ताजा खबर
घर की देहरी लांघ स्टार प्रचारक बन गई डिंपल वह बेजान है और हम जानदार हैं ' मुलायम के लोग ' चले गए ! बिगड़े जदयू-राजद के रिश्ते
नदियां उदास हैं

हृदयनारायण दीक्षित

नदियां जीवन्त प्रवाह हैं। वे उदास हैं। जीवन ऊर्जा छीज रही है उनकी। वे वर्षा में हहराती नहीं। सावन भादौं के माह भी तरूण और वेगवती नहीं होती। पेट भर पानी भी नहीं मिलता, उतराएं और इतरांए और कल-कला गांए नाचें तो कैसे नाचें? जैव विविधता पर संकट है। गांव का हूं, वह भी यू0पी0 का। यहां नदिया ही नदियां हैं। प्रायः प्रवास पर रहता हूं। ढेर सारी छोटी बड़ी नदियां पार करता हूं। उन्हें नमस्कार हमारा संस्कार है। साम्प्रदायिक ही सही पर निरा आधुनिक होने के बावजूद हरेक नदी को हरेक अवसर पर नमस्कार करता हूं। हमारा जन्म सई नदी के तट पर बसे गांव में हुआ। नदी नाद का अनुराग स्वाभाविक ही है। अनेक जिलों की सीमा नदियां ही निर्धारित करती हैं। हमारे जिलों की सीमा सई ओर गंगा के आच्छादन में है। मैं अपने परिचय में सई नदी का नाम जोड़ता हूं। सोचता हूं कि सरकारी परिचय में नाम, पिता के नाम, डाकघर, तहसील और जिले के साथ पड़ोस की नदी का नाम भी जोड़ा जाना चाहिए। अपनी निकटवर्ती नदी का नाम। परिचय में हमारा गोत्र, वंश, कुल भारत ही रहे लेकिन नदी नाद का उल्लेख भी होना चाहिए।
नदियां हरेक क्षेत्र की प्रीति गढ़ती है। जम्मू कश्मीर के प्रशंसनीय सौन्दर्य में जम्मू तवी नाम की नदी के प्रवाह का साझा है। मथुरा वृन्दावन प्रकृति और संस्कृति में मनभावन है। लेकिन कृष्ण सौन्दर्य से रचे बसे इस क्षेत्र के सत्य शिव और सुन्दर का प्राण यमुना है। श्रीकृष्ण यमुना तट पर ही तो नाचे थे। कृष्ण रास की धुन पर यमुना भी नाची थी गीत गाते हुए। बुन्देलखण्ड की बेतवा को कई बार प्रणाम कर चुका हूं। वीर रस की तमाम गाथाएं इस नदी से जुड़ी हुई हैं। और गंगा। गंगा विश्व की प्रतिष्ठित नदी है। ऋग्वेद का नदी सूक्त ‘इमे गंगे’ से ही संगीत प्रवाह पाता है। गंगा का स्रोत गोमुख है। पहले शिव की जटाए, फिर ऋषिकेश। ऋषिकेश की गंगा अपलक निहारने योग्य हैं। जैसे स्वयं गंगा स्नान करके उतरी हो गंगा। यहां सावन भादौ बादल भी उतर आते हैं गंगा स्नान करने के लिए। ऋषिकेश और हरिद्वार की गंगा को देखते हुए निरे भौतिकवादी भी अध्यात्म रसिया हो जाते हैं।
ऋग्वेद में कोई 25 नदियों की चर्चा है। वैदिक मंत्र नदी नाद से भरे पूरे हैं। सरस्वती वैदिक पूर्वजों की प्रिय नदी है। वह नदी है, स्तुति योग्य है। देवी है, देवता हैं, माता हैं और वाग्देवी (ज्ञान, वाणी की शक्ति) भी हैं। सरस्वती भरतजनों की प्रिय नदी है। सरस्वती ऋग्वैदिक काल में ही नदी से माता, देवी, देवता, ज्ञान की अधिष्ठात्री और वाग्देवी बन चुकी थी। गृत्समद के रचे एक मंत्र (2.41.6) में वे सर्वोत्तम मां-अम्बितमे, श्रेष्ठतम नदी-नदीतमे और श्रेष्ठम देवी-देवितमे हैं। ऋग्वेद में 5 जन हैं, सरस्वती ‘पंचजाता वर्धयन्ती’ है। पांचों जनों का संवर्द्धन करती हैं। इसी नदी तट पर भरतजनों का निवास था। विश्वामित्र भी भरत थे। ऋग्वैदिक भरतजनों ने सरस्वती तट पर दर्शन, चिन्तन और उत्कृष्ट मानवीय मूल्यों वाली एक विशेष संस्कृति का विकास किया। भरतजन के कारण इस देश का नाम भारत पड़ा है। देवश्रवा और देववात भारत ऋग्वेद के ऋषि है और सूक्त (3.23) के द्रष्टा ऋषि हैं। यहां दृषद्वती, आपया व सरस्वती नदी के तटों पर रहने वाले मनुष्यों की समृद्धि की प्रार्थना है। ऋग्वेद के एक राजा सुदास का राज्य सरस्वती तट पर था। तब सरस्वती हिमालय से निकलकर सबको सींचते हुए दक्षिणी समुद्र में गिरती थी। तटवर्ती निवासी आर्य समृद्ध थे। यहां यज्ञ थे। शोध थे। वैदिक तत्वज्ञान और ऋचादर्शन का बड़ा भाग यहीं उगा। सरस्वती ज्ञान और विद्या की अधिष्ठात्री देवी भी कही गयीं। ऋग्वेद के ऋषियों/कवियों ने अपने पूर्वजों को भी सरस्वती का आराधक बताया है। 
ऋग्वेद की देवता हैं ‘सरस्वती’। वे “अन्नदायिनी, शत्रुनाशिनी, संरक्षक, पर्वत तट तोड़क और समृद्धि दायिनी हैं।” नदी को देवता और माता जानना भारतीय ज्ञान बोध का ही चमत्कार है। हमारे पूर्वज नदियों को अपलक निहारते, स्नान अघ्र्य आचमन करते ही प्रज्ञान हुए। प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का प्राण यही नदियां हैं। इसी के विस्तार में सिंधु घाटी सभ्यता भी विश्वविख्यात् हुई। ऋग्वेद के ऋषियों की नदी प्रीति नदी से भी गहरी है। कहते हैं, “देवता रक्षा करें। पूर्वज रक्षा करें और जल से भरी प्रवाहमान नदियां भी हमारी रक्षा करें। (6.52.4) यहां जल भरी नदी से रक्षा की गुहार विशेष ध्यान देने योग्य है। फिर कहते हैं, “जल से उफनाती सरस्वती हमारी रक्षा करें।” (6.52.6) ऋग्वेद में भारत के अभिजनों का मूल निवास क्षेत्र भी नदीवाचक है। यहां मूल निवास के लिए ‘सप्तसिंधव’ (8.24.27) सात नदियों वाले क्षेत्र का उल्लेख है। नदियां सात हैं पर सरस्वती और सिन्धु की स्तुतियां ज्यादा हैं। अन्य पांच नदियां सतलज (शुतुद्री), व्यास (विपास), रावी (परूष्णी), चेनाब (आक्सिनी) और झेलम (वितस्ता) है। गंगा यमुना हैं। यहां रसा (सीर दरिया), अनितमा (आमूदरिया) और कुभा (काबुल नदी) आदि का भी उल्लेख है। ऋग्वैदिक संस्कृति और सभ्यता के अभिजन पश्चिमोत्तर दिशा में अफगानिस्तान तक विस्तृत थे। 
ऋग्वैदिक काल के इतिहास विवेचन में नदियों की महत्ता है, स्थानों और राजवंशो के नामों की कम हैं। नदियों की ज्यादा है। नदियों की प्रीति वैदिक काल से भी प्राचीन है। पूर्वज सरस्वती के कृतज्ञ हैं। वे उसे रक्षक, धनवान, धनदात्री, अन्नदात्री के रूप में देखते हैं। वह एक विशाल भूक्षेत्र की जल आवश्यकता पूरी करती है, कृषि समृद्धि देती है, इसीलिए धनदात्री है। ऋषि इसी तट पर ज्ञानदर्शन की चर्चा करते हैं। यह परम्परा वशिष्ठ से भी पुरानी है। वशिष्ठ कहते हैं, “जैसे जमदग्नि ऋषि ने आपकी आराधना की थी वैसे ही वशिष्ठ भी आपकी स्तुति करते हैं।” (7.96.3) नदी संस्कृति का विश्वव्यापी प्रभाव पड़ा। भरतजनों द्वारा विकसित इस सांस्कृतिक भूक्षेत्र का नाम ‘भारत’ पड़ा। नदियों के अविरल प्रवाह की चिन्ता इन्द्र को थी, वरूण को भी थी। ऋग्वेद के अनुसार सिंधु का मार्ग वरूण ने ही निर्बाध किया था। यह सर्वाधिक वेगवती है, अद्भुत घोड़ी जैसी वेगशील। वैदिक काल के पूर्वजों ने एक प्रीतिपूर्ण जलसंस्कृति नदी संस्कृति दी। 
गंगा भारत की मन तरंग हैं। जैसे मन कुलाचें भरता है। अति गतिशील मन भौगोलिक दूरी की समस्या को काटता हुआ तेज रफ्तार चलता है, वैसे ही गंगा भी। लेकिन गंगा की गतिशीलता का अन्तस् गतिशील मन से बहुत भिन्न है। मन दूरस्थ पर्वत पर आकाश में या सूर्य चन्द्र के पास जाता है, तब यहां नहीं होता। गंगा ऋषिकेश से पश्चिम बंगाल के गंगा सागर पहुंच जाती हैं तो भी वे उसी समय एक साथ उत्तराखण्ड के ऋषिकेश, यू0पी0 के सहारनपुर, कानपुर, इलाहाबाद, बिहार के पटना सहित सभी स्थानों पर होती हैं। ईशावास्य उपनिषद्का परमतत्व भी ऐसा ही है। वह यहां भी होता है और वहां भी। वह स्थिर है और गतिशील भी। नदियां उद्गम स्रोत पर होती हैं, प्रवाह क्षेत्र में होती हैं और समुद्र या अन्य नदी में मिलने वाले स्थान पर भी। वे हमारे भीतर अन्तस् में छन्द्स होकर बहती हैं। मन करता है वे अनवरत बहें हमारे भीतर। उनका प्रवाह हमारे अन्तर्कलुष को बहाता रहे और हम अपनी नदी माताओं के पोषण में रहे। निष्कलुष, मातृभक्त होकर।
 
email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • जहां पत्रकारिता एक आदर्श है
  • जहां आये कामयाब आये
  • नामवर की नियति
  • चिड़िया ते बाज तुड़वाऊं?
  • प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार
  • एक ऋषि की यात्रा का अंत
  • असली मैदान तो यूपी बनेगा
  • राजकाज
  • भगतों की चांदी है
  • मेरठ के बांके!
  • बाबरी विध्वंस की आयी याद
  • इतिहास में उपेक्षित तिलका मांझी
  • आखिरी पड़ाव गोमोह जंक्शन
  • संगम के अखाड़े में लेफ्ट-राइट
  • एक थे लोकबंधु राजनारायण
  • अपनी जमीन ही नसीब हुई
  • रवीश के सामाजिक सरोकार
  • गिरोह क्यों कहते हैं
  • ई राजेंद्र चौधरी कौन है ?
  • मीडिया में धूमते चेहरे
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.