिल्मों के दर्शक घोर अवसाद की स्थिति में होते हैं। मन व काया पर कामुकता का विस्फोट करने वाली फिल्में आदमी का काफी नुकसान करती हैं। इन्हें देखकर निकला दर्शक खुद को लूटा हुआ महसूस करता होगा। कोमल मनोभावों की हत्या का जुर्म ए ग्रेड की हिंदी फिल्मों पर भी बराबर  है।
 
मानवीय रिश्तों पर सक्षम फिल्में बनाने वाले फिल्मकार भी खुलेपन को बडी बेबाकी डाल रहे हैं। कुछ युं हो रहा मानो वो नहीं किया तो फिल्म चलने वाली नहीं। इधर देखने में आ रहा कि किरदार का गाली बोलना लाजिमी है! साहसी फिल्मों के सारथी  लोग सेक्सुआलिटी को व्यक्त करना साहस मानते हैं। गालियों व कामुक प्रसंगों का प्रसार समाज में उन्माद की स्थिति नहीं बना रहा? अपराध व सेक्स के मेलजोल से बनी कहानियों का चलन सिनेमा में काफी समय से है। इस मामले में किरदार व कहानियां में बदलाव तो हुआ,लेकिन प्रेरणा टाईपकास्ट रही। विज्ञान व आधुनिकता के जमाने में भूत-पिशाच की हारर फिल्में बननी चाहिए थी? ज्यादातर स्त्री आत्माएं कामुक व बलाजान सुंदरी क्यों बनाई जा रही हैं? जिस कलाकारी व खुलेपन से आत्माओं का रूप-रंग गढा जा रहा,उसे देखकर मालूम पडता है कि फिल्मकार ने उन्हें  देखा है! रामसे व कांति शाह की हारर फिल्मों में भूत-पिशाच अमूमन कुरूप व डरावने किस्म के रहे, इनके रूप-रंग की एक नयी परिभाषा हिंदी की मुख्यधारा फिल्मों ने रची। शराब व बोतल दोनों बदल गए, शराब का बनना खत्म हुआ?  खुलेपन का आलम देखें कि ग्रेंड मस्ती सरीखा वहीयात फिल्म हिट-सुपरहिट बनी। एडल्ट सर्टीफीकेट पर रिलीज हुई फिल्मों में मौजूद खुलापन पारिवारिक फिल्मों को भी मायाजाल में खींच गया। आज के जमाने से पहले ‘कामेडी’ का मतलब केवल हास्य-व्यंग्य हुआ करता था। कामेडी में सेक्सुआलिटी का पुट देकर एक नए किस्म के हास्य-व्यंग्य (फूहडता) को रचा गया। कहना होगा कि इस किस्म के लुभावने प्रयोग मूल विधाओं को बर्बाद कर रहे । फिल्मों को अंतरंग दृश्यों के दावे चलाने वाले प्रयासों की कमी नहीं। अनेक बार काफी वैचारिक कामों को अनावश्यक कामुक आईटम गानों द्वारा खराब होते देखा है। सेक्सुआलिटी को कहानी की टाईमलाईन में जगह कम मिली,लेकिन मिली । हिंदी में बन रही व्यस्क फिल्मों को शायद इन अंशों से भी प्रोत्साहन मिला होगा।  सिनेमा में सृजनात्मक संभावनाओं की अपार क्षमता हुआ करती है, एक मामूली से कहे जाने वाले प्रसंग को कहानी में ढलते देखा है। अभिवयक्त करने के पचासों तरीके फिल्मकार आजमाया करते हैं। अनावश्क खुलापन –सतही खुलापन भी एक तरीक़ा है। सृजनात्मक महत्वकांक्षाओं ने फिल्मकारों को अनावश्यक चीजों तक पहुंचाया। फिल्मों का मौजूदा कंटेंट आपको परेशान करता है ?
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