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अफ़सोस हम न होंगे…

वीर विनोद छाबड़ा 

दो राय नहीं हो सकती कि पुरुष गायकों में सबसे ज्यादा फैन क्लब सिर्फ और सिर्फ मोहम्मद रफ़ी के नाम हैं। उनका जन्म अमृतसर के पास एक गांव कोटला सुल्तानपुर में २४ दिसंबर १९२४ को हुआ था। आज वो होते तो ९० साल पूरे कर लेते। रफ़ी की गायकी की बारीकियों के बारे में बात करना सूरज को दिया दिखाने के समान है। वो बेमिसाल थे। हर तरह के गाने गा सकते थे। चाहे क्लासिकल हो या वेस्टर्न। गंभीर हो या कॉमेडी। अगर उन्हें मालूम होता था कि उनका गाना फलां कलाकार पर फिल्माया जाना है तो फिर कहने ही क्या। ऐसा लगता था मानो वो खुद कलाकार हों। धीर-गंभीर दिलीप कुमार हों या चुलबुले जानी वॉकर। या फिर रिबेल स्टार शम्मी कपूर। वो उनकी आवाज़ बन जाते। प्रदीप कुमार, राजेंद्र कुमार और देवानंद की भी की भी स्थायी आवाज़ रफ़ी ही थे। अभिनय की निचली पायदान माने जाने वाले बिस्वाजीत (पुकारता चला हूँ मैं.…)और जॉय मुखर्जी (आँचल में छुपा लेना कलियां…) सरीखे अभिनेताओं के बारे में कहा जाता था कि वो अगर फिल्म में खड़े हो पाते थे तो उन पर फिल्माए रफ़ी के गानों की वज़ह से। 
रफ़ी जितने बेहतरीन गायक थे उतने ही बेहतरीन इंसान भी। किसी भी नए कलाकार को अपने आवाज़ देने में कोई संकोच नहीं था उनमें। कॉमेडियन को भी आवाज़ को आवाज़ देकर इज़्ज़त बख़्शने वाले रफ़ी साहब पहले थे। 
मुफलिसी के दौर से गुज़र रहे संगीतकार निसार बज़मी की 'खोज' के लिए रफ़ी ने एक रूपये में गाया। उन दिनों उन्हें बज़्मी साब को कोई घास नहीं डालता था। बाद में बज़्मी पाकिस्तान चले गए और बहुत बड़े संगीतकार बन गए। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को शुरुआती दौर में पैर ज़माने में उन्होंने बहुत मदद की। उनकी पहली फिल्म 'छैला बाबू' के लिए पहला गाना मुफ्त गाया। उन्हें नई फिल्मे भी दिलाईं। 'दोस्ती' में 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे…से लक्ष्मी-प्यारे कहां से कहां पहुंच गए। रफ़ी ने बेस्ट सिंगर का फिल्मफेयर पुरुस्कार भी पाया। 
राकेश रोशन की पहली फिल्म 'आपके दीवाने' के लिए रफ़ी साहब ने सिर्फ एक रुपए मेहनताना लिया था। दुनिया जानती है आज राकेश रोशन किस बुलंदी पर हैं। बाद के कैरियर में कुछ विवाद उठने के कारण रफ़ी कुछ अलोकप्रिय भी हुए थे। 
लताजी से उनका झगड़ा फिल्मों में गाने की रॉयल्टी को लेकर हो गया। लताजी गाने के लिए मेहनताने के साथ-साथ रॉयल्टी भी चाहती थी। प्रोड्यूसर इसके विरुध थे और रफ़ी उनका पक्ष लेते थे। इस मुद्दे पर लताजी उनसे इतना नाराज़ हो गयीं कि उनके साथ गाना बंद कर दिया। और उधर रफ़ी साब ने भी यही स्टैंड लिया। कुछ लोग बताते हैं कि 'माया' फिल्म में एक गाने (तस्वीर तेरी दिल में जिस दिन से उतारी है.…) की चंद पंक्तियों के कारण संबंध ख़राब हुए थे। संगीतकार सलिल चौधरी ने लता का साथ दिया। 
रिश्तों में इतनी खटास आ गयी कि एक-दूसरे को भाई-बहन मानने वाले रफ़ी और लता एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं गंवाते। गिनीज़ बुक ऑफ़ रिकॉर्ड ने बताया कि लता ने रिकॉर्ड २५००० गाने गाये हैं तो रफ़ी ने इसे चुनौती दी। रफ़ी साब की १९८४ में मृत्यु के बाद १९९१ में गिनीज़ ने आशा भोंसले को ७८७५ गानों के साथ सबसे ऊपर रखा। रफ़ी के नाम ४८४४ रिकार्डेड गाने बताये गए। 
संगीतकार जयकिशन ने १९६७ में रफ़ी और लता की सुलह करा दी। इसके बाद दोनों के कई गाने रिकॉर्ड हुए। कोई दो साल पहले फिर विवाद खड़ा हो गया। लताजी ने एक समारोह में बताया कि रफ़ी साहब ने उनसे लिखित माफ़ी मांगी थी। जबकि रफ़ी के बेटे शाहिद रफ़ी का कहना है कि माफ़ी नहीं मांगी गयी थी और अगर ऐसा था तो लताजी माफीनामा दिखायें। वो माफ़ीनामा अभी तक पेश नहीं हो सका है। बहरहाल इन तमाम विवादों के बावजूद रफ़ी साब कद कम नही हुआ। दुनिया उन्हें एक ऐसे गायक के रूप में याद रखती है जिसका कोई सानी नहीं। रफ़ी साहब एक सच्चे मददगार होने के अलावा बेहद भावुक भी थे। मन तड़पत हरी दर्शन को आज.… और बाबुल की दुआएं लेती जा.…बताते हैं वो इन गानों की रिकॉर्डिंग पर फूट फूट कर रोये थे।उन्हें सर्वश्रेष्ठ गायन के लिए छह बार फिल्मफेयर और एक बार राष्ट्रीय पुरुस्कार मिला था। 
उनकी अमर आवाज़ आज भी कानों में गूंजती हैं - सुहानी रात ढल चुकी…ओ दुनिया के रखवाले…हम बेखुदी में तुम को पुकारे चले गए.…देखी ज़माने की यारी, बिछुड़े सभी बारी बारी…मिली ख़ाक में मोहब्बत…हमने तो खुशियां मांगी काँटों का हार मिला …मधुवन में राधिका नाचे रे.…मैं ज़िंदगी में हरदम रोता ही रहा हूं.… सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए.…तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना…और कर चले हम जानो तन साथियों…मेरी आवाज़ सुनो प्यार का राग सुनो…
ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे, अफ़सोस हम न होंगे…
जब तक फ़िज़ा है रफ़ी रहेंगे। अमर आवाज़ें कभी ख़त्म नहीं होतीं। 
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